व्यावसायिक सिनेमा और दर्शकअभिषेक त्रिपाठी,


पीएच.डी. शोधार्थी,

नाट्यकला एवं फ़िल्म अध्ययन विभाग,

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र।

‘‘ग्राहक देवो भवः।

हे प्रभु! तू जो चाहेगा, जैसे चाहेगा, वही और वैसे ही तेरे चरणों में भेंट करूंगा। अगर तू अपनी पसंद बता देता है तो ठीक, नहीं बताता है तो भी ठीक। मैं अपनी छठीय इंद्रीय का प्रयोग कर यह जान लूंगा कि तेरी रूचि किस सामान में है। तूझे क्या पसंद है? और क्या-क्या पसंद आ सकता है? और यदि एक बार जान गया तो समझ लो फिर तुम्हें कभी कहना नहीं पड़ेगा। वह सामान तेरे सामने इतने परिमाण में हाजिर करूंगा, इतने परिमाण में.... कि तू भी कहेगा-

‘‘बस भी करो यार, जान लोगे क्या!’’

यदि यह कहें कि व्यावसायिक फि़ल्म बनाने वाला फि़ल्मकार फि़ल्म बनाते वक्त दर्शकों की पसंद-नापसंद को लेकर उपर्युक्त भाव ही रखता है तो बिल्कुल ग़लत नहीं होगा।

‘‘दर्शक देवो भवः’’

‘‘व्यवसाय’’! फिल्म विधा से जुड़े लोगों व इस विधा के अध्यायी छात्रों के लिए यह शब्द खास महत्व का है। यदि समकालीन फिल्मी लोगों की ब्रेनमैपिंग की जाय तो बहुत हद तक संभव है कि परिणाम में ‘व्यवसाय’ ही प्रमुखता से उभरे; फि़ल्म (कला) गौण स्वरूप धारण कर बंगले झाँकता नज़र आये! ऐसी दशा में यदि यह कहा जाय कि कुछ विशेष करने का उद्देश्य लेकर इस विधा की ओर रूख करने वाले कुछ आंदोलनकारी प्रतिभाओं को यह शब्द रात की नींद में हैमर करता होगा.... या, कह दिया जाए कि पूरी की पूरी नींद उड़ा देता होगा, तो शायद गलत न हो। बात के पीछे तगड़ा लॉजिक है- वर्तमान समय, उसकी तासीर, उसकी गति; ऐसे तत्व जिनके प्रभाव से कोई अछूता नहीं है, न दर्शक, न निर्माणकर्ता।

व्यवसायिक सिनेमा के संबंध में बात शुरू करने से पहले यदि सिनेमा के प्रकारों से अवगत होते हुए आगे की ओर रूख करें तो श्रेयस्कर होगा।

सिनेमा की उत्पत्ति वैज्ञानिक जिज्ञासा और व्यावसायिक संभावना की परिणति मात्र थी, परंतु कालांतर में कला इसमें मजबूती के साथ समाहित हुयी और उसने अपना वास्तविक स्वरूप प्राप्त किया। सिनेमा को सिर्फ व्यवसाय या सिर्फ कला कहना नितांत अनुचित है। भारत में सिनेमा की उत्पत्ति कला और व्यवसाय दोनों के मध्य संतुलित सामंजस्य के साथ शुरू हुई थी। कला और व्यवसाय का यह मेल तब से लेकर अब तक बना हुआ है और तब तक बना रहेगा जब तक सिनेमा का अस्तित्व रहेगा। फिल्में चाहे कोई भी हों- व्यावसायिक सिनेमा या तथाकथित कला सिनेमा; प्रत्येक पर यह बात एक समान रूप से लागू होती है। अंतर सिर्फ इतना भर है कि किसी फि़ल्म के निर्माण के वक्त कला प्रेम सर्वोपरि होता है, तो किसी फि़ल्म के निर्माण में व्यावसायिक हित! कला प्रेम को केन्द्र में रखकर बनी फि़ल्म जहाँ कला सिनेमा बन जाती है, कला और व्यवसाय को बराबर का महत्व देने वाली फि़ल्में बीच का सिनेमा बन जाती है तो वहीं व्यावसायिक हितों की प्रधानता वाली फिल्में व्यावसायिक सिनेमा का चोला धारण कर लेती हैं।

लार्जर दैन लाईफ की विहंगम अवधारणा, सिल्वर स्क्रीन की मन को रोमांचित कर देने में समर्थ अनोखी दुनिया, करोड़ो-अरबों का भारी भरकम बजट, भव्य सेट, झमाझम तकनीकी, ग्लैमर, चकाचौंध, तड़क भड़क के झर्राकेदार मसाले से अभिसिंचित किस्सागोई, आईटम नंबर्स....... व्यावसायिक सिनेमा की यह पहचान है।

