वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ : एक उत्तर औपनिवेशिक गाथा

वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ : एक उत्तर औपनिवेशिक गाथा

उत्तर उपनिवेशवाद, बीसवीं सदी के अंतिम दौर में आरंभ होने वाला एक ऐसा शब्द जिसने न केवल राजनैतिक दर्शन को अपने प्रचलन का क्षेत्र बनाया अपितु हिन्दी को भी विशेष प्रभावित किया। ‘उत्तर- उपनिवेशवाद’ अंग्रेजी के ‘पोस्ट कोलोनियलिज्म’ (Post colonialism) का हिन्दी पर्याय है। उत्तर-उपनिवेशवाद की अवधारणा उन देशों के स्वत्व की तलाश का परिणाम है जो यूरोपीय देशों की दासता से आज़ादी चाहते थे। परंतु केवल इतना जान लेने से ही हम उत्तर-उपनिवेशवाद को पूरी तरह से नहीं जान लेते यदि कोई ऐसा कहता है कि इतने से ही उसने सब कुछ जान लिया है तो वह अपनी मूर्खता का परिचय दे रहा होता है।

उत्तर उपनिवेशवाद को समझने से पहले हमें उपनिवेशवाद को समझना होगा क्योंकि हम मां को जाने बिना संतान को नहीं समझ पायेंगे। जब हम उपनिवेशवाद पर अपना अध्ययन आरंभ करते हैं तब यह पाते हैं कि उपनिवेशवाद सत्रहवीं शती के अंतिम दशकों में प्रकाश में आया। इसके केन्द्र में वाणिज्य था। 16वीं तथा 17वीं शताब्दियों में यूरोप के कुछ देशों ने अपनी नौ-शक्ति के आधार पर दूसरे महाद्वीपों पर अधिकार कर लिया और उन्होंने वहां धर्म तथा व्यापार का प्रसार किया। यह एक ऐसी परिस्थिति थी जिसने पूरी दुनिया पर पश्चिमी राष्ट्रों के वर्चस्व के लिये भूमिका तैयार की। पश्चिमी राष्ट्रों के इस बढते हुए प्रभाव ने उपनिवेशित देशों की जनता में हीनता बोध की भावना को जन्म दिया। उपनिवेशकों की जीवन-शैली, भाषा, चिंतन, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा आदि उपनिवेशितों के मानक और आदर्श बन गये। प्रशासन, शिक्षा और साहित्य पर अंग्रेजी का आधिपत्य स्थापित होने लगा केवल यही नहीं बल्कि इसने लोक संस्कृति को भी गहरे प्रभावित किया। संक्षेप में कहा जाये तो-

‘ उपनिवेशवाद, पूंजीवादी राष्ट्रों द्वारा कमज़ोर देशों पर अधिकार कर उनके आर्थिक संसाधनों को लूटने की एक प्रक्रिया है। यह एक ऐसी घुसपैठ जो किसी राज्य के आर्थिक, सामाजिक, भौतिक, राजनीति को तेजी से अपने कब्ज़े में लिया जा सके।‘

उपनिवेशवाद को साम्राज्यवाद का परिणाम मानते हुए आलोचक अवधेश कुमार सिंह लिखते हैं-

“ किसी दूरस्थ क्षेत्र पर शासन कर रहे किसी प्रबल महानगरीय केंद्र के सिद्धांत, व्यवहार और दृष्टिकोण का नाम साम्राज्यवाद है। उपनिवेश कायम करने का परिणाम है।“

“उपनिवेशवाद में उपनिवेशक, उपनिवेशितों को सिर्फ वस्तु मानता है, जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का मात्र उपकरण है।“

(उत्तर आधुनिकतावाद,उत्तर उपनिवेशवाद और भारत, लेखक- अवधेश कुमार सिंह, आलोचना (पत्रिका), जनवरी-मार्च 2003, पृष्ठ संख्या-149)

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपनिवेशवाद अमीर देशों द्वारा गरीब देशों पर अधिपत्य की लड़ाई है और यह लड़ाई आज भी चल रही है जिसे साम्राज्यवाद कहा जाता है। यह साम्राज्यवाद ही उत्तर औपनिवेशिकता के केन्द्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साम्राज्यवाद को परिभाषित करते हुए अफ्रीकी लेखक न्युगी वा थ्योंगो कहते हैं-

