व्यावसायिकता से दूर खड़ा है प्रतिरोध का सिनेमामो. जिशान


पीएचडी (जनसंचार एवं पत्रकारिता), मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद

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प्रतिरोध का तात्पर्य विरोध और निषेध होता है जबकि प्रतिशोध का तात्पर्य प्रतिकार या बदले से है. कुछ लोग बहुत ही चालाकी से प्रतिकर के सिनेमा को प्रतिरोध का सिनेमा बताकर उस पंक्ति में आ जाना चाहते है जिस पंक्ति के अंदर प्रबुद्ध जन बैठकर सही अर्थों में प्रतिरोध की बात करते हैं. प्रतिरोध का सिनेमा सामाजिक मुद्दों, मानवीय मूल्यों और मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वाला सिनेमा है. यहां सिनेमेटिक ट्रीटमेंट शुद्ध कलात्मक, शुद्ध व्यावसायिकता से दूर होता है. इस सिनेमा में वाणिज्य है लेकिन शुद्ध व्यवसायिकता नहीं है. इनमें सत्यजित रे, कुमार शाहनी, रित्विक घटक, मृणाल सेन आदि शामिल है. व्यावसाय और वाणिज्य में थोड़ा अंतर समझिये- विकिपीडिया के अनुसार, व्यावसाय विधिक रूप से मान्य संस्था है जो उपभोक्ताओं को कोई उत्पाद या सेवा प्रदान करने के लिये लक्ष्य प्राप्ति के रूप में निर्मित की जाती है जबकि वाणिज्य किसी उत्पाद और व्यावसाय का वह भाग है जो उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की उनके उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं के बीच विनिमय से संबंध रखता है. ध्यान रहे प्रतिरोध के सिनेमा में वाणिज्य तो हो सकती है लेकिन व्यावसायिकता नहीं.

अपरिहार्य आवश्यक व्यावसायिकता को ध्यान में रखकर मानवीय मुद्दों पर बना हुआ सिनेमा जो अपने अधिकारों की बात करता है और सामाजिक कलात्मक सिनेमेटिक ट्रीटमेंट को साथ लेकर चलता है. इस तरह की फिल्मों में श्याम बेनेगल, गोविन्द नेह्लानी, केतन मेहता, एम.पी वासुदेवन नायर, ग्रीश कर्नाड, गौतम घोष, गर्म हवा के डायरेक्टर एम एस सथ्यु आदि इसमें शामिल हैं. अभी हाल ही में केतन मेहता निर्देशित “मांझी- द माउंटेन मैन” फिल्म इसका बेहतरीन उदहारण है. जो समाज के एक खास पृष्ठभूमि को संदर्भ में रखकर प्यार और आम आदमी के संघर्ष को सैलूलॉयड पर उतरा गया है. फिल्म का मुख्य कथानांक एक दलित परिवार के संघर्ष को चिन्हित करता है. लेकिन निर्देशक ने इसे दर्शकों विवेक पर छोड़ दिया है.

दूसरी ओर, शुद्ध रूप से व्यावसायिक सिनेमा- यह अव्यवाहरिक, विकृत कल्पना से भरा हुआ सिनेमा होता है. इसमें सिनेमेटिक ट्रीटमेंट सतही और पुअर होता है. इसके अन्दर बी ग्रेड और सी ग्रेड फ़िल्में आती है. इस तरह की फिल्मों की एक खास प्रवृति यह होती है कि यह अपराध बोध होती है. इस तरह की फिल्मों की कथावस्तु प्रतिशोध के इर्द-गिर्द घुमती है. इस तरह की फिल्में जब शुरू होती है तो यह देखने को मिलता है कि यह हिंसा को जस्टीफ़ाइड करती है. इस तरह की फिल्मों में हमेशा यह देखने को मिल जायेगा कि नायक या नायिका के साथ कुछ अत्याचार हुआ है और वह उस अत्याचार का बदला लेने के लिए वो धड़ाधड़ हिंसा करता हुआ चला जाता है. बात वहाँ भी प्रतिरोध की कि जाएगी लेकिन यह प्रतिरोध नहीं प्रतिशोध होता है.

महेश भट्ट ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अब समय आ गया है कि हम सिनेमाई समझ को लेकर समाज को शिक्षित करें. उन्हें सिनेमाई भाषा और उसके व्याकरण के प्रति जागरूक करें. (We have to literate the society with audio-visual language. Teach them grammar of audio-visual language and how audio-visual language is functioning. A common people only see it but can’t understand it). किसी फिल्म की कहानी क्या है इसे कोई बच्चा भी देखकर बता सकता है लेकिन उसके ट्रीटमेंट को, उसके प्रेजेंटेशन के पीछे डायरेक्टर की क्या सोच है उसे वो नहीं समझ सकता. ऐसे में शिक्षण संस्थान और सामाजिक जागरूकता से जुड़े संस्थान इसमें अहम् भूमिका निभा सकते हैं.