निर्माण में अथाह धन लगा होने के नाते फिल्म के लिए यह अत्यावश्यक है कि वह बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन करे; और यह प्रदर्शन दर्शकों के स्वीकार या तिरस्कार पर निर्भर करता है। कभी कभी तो ऐसा होता है कि फिल्म निर्माता की कमर एक ही फिल्म को पूरा करते-करते इस तरह झुक जाती है कि यदि दुर्भाग्य से उसकी पहली ही फिल्म न चली तो वह जीवनभर तनकर खड़ा नहीं हो पाता। निर्माता की यही मंशा होती है कि वह अधिक से अधिक धन की उगाही कर सके। इसके लिए उसे उसी घिसी-पिटी लीक पर फिल्में बनाने पर मज़बूर होना पड़ता है जो दर्शकों को रास आती है। फि़ल्म निर्माण का एक बहुत बड़ा भाग वैसे लोगों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है जो विशुद्ध व्यापारी होते हैं। बाज़ार का नियम यही होता है कि ग्राहक को संतुष्ट किया जाए।

सिनेमा सहित सभी जनसंचार के माध्यमों का विकास समाज की भौतिक जरूरतों से भले ही हुआ हो लेकिन इन भौतिक जरूरतों का एक सांस्कृतिक आयाम भी होता है। इसी वजह से इन्हें सांस्कृतिक उत्पाद कहा जाता है। सांस्कृतिक उत्पाद होने के बावजूद इनका निर्माण, पुनर्निर्माण, वितरण और रख-रखाव में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल, तरह-तरह के उपकरण और यंत्र, कुशल तकनीशियन, कलाकार और निष्पादक की जरूरत पड़ती है और इस जरूरत को पूरा करने के लिए पूंजी की जरूरत होती है। जब सांस्कृतिक उत्पाद तैयार हो जाता है तो उनको ग्रहीताओं तक पहुंचाने के लिए बाजार के विशाल तंत्र की जरूरत होती है। जाहिर है कि सांस्कृतिक उत्पाद की संकल्पना से लेकर उन्हें ग्रहीता तक पहुंचाने के सारे चरण व्यवसाय और बाज़ार की जरूरतों से तय होते हैं। बाज़ार एक हद तक ऐसे सांस्कृतिक उत्पादों के निर्माण को प्रोत्साहित करता है जिनके क्रय-विक्रय में कम से कम खतरे निहित हों। व्यावसायिक फिल्म का निर्माता इस खतरे को कम करने के लिए स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि उसकी फिल्म का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है।

आरंभिक दिनों में सिनेमा में आर्थिक लाभ से प्रभावित होकर बहुत सारी फिल्म कंपनियाँ खुलीं, किन्तु उनमें से अधिकांश आर्थिक घाटे की वजह से बंद हो गईं। फिल्म उद्योग की आर्थिक अस्थिरता ने उन घटकों की खोंज की ओर प्रेरित किया, जो फिल्म की सफलता की आश्वस्ति दे सकें। इन घटकों को फॉर्मूला और इनके आधार पर निर्मित फिल्मों को फॉर्मूला सिनेमा कहा जाता है।

विजय अग्रवाल लिखते हैं कि ‘‘व्यावसायिक फिल्में सूत्रबद्ध होती हैं। उनका एक बना बनाया फॉर्मूला होता है, जिसमें नायक-नायिका और खलनायक का त्रिकोण होता है। ऐसी फिल्मों को आम लोग ‘बम्बईया फिल्म’ कहते हैं। यह व्यंग्यात्मक संज्ञा है। इन फिल्मों के कथानक मुख्यतः श्रृंगार प्रधान या प्रकारांतर से करूण भाव प्रधान होते हैं। इन फिल्मों ने जब कथानक के लिए भारतीय इतिहास के पन्ने पलटे तो वहाँ भी उन्हें शासकों के प्रेम प्रसंगों के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला। आरंभिक फिल्मों के प्रेम कथानकों में फिर भी एक गंभीरता और उदात्तता थी। बाद में बॉबी फिल्म से एक नए प्रेम की शुरूआत हुई, ‘टीन एज लव’ की। किशोर प्रेम पर आधारित इन फिल्मों का सामाजिक प्रभाव यह पड़ा कि प्रेम की समझ की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते ‘टीन एज लव’ के फैशनपरस्त प्रेमी थक से चुके थे।’’