“ साम्राज्यवाद हथियारों से हमला करने के पूर्व सांस्कृतिक आक्रमण करता है जो उपनिवेशों की जनता की संस्कृति के खिलाफ़ लंबे समय तक जारी रहता है। नव-औपनिवेशिक स्थितियों में यह सांस्कृतिक हथियार और भी तेजी से काम करता है ताकि इसके ज़रिये नया शासक वर्ग, जो एक दलाल पूंजीपति की भूमिका निभाता है और अपने भूतपूर्व ऐतिहासिक शासकों के हितों की रक्षा करने वाली मानसिकता का निर्माण कर सके।“

(website- www.en.wikipedia.org/wiki/post/colonialism)

अमिल्कर कबराल का मानना है कि –

“ साम्राज्यवाद जब गुलाम देश की जनता के ऐतिहासिक विकास को नकारता है तो वह बुनियादी तौर से उसके सांस्कृतिक उत्पीड़न का सहारा लेता है। इस प्रक्रिया में वह शासित लोगों की संस्कृति के मूल तत्वों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पूरी तरह नष्ट कर देने का प्रयास करता है।“

(website- www.en.wikipedia.org/wiki/post/colonialism)

उपर्युक्त परिभाषओं में जो बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आ रही है वह यह कि उत्तर औपनिवेशिकता के केन्द्र में जो शक्ति कार्य करती है वह है साम्राज्यवाद। गौर से विचार करने पर हम यह भी पाते है कि साम्राज्यवाद संस्कृति पर आक्रमण करता है और ऐतिहासिक विकास को नकारता है। साम्राज्यवाद आज भी रूप बदलकर हमारी संस्कृति पर हमला बोल रहा है। कुछ दिनों पहले मनोहर श्याम जोशी की एक कहानी पढी, शीर्षक था ‘सिल्वर वेडिंग’। इस कहानी के प्रमुख पात्र हैं यशोधर बाबू जो तकिया कलाम के रूप में दो वाक्यों का प्रयोग करते है – पहला, जो हुआ होगा और दूसरा, समहाउ इमप्रापर। ये दोनों ही स्थितियां उपभोग के साम्राज्य के विस्तार का परिणाम है जो यथास्थितिवाद और अनिर्णय जैसी स्थितियों को जन्म देती हैं।

इस उदाहरण को देने के पीछे जो उद्देश्य निहित है वह है उत्तर औपनिवेशिक स्थितियों में साम्राज्यवाद के बदले स्वरूप को दर्शाना। अब तक उपनिवेशवाद और उसके केंद्र में स्थित साम्राज्यवाद पर विस्तृत चर्चा के बाद जब हम उत्तर औपनिवेशिकता पर आते हैं तब हमारे सम्मुख इसके दो आयाम उभर कर सामने आते हैं-

पहला, उपनिवेशित देशों की कला, भाषा, साहित्य, संस्कृति का सशक्तिकरण। और

दूसरा, बाज़ारवाद और उदारवाद से उत्पन्न विश्वग्राम की संकल्पना।

इस आधार पर उत्तर औपनिवेशिकता को परिभाषित करते हुए बिल आशक्रोष्ट कहते हैं-

“ उत्तर औपनिवेशिकता, उपनिवेशीकरण से आज तक के साम्राज्यवाद से प्रभावित सारे सांस्कृतिक परिणामों की ओर संकेत है।“

( The Empire Writes Back, Theory and Practice (New York: Routledge, 2002) page no- 149)

आलोचक डेलरिक के अनुसार-

“ उत्तर औपनिवेशिकता वैश्विक पूंजीवाद की समग्रता की स्थिति है।“

(Ania Loomba, Colonialism, post colonialism (New York Routledge, 2007)

आलोचक लीला गांधी के शब्दों में-

“ उत्तर औपनिवेशिकता, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक वैश्वीकरण के लिये प्रयुक्त किया गया एक दूसरा नाम है।“

( Post Colonial Theory, Leela Gandhi (Oxford University Express, 1998, New Delhi)

उपर्युक्त परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि उत्तर औपनिवेशिकता, विश्वग्राम और ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक तर्कों का परिणाम है। इनके अतिरिक्त यदि उत्तर औपनिवेशिक स्थितियों पर और विस्तार से चर्चा की जाये तो हमें इसकी कुछ अन्य प्रवृतियों का पता चलता है जिनमें विज्ञापन, बाज़ारवाद, वृद्ध पूंजीवाद, बहुराष्ट्रीय निगम आदि प्रमुख हैं।