सिनेमा को सातवीं कला कहा जाता है. लेकिन इससे पहले वो छः कला कौन-कौन से इसे जानना भी आवश्यक है. इसके अंतर्गत तीन प्रतिनिधित्व कला (Rrepresentative Arts) आते है और तीन प्रदर्शित कला (Performing arts). (The cinema is considered as seventh arts. So what are the sixth art. There are three representative arts and three performing arts. So cinema is combination of all sixth arts.)

प्रतिनिधित्व कला (Rrepresentative Arts) के अंतर्गत रचनाकार फिजिकली सामने नहीं होता जबकि उसकी रचना उसको प्रस्तुत करती है. जैसे- पहला साहित्य, प्रेमचंद ने कहानी लिख दी लेकिन कहानी पढ़ते समय प्रेमचंद जी हमारे सामने नहीं होते लेकिन हम कफ़न के माध्यम से, ईदगाह के माध्यम से उन तक पहुंचते है ऐसे में कोई रचना रचनाकार को प्रस्तुत करती है. यहां रचनाकार फिजिकली प्रस्तुत नहीं होता. दूसरा, पेंटिंग- इसमें भी पेंटर सामने नहीं होता लेकिन उसकी पेंटिंग के माध्यम से उस रचनाकार तक पहुँचते है उस कलाकार तक पहुँचते है. तीसरा है आर्किटेक्चर, मोनुमेंट्स आदि. जिन्होंने ताजमहल, लालकिला बनाया वो हमारे बीच नहीं है. लेकिन उनकी रचना द्वारा हम उन रचनाकारों तक पहुँचते हैं. ये तीन प्रतिनिधित्व कला के उदहारण है.

जबकि प्रदर्शित कला (Performing arts) में कलाकार फिजिकली सामने मौजूद होता है. हम उससे बात कर सकते है, उससे कुछ कह सकते है, उसे छू सकते है. यहां कलाकार अपनी कला को खुद ही प्रदर्शित करता है. जिसका पहला उदहारण थिएटर है. थिएटर में कलाकार फिजिकली सामने होता है. वो अपनी कला के माध्यम से दर्शकों को इंटरटेन करता है. दूसरा है- संगीत. संगीतकार अपने संगीत के माध्यम से अपने स्त्रोताओं के सामने होता है. चाहे वो इंस्ट्रूमेंट्स बजा रहा है हो या वो अपनी आवाज दे रहा हो. और तीसरा- नृत्य है. इसमें भी कलाकार फिजिकली सामने होता है. इन छः कलाओं के मिश्रण को ही सिनेमा कहा जाता है जिसे सातवीं कला के नाम से जाना जाता है. जो फिजिकली भी है और नहीं भी है. जिसमें भ्रम भी है लेकिन वो रियलिटी भी दर्शकों के सामने रख रही है.

जब तक हम इन छः कला को नहीं समझते तब तक हम कहानीकार, कलाकार और निर्देशक के द्वारा फिल्मों द्वारा इनकोड की जा रही मैसेज को डिकोड नहीं कर सकते. जिसके कई उदहारण मिल जायेंगे. अमूमन दर्शकों द्वारा किसी न किसी फिल्म को बैन करने की मांग होती रहती है. जैसे- गर्म हवा, बैंडिट क्वीन, फाइनल सलूशन, ब्लैक फ्राइडे, वाटर, पीके और इंडियाज डॉटर- द स्टोरी ऑफ़ ज्योति सिंह आदि फिल्में है जिसे लेकर दर्शकों, सेंसरशिप बोर्ड और फिल्म निर्देशकों के बीच तना-तनी की खबरे आई. राजकुमार हिरानी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पीके’ एक अतिसंवेदनशील मुद्दे पर आधारित फिल्म है जो भगवान और धर्म-कर्म के नाम पर चल रहे धार्मिक उद्योगों पर सवालिया निशान खड़ा करती है. इसे भी कुछ संगठन बैन करने के मांग कर रहे थे. ये उदहारण बताती है कि हमें विवेकशीलता की कितनी कमी है. वैसे ही इंडियाज डॉटर- द स्टोरी ऑफ़ ज्योति सिंह एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है जोकि दिल्ली में 16 दिसम्बर, 2012 को एक लड़की के साथ हुए दर्दनाक हादसे को बयान करती है. इसे भी बैन किये जाने की मांग की गयी. स्वयं को प्रोग्रेसिव कहने वाला समाज स्वयं के हकीक़त से मुंह क्यूँ मोड़ रहा इसे समझने की जरुरत है.