सन् 1970 के बाद से हिन्दी कॉमर्शियल सिनेमा में हिंसा और सेक्स उत्तेजना भड़काना सबसे सफलतम फॉर्मूला है; क्योंकि दर्शकों को यही रास आ रहा है। आज फिल्म निर्माण व्यवसाय से आगे बढ़कर जुआ हो गया है। अर्थात एक लगाओ, बीस पाओ। फिल्में सरकारी संस्थाओं की हों या निजी निर्माताओं की, पूंजी के हित से ही संचालित होती हैं। विशाल पूंजी की आवश्यकता और बाज़ार के जोखिम ने फिल्म निर्माता को एक बनिया बना दिया है, जो हमेशा बॉक्स ऑफिस की चिंता से ग्रस्त रहता है। निर्देशक और कलाकार जिनमें शुरू में कुछ रचने की तड़प होती है, बाज़ार के निर्मम नियमों से टकराकर शीघ्र ही व्यवसायी, दलाल या मज़दूर बन जाते हैं। इनका अपने उत्पाद से पूरी तरह से विच्छेद हो जाता है। कलाकार अब दावा नहीं कर सकता कि उसके द्वारा निर्मित फिल्म वैसी ही है, जैसी उसने पूर्व में कल्पना की थी।

व्यावसायिक फिल्मों का सबसे उपेक्षित घटक कहानी और पटकथा ही है। व्यावसायिक फिल्मों के निर्माण से जुड़े हर व्यक्ति के पास एक कहानी होती है, कहानीकार को छोड़कर। इसका कारण यह है कि व्यावसायिक फिल्मों की कहानियों में इतनी एकरूपता होती है कि मामूली से हेर फेर से एक नई कहानी बन जाती है।

आज बॉडीगार्ड, रेडी, सिंघम, बोल बच्चन, रा-वन, चेन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्मों का बोलबाला है। दर्शकों के मनोविज्ञान को कुछ फिल्मकारों ने बखूबी समझ लिया है और ऐसी फिल्में बनाने की ही चेष्टा जोर शोर से हो रही है जो किसी भी तरह बस दर्शकों को पसंद आ जाय, भले ही वह फिल्म की कलात्मकता का जनाजा निकाल दे। दर्शकों के कसौटी पर खड़ा होने के चक्कर में आजकल कुछ ऐसी फिल्में भी बना दी जा रही हैं जो परिपक्व अभिनेताओं के अभिनय क्षमता का राम नाम सत्य कर देती हैं। अगर आप ‘तीस मार खाँ’ देखें तो मैं उम्मीद करता हॅूं कि बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा। अक्षय खन्ना साहब का अभिनेता वेण्टिलेटर पर लिटा हुआ लगता है, और अक्षय कुमार का अभिनेता आई0 सी0 यू0 में भर्ती! दर्शकों के मनोविज्ञान पर किसी अज्ञात विश्वविद्यालय से पीएच0 डी0 कर आए सलमान खान ने दर्शकों को रिझाने के लिए जो नृत्य किया उसे देखकर आपको पता चल जाएगा कि व्यवसायिक सिनेमा का विषय और शिल्प कहाँ से नियंत्रित हो रहा है?

दर्शकों को जो चाहिए उसके सामने परोस दिया जा रहा है। अब दर्शकों को भुवनसोम, उसकी रोटी, अंकुर, निशांत जैसी फिल्में नहीं चाहिए; उसे चाहिए स्टार्स का अभिनय, नाच-गाना, हीरो-विलेन की जबर्दस्त फाइट्स, प्रेम प्रसंग पर आधारित गुदगुदाने वाले कथा-संदर्भ, भौंडी भावनाओं को उद्वेलित करने वाले- भींगे होंठ तेरे, शीला की जवानी, मुन्नी बदनाम हुई....जैसे गाने, अन्तःवस्त्र में जल्दी से आ जाने वाली हीरोईने, दबंग के ‘इतने छेद करेंगे कि भूल जाओगे कि सांस कहाँ से ले और पादे कहाँ से’ जैसे डायलाग, चुलबुल पाण्डेय जैसी अदाएं!