उत्तर औपनिवेशिकता की परिभाषाओं पर एक विस्तृत चर्चा के बाद जब हम उदय प्रकाश की कहानी वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ पर दृष्टिपात करते हैं तो हम पाते है कि उदय प्रकाश ने इस कहानी में इतिहास का वर्तमान से कल्पना, यथार्थ और फैंटेसी के माध्यम से सामंजस्य स्थापित किया है जो हिन्दुस्तान के औपनिवेशिक अतीत के साथ वर्तमान की पीड़ा और विडम्बना को भी व्यक्त करती चलती है।

उदय प्रकाश जी की इस कहानी को लेकर साहित्य जगत में एक विवादास्पद स्थिति ने जन्म लिया था। किसी ने इस कहानी को ‘ओरिएंटलिज्म’ का शिकार बताया तो किसी ने ‘बीसवीं सदी का संकट’। कहा जाता है न कि जो रचना जितनी विवादास्पद होती है वो उतना ही अधिक पढी जाती है। उदय प्रकाश की यह कहानी विवादों में घिरे होने के बावजूद भी पाठकों को अपनी ओर तेजी से आकर्षित करती रही है और आज भी एक गहन एवं गंभीर चिंतन की मांग करती है।

‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ एक रूपक कथा है जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि यह कहानी अतीत के साथ वर्तमान का सामंजस्य है तभी तो कहानी का आरंभ ही कथाकार इस प्रकार से करता है-

“ इस कहानी में इतिहास उतना ही है, जितना दाल में नमक होता है। अगर आप इसमें इतिहास ढूंढने की कोशिश करते हैं तो आपके हाथ में रेत की ढूह या कनेर की टहनी भर आयेगी। असल में जब इतिहास में स्वप्न, यथार्थ में कल्पना, तथ्य में फैन्टेसी और अतीत में भविष्य को मिलाया जाता है तो आख्यान में लीला शुरू होती है और एक ऐसी माया का जन्म होता है, जिसका साक्षात्कार सत्य की खोज कि ओर एक यात्रा ही है……।“

(प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-224)

उदय प्रकाश जी का यह कथन सत्य की खोज के लिये एक प्रयास के रूप में उभर कर हमारे सामने आता है एक ऐसा सत्य जिसकी जड़ें तो अतीत में हैं लेकिन उसकी पकड़ वर्तमान तक है और वे अतीत के साथ-साथ वर्तमान को भी गहरे प्रभावित कर रही हैं।यह कहानी भारतीय समाज में आ रहे उन बदलाओं को बड़ी सफलता से चित्रित करती है जब साहित्य के साथ अन्य कलाओं का अंतर्सम्बंध टूट गया है हर तरफ कृत्रिमता हावी है। इस कृत्रिम समय में भी कहानीकार वास्तविकता को ढूंढने से नहीं चूकता और कहानी को आगे बढाता हुआ कह पड़ता है-

“लेकिन सच यह भी है कि ढाई सौ साल पहले और आज के बीच कुछ ऐसा भी है, जो ज़रा भी नहीं बदला है। वह ज्यों का त्यों है।“

(प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-224)

कहानी को थोड़ा और आसान बनाने के लिये और इस विस्तृत आलोचना के मध्य आ रही शिथिलता को और गति प्रदान करने के लिये उदय प्रकाश का यह कथन सहायक सिद्ध होता है-

“ जिस भारतीय मध्यवर्ग की बात आज हम करते हैं और जिस पर पिछ्ले दो दशकों से सारी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं, कार से लेकर कपड़ों, घड़ी-शराब से लेकर सौन्दर्य प्रसाधनों और पेप्सी, पिज़्ज़ा, कुरकुरे से लेकर लैपटाप और मोबाइल बनाने वाली विदेशी कम्पनियां जिनकी खिदमत में रोज नये ब्रांड, नये प्रोडक्टस और नये विज्ञापनों के साथ बाज़ार में उतर रही है, ज़रा उसके चाल, चरित्र और चेहरे को तो पहचान लें।“

(लेख- मध्य वर्ग का आई कार्ड, पुस्तक- नयी सदी का पंचतंत्र,लेखक उदय प्रकाश, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-163)