वर्तमान में हिंदी फिल्मों में भी कुछ कलाकार, निर्देशक सामने आये है जो प्रतिरोध की बात करते है. उनके फिल्मों में व्यावसायिकता तो है लेकिन साथ ही वो समाज के सपाट, तीखे प्रतिरोध या विरोध के विषय को अपने फिल्मों में समय समय पर लेने की कोशिश करते रहते है. इसके अंदर प्रकाश झा जैसे फिल्म निदेशक आते हैं. जिन्होंने राजनीति, गंगाजल, चक्रव्यूह और आरक्षण जैसी फ़िल्में बनाई है. प्रकाश झा जैसे निर्देशकों ने इस तरह के सिनेमा को गति दी है. प्रकाश झा द्वार बनाई गयी राजनीति फिल्म जोकि एक विशेष गति भरा कलात्मक सिनेमेटिक ट्रीटमेंट सिनेमा है. यह हिन्दुओं के एक महत्वपूर्ण काव्य ग्रंथ “महाभारत” के मेथडोलॉजी पर आधारित है. इसके अंदर नसरुद्दीन शाह है जिनका नाम फिल्म में भास्कर सान्याल है. महाभारत में करण कुंडल लेकर पैदा हुआ तो इसमें अजय देवगण हैं जो करण की भूमिका में हैं वो भी कुंडल लेकर पैदा हुआ है. नाना पाटेकर कृष्ण और रणवीर कपूर ने दुर्योधन का किरदार निभाया है. प्रकाश झा ने इस मेथडलोजी को जिस बेहतरीन ढ़ंग से रखा है ऐसे में आम दर्शक क्या समझेंगे. जब तक वो की सिनेमा की भाषा नहीं समझते. अगर वो सिनेमा की भाषा नहीं समझ पा रहे हैं तो वो इस तरह की सिनेमा को डिकोड नहीं कर सकते. कलयुग श्याम बेनेगल की सिनेमा है. आम दर्शक उसे डिकोड नहीं कर सकते, जबतक कि वो उन सारी स्थितयों को समझ न सकें. इसलिए जो ट्रीटमेंट इन फिल्मकारों ने रखा है और उसके द्वारा उन्होंने अपनी बात कही है. वहीं वर्तमान हिंदी सिनेमा में रोमांटिक युवा विद्रोहों और संतुलित प्रतिकार का शुद्ध व्यवसायिक सिनेमा का दौर भी चल है. जो तकनिकी तौर पर अर्द्धमार्गीय कलात्मक सिनेमेटिक ट्रीटमेंट वाला सिनेमा है जिसमें बड़े-बड़े बजट के फ़िल्में बनते है. इसके अंदर शाहरुख, सलमान खान और आमिर खान आदि कलाकार आते है. शाहरुख़ खान की फिल्म- माय नेम इज खान, सलमान की जय हो और आमिर की पीके आदि को इसके अंतर्गत शामिल किये जा सकते है.

पिछले कुछ दशकों से हिंदी फिल्मों में यह प्रचलन चल पड़ी है कि फ़िल्मकार आम आदमी की बेबसी और उसकी असहायता को फिल्म का कहानी का आधार बना कर प्रतिरोध की बात करने लगा है. और इसके जरिये ये फ़िल्मकार उस श्रेणी में आ जाना चाहते है जिस श्रेणी में प्रबुद्ध जन बैठकर सही मायनों में प्रतिरोध की बात करते है लेकिन हिंदी फिल्मों का यह अधूरा यथार्थ है. आम दर्शक को अब इसके प्रति जागरूक होना होगा, सिनेमा की भाषा को समझना होगा तभी मायनों में सिनेमा समाज का दर्पण कहलाने के योग्य होगा.

संदर्भ सामग्री-

· परख, जवरिमल: जनसंचार माध्यमों का सामाजिक चरित्र, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, नई दिल्ली

· रजा, डॉ राही मासूम. सं- सिंह, प्रो.कुंवरपाल: सिनेमा और संस्कृति, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

· ब्रह्मात्ज, अज: सिनेमा समकालीन सिनेमा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

· सिनेमा के सौ साल- हंस, फ़रवरी 2013

· http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=3159&pageno=31

· https://hi.wikipedia.org/wiki/व्यवसाय

· https://hi.wikipedia.org/wiki/वाणिज्य

· http://www.youthconnect.in/2015/09/04/43467/

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