किसी फि़ल्म में हीरोईन अंन्तःवस्त्र में आयी क्या.... सिनेमा हॉल में हूटिंग और सीटी बजनी शुरू; दर्शकों का रोमांच उफान पर! इमरान हाशमी टाईप एक-दो किस सीन है, तो फिर क्या पूछना! बल्ले-बल्ले! ऊपर से फि़ल्म में शीला की जवानी टाईप एक आइटम डांस भी है तो फिर सोने पे सुहागा! दर्शकों की तो लाटरी लग जाती है।

व्यावसायिक फि़ल्मकार तो बस दर्शकों की ऐसी फितरत ताड़ते रहते हैं। लीजिए शुरू हो गया दर्शक देव को संतुष्ट करने का खेल। कहानी को भले बेवजह यू0पी0 से हजार किलोमीटर दूर गोवा ले जाना पड़े, मुम्बई ले जाना पड़े, ले जाओ। हीरोईन को किसी तरह बीच पर पहुंचाओ, नहाये तो ठीक; न नहाये तो भी कपड़े उतरवा दो।

दर्शकों को खुश करने के लिए इमरान हाशमी टाईप किस करवाना है तो बस करवाना है। जगह और परिस्थिति अनुकूल हो या नहीं; कोई फर्क नहीं पड़ता। भले हीराईन की माँ मर गयी हो, हीरो किस कर सकता है..... जस्टीफाई हो जाएगा।

अब आईटम नंबर जैसे उत्तेजनात्मक नृत्य की भी बात कर ली जाय। दर्शक चाहता है, क्या हर्ज है जोड़ो। अरे कहीं डाल दो यार! सीरियस सीन में भी घुसेड़ दो, क्या फर्क पड़ता है? भारतीय पुलिस की, सेना के जवान की छिछालेदर होती हो तो क्या? होने दो। दर्शकों को रिझाने के लिए सब चलेगा। इंसपेक्टर चुलबुल पाण्डेय नाच रहा है तो नाचने दो, छोटा पुलिस अधिकारी है, मौज कर रहा है करने दो, आखिर वह भी तो इंसान है, उसका भी तो मन है! सब जस्टीफाई हो जाएगा।

एक ओर से हीरो की गाड़ी आ रही है, एक ओर से विलेन की गाड़ी आ रही है।

ये आ रही है, आ रही है, आ रही है....

ये टकरायी.... बूम......

दोनों गाडियाँ हवा में गयी, हवा में गयी, गयी...., गयी...

पहली कलाबाजी..... दूसरी कलाबाजी.... तीसरी कलाबाजी...

दर्शकों कों की सांसें अटकी हुयीं हैं। सिनेमा हॉल में सन्नाटा!

अचानक सीटियों की गूँजें, तालियों की आवाज, जोरदार हूटिंग....!

ये क्या! हवा में हीरो की गाड़ी का दरवाजा खुलता है और वो बाहर निकल रहा है। दोनों गाड़ी जमीन पर गिरती है और जोरदार विस्फोट- बूम.....

हीरों सीना तानकर चलता हुआ स्क्रीन पर नज़र आता है। दर्शकों की सीटियाँ, तालियाँ। सिनेमा हॉल के बाहर की उमड़ी भीड़। हाउसफुल का बोर्ड!

रोहित शेट्टी साहब की एक फि़ल्म में हवा में कलाबाजियाँ खाती गाड़ी को देखते हुए दर्शकों ने ताली क्या बजा दी, लीजिए अब तो वे गाड़ी तोड़ो-फोड़ो स्पेशलिस्ट ही हो गये! उन्हें पता चल गया कि इधर गाड़ी टूटी, उधर फि़ल्म हिट हुयी। अब उनकी हर फि़ल्म में गाड़ियाँ ऐसे टूटती हैं जैसे गाड़ी कंपनी वालों ने लोहे की बजाय सीमेण्ट-बालू के मसाले से गाड़ियाँ बनानी शुरू कर दी है; वह भी एक-आठ के अनुपात के ठेके वाले मसाले से!

व्यावसायिक सिनेमा का यही सच है। व्यवसाय सर्वोपरि है। एक लगाना है, बीस कमाना है। सौ का भी सपना देखा जा सकता है। दर्शकों को खुश करने के अलावा दूसरा चारा नहीं है। दर्शक सर्वोपरि है, उसकी पसंद-नापसंद सर्वोपरि है। बाकी चीज़े गौण हैं। व्यावसायिक सिनेमा दर्शक के लिए है, उसका कथ्य और शिल्प भी उसी के लिए है। वही आधार है, उसी को साधना है।

अभिषेक त्रिपाठी,

पीएच.डी. शोधार्थी (जूनियर रिसर्च फ़ेलो),

नाट्यकला एवं फ़िल्म अध्ययन,

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र।

मोबाइल- 09623278236

Email- pingaakshaa@gmail.com

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