उपरोक्त अंश हालाकि कहानी के मध्य आता है परंतु पूरी कथा की पहली परत यहीं नज़र आती है। भारत में अंग्रेजों का आगमन व्यापारी के रूप में हुआ परंतु यह भारत जैसे उपनिवेश के लिये कोई नयी बात नहीं थी क्योंकि यहां डच, फ्रेंच, पुर्तगाली कम्पनियां पहले ही प्रवेश कर चुकी थीं लेकिन अंग्रेजों ने जिस व्यापार नीति को अपनाया उसने बाकी कंपनियों की नीतियों को ध्वस्त कर दिया और यही है वह बिंदु जहां ढाई सौ साल पहले की कहानी आज की कहानी बनती है। आज बाज़ार का रूप बदला है, विज्ञापन संस्कृति ने हल्ला बोल रखा है। जिस बाज़ार को निर्मित करने के लिये अंग्रेज़ इंग्लैंड से भारत आये आज वह बाज़ार एक क्लिक पर हमारे बीच अपने ‘आफरों’ के साथ उपस्थित हो जा रहा है। कहानी में एक स्थान पर इस स्थिति का चित्रण उदय प्रकाश जी ने बड़ी सफलता से किया है-

“यह वह दौर था जब फ्रांसीसी कंपनी और इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच यूरोप, अमेरिका और एशिया के समुद्रों, बाज़ारों और प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने के लिये बीस साल से लड़ाई चल रही थी। इस होड़ में डच और पुर्तगाली भी शामिल थे, लेकिन वे कमज़ोर पड़ते जा रहे थे।“

(प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 230)

ये तो रही इतिहास की बात,’वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ कहानी लिखनेवाले उदय प्रकाश एक पारखी नज़र रखते हुए संस्कृति में आ रहे बदलावों और उस संस्कृति में बाज़ार की घुसपैठ को भी बड़ी बारीकि से चित्रित करते हैं।

इस कहानी के कथावस्तु के केन्द्र में जो उद्देश्य निहित है वह आज से तीन सौ साल पहले का भारतीय परिवेश है। चूकि पहले ही कहा जा चुका है कि अंग्रेजों से पूर्व भारत में डच, फ्रेंच, पुर्तगाली क्म्पनियां आकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही थीं और तीन सौ साल पहले का इतिहास आज 2015 में पुन: उसी रूप में हमारे सामने उपस्थित है फर्क है तो बस इतना की अब ‘भारत’ कहलाने वाला देश ‘इंडिया’ में तब्दील हो चुका है।तीन सौ साल पहले भी अंग्रेजों का एकमात्र लक्ष्य मुनाफा कमाना था और ठीक इसी उद्देश्य को लेकर वर्तमान समय में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपना स्वार्थ सिद्ध कर रही हैं। एक वाक्य में कहें तो यह कहानी एक ऐसी कहानी है जो विदेशी कम्पनियों द्वारा भारतीय स्वतंत्रता और संप्रभुता पर किये जाने वाले हमले के विरोध में खड़ी होती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस हमले ने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया बल्कि उसने यहां एक ऐसे वर्ग को जन्म दिया जो किसी भी कीमत पर और जल्द से जल्द सम्पन्न बनना चाहता था। जल्द से जल्द सम्पन्न बनने की इस दौड़ में इस वर्ग से जो हो सकता था उसने वो रास्ता अख्तियार किया-

“ मैं सिर्फ़ यह कहूंगा कि अराजकता का ऐसा दृश्य, ऐसा भ्रम, ऐसी घूसखोरी और बेईमानी, ऐसा भ्रष्टाचार और ऐसी लूट-खसोट जैसी हमारे राज में आज दिखाई दे रही है, वैसी किसी और देश में न कभी सुनी गई, न कभी देखी गई। अचानक धनाढ्यों की बेइंतेहा दौलतपरस्ती विलासिता और भोग के भीषण रूप को चारों तरफ पैदा कर दिया।“

(प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, पृष्ठ संख्या- 224)

अब तक की गई चर्चा को यदि संक्षेप में कहा जाये तो हम कह सकते है कि यह कहानी जहां एक ओर भारत के भयानक साम्राज्यवादी शोषण, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार को उभारती है तो वहीं दूसरी ओर मूक और असहाय लोगों के प्रतिरोध को भी स्वर देती है। केवल यही नहीं यह कहानी अपने तीसरे पक्ष को भी उद्घाटित करती है जिसका संबंध उच्च तबके के रईस हिंदुओं “ऐतिहासिक ‘इलीट’ अभिजनों के अवसरवाद और भ्रष्टाचार से है जो अंग्रेजों की कृपा दृष्टि पाने के लिये अपने बहू बेटियों तक को दांव पर लगाने से नहीं चूकते थे।

उपरोक्त कथन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ कहानी एक युग और उसके मनुष्यों के लिये गढी गई परिभाषा ‘ Be a complete men’ की ‘incompletability’ को उद्घाटित करती है।

इस कहानी में एक स्थान पर सूरत की फैक्ट्री में आये मिस्टर फ्रेयर का प्रसंग आया है जो इंग्लैण्ड लौटने पर ‘इंडिया’ को कुछ इस तरह से परिभाषित करता है और ‘इंडियंस’ की ‘इनकम्प्लिटाबिलिटी’ को उजागर करता है-

‘वह एक अजीबो गरीब देश है।‘

वास्तव में यह परिभाषा कोई साधारण परिभाषा नहीं है यदि हम इस परिभाषा के तह तक जाएं तो पाएंगे कि यह भारत को ‘इंडिया’ बनाने की पहली मुहिम है। लड़के द्वारा अंग्रेजों का भविष्य बताया जाना इस मुहिम को आगे बढाता है-

“जब अंग्रेज मालामाल होकर इंग्लैण्ड लौट जायेंगे और इंडिया में उनके जैसे ही नेटिवों का राज होगा। वे लोग वही खायेंगे जो अंग्रेज खाते है, वही पियेंगे जो अंग्रेज पीते है। ये वही भाषा बोलेंगे जो अंग्रेज़ बोलते है। उनके कपड़े,विचार, स्वप्न और आकांक्षाएं अंग्रेज होंगी। वे हर इंडियन चीज़ से घृणा करेंगे। वे इंडिया को उससे भी ज्यादा लूटेंगे, जितना विदेशी कंपनियों ने लूटा है।“

( प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, किताबघर प्रकाशन, प्रथम पेपरबैक संस्करण, पृष्ठ संख्या- )

यह है उत्तर आधुनिकता का पहला चरण जो इस कहानी की पृष्ठभूमि में कई महत्वपूर्ण सवालों को जन्म देता। फ्रेयर की बात का हेस्टिंग्स पर गहरा प्रभाव पड़ता है और वह जिस ताज्जुब और विस्मयभरी दृष्टि से भारत को देखता था धीरे-धीरे उससे घुल-मिल जाता है। वह भारतीय कला, धर्म और मनुष्यों के प्रति लगाव और अभिरूचि को दर्शाता है। आज ऐसा ही तो हो रहा है जब हमारी संस्कृति की तहों में घुसकर हमले किये जा रहे हैं जो मानसिक और आर्थिक स्तर पर किये जाने वाले हमलो को ढंकने का एक तरीका है। कुछ दिनों पहले एक फ़िल्म आयी थी ‘स्लमडाग मिलियनेयर’। इस फ़िल्म ने सफलता की सारी ऊंचाईयां छू ली लेकिन किसी का ध्यान इस फ़िल्म की उद्देश्य पर नहीं गया। इस फिल्म की पृष्ठभूमि के केंद्र में भारत है परंतु इसका प्रमुख उद्देश्य भारत की गरीबी को भुना अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना था। मेरी इस बात से कुछ लोग असहमत भी हो सकते हैं लेकिन इस फ़िल्म के उदाहरण के माध्यम से आलोच्य कहानी के विषय वस्तु की ओर इशारा करने की एक कोशिश की है।

उत्तर औपनिवेशिकता समाजवाद और साम्यवाद का गला घोंटकर आगे बढती है। हेस्टिंग्स जब बुंतू के साथ भारतीय कलाकृतियां देख रहा होता है तब उसे शेक्सपीयर की एक पंक्ति याद आती है-

‘ इफ़ यू हैव टू डिफीट देम, यू हैव टू किल देयर मेमोरिज। यू हैव टू डेस्ट्राय देयर पास्ट यू हैव टू शूट देयर स्टोरिज।“

उपरोक्त पंक्ति में समाजवाद और साम्यवाद कराहता नज़र आता है। भले ही शेक्सपीयर ने यह कथन किसी नाटक के पात्रानुकूल परिवेश के लिये किया हो लेकिन कहानी के संदर्भ में यह पंक्ति गंभीर अर्थ को व्यक्त करती है और उत्तर औपनिवेशिकता के चरित्र को उद्घाटित करती है। आज बौद्धिकता लुप्त प्राय है क्योंकि ब्रांड की दौड़ ने एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया है जिसमें सोचने का वक्त नहीं है। अच्छे और बुरे का फर्क खत्म हो गया है अर्थात बौद्धिकता का स्थान उपभोग ने ले लिया है। इस कथन पर थोड़े और विस्तार से चर्चा करने पर हम पाते है कि कहानी में यह कथन वारेन हेस्टिंग्स की मानसिकता को दर्शाता है। जिस तरह ‘ब्रांड’ की अंधी दौड़ में पूरी दुनिया हांफ रही है ठीक उसी प्रकार कहानी में वारेन हेस्टिंग्स के माध्यम से अंग्रेजों की अराजक नीतियों का पर्दाफाश करते हुए कहानीकार ने ‘ब्रांड’ और ‘सत्ता’ के बीच काबिज रहने के लिये अपनाए जाने वाले हथियारों का भी चित्रण किया है। वारेन हेस्टिंग्स के बहाने कहानीकार ने यह प्रश्न भी उठाया है कि आज जो नेता और अफसर भ्रष्टाचार के अभियोग में फंसे हैं क्या वे भी एक-एक कर उसी तरह छूट जाएंगे जिस तरह हेस्टिंग्स छूट गया था? इस तरह के कई ज्वलंत प्रश्न कहानीकार ने कहानी में उठाये हैं जो मौजूदा पूंजीवादी साम्राज्यवाद को कठघरे में खड़ा करते हैं।

कहानी में केवल प्रश्न ही नहीं उठाये गये हैं बल्कि उन प्रश्नों के उत्तर भी विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से देने का प्रयास किया गया है। कहानी में कहानीकार ने सांड़ के विद्रोह के माध्यम से हमारे औपनिवेशिक अतीत में व्याप्त अन्याय, अत्याचार और अनाचार की परम्परा के प्रति प्रतिरोध की भावना को दर्शाया गया है। कहानी में एक स्थान पर सांड़ द्वारा हेस्टिंग्स की बग्घी को धक्का मारने का प्रसंग आया है। यह घटना कोई साधारण घटना नहीं है बल्कि इस घटना के माध्यम से कहानीकार ‘इंपीरियलिज्म’ की बखिया उधेड़ता है-

“वारेन हेस्टिंग्स की वह बग्घी, जिसे सांड़ ने चकनाचूर किया, वह इंपीरियल बग्घी थी- इंग्लैण्ड की शाही बग्घी।“

(प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-266)

अंतत: ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड़’ उत्तर औपनिवेशिक परिस्थितियों को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण कहानी है। उपरोक्त आलोचना के दौरान उत्तर औपनिवेशिकता पर की गयी विस्तृत चर्चा के दौरान हमने यह जाना कि उत्तर औपनिवेशिकता मनुष्य को आम खाने के लिये उकसाता है और पेड़ गिनने से मना करता है और जहां तक कहानी की बात है वह हमें आगाह करती है उन परिस्थितियों से जो हमें दिन पर दिन अवकाश पसंद बनाती जा रही है और प्रेरित करती है उस सांड़ की तरह बनने की जो मरकर भी मरा नहीं है।

-------------

संदर्भ सूचि

1) उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर उपनिवेशवाद और भारत, अवधेश कुमार सिंह, आलोचना पत्रिका (जनवरी-मार्च 2003), पृष्ठ संख्या-149

2) Website- www.en.wikipedia.org/wiki/post colonialism

3) वही

4) The Empire Writes Back: Theory and Practice (New York : Routledge 2002) Page No- 149)

5) Ania Loomba, Colonialism, Post Colonialism ( New York: Routledge 2007)

6) Post Colonial Theory, Leela Gandhi, Oxford university Express, 1998, New Delhi)

7) प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-224)

प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-224)

8) लेख- मध्य वर्ग का आई कार्ड, पुस्तक- नयी सदी का पंचतंत्र,लेखक उदय प्रकाश, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-163)

9) प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-230)

10) प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-224)

11) प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-224)

12) प्रतिनिधि कहानियां उदय प्रकाश, प्रथम पेपरबैक संस्करण, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या-266)

---------------

70 views

Recent Posts

See All

भक्तिकालीन साहित्य का सामाजिक सरोकार"-दीपक कुमार

शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय “वर्ण–व्यवस्था लगातार चोट करने वाले इस आन्दोलन ने भक्ति के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिया और ‘जात–पात पूछे ना कोई, हरि को भजै सो हरि का होई’, जैसा नारा देकर सभी को एक

©2019 by Jankriti. Proudly created with Wix.com