शमशेर का काव्य और प्रगतिशीलता


“मैं कई बार मिट चुका हूंगा

वर्ना इस जिंदगी की इतनी धूम”

आज हिन्दी साहित्य जगत में इस बात की धूम है कि शमशेर आधुनिक और स्वयं में प्रगतिशील कवि हैं। शमशेर हिन्दी में खुद को अजीबोगरीब कवि कहते हैं। शमशेर कविता की सहज परिभाषा यह देते हैं कि वह जीवन से फूट कर निकलती है। शमशेर एक खास सोच और तेवर वाले कवि हैं। शमशेर के विषय में अशोक वाजपेयी लिखते हैं- “एक सच्चे भारतीय कवि की तरह शमशेर के यहाँ चीजों का जो धड़कता संसार है वह किसी तरह का अस्तिमूलक आतंक पैदा नहीं करता बल्कि वह मनुष्य की रोज़मर्रा की जिंदगी और उसके गहनतम अनुभवों में शरीक संसार है”।1 और उनकी आधुनिक प्रगतिशील कविता का आज अर्थ अथाह काल-क्षण सा प्रतिहत सागर है। शमशेर की कविता में उनकी सांसें बार-बार इसी अथाह सागर में नीचे उतरने वाली सीढ़ियों का काम करती हैं। शमशेर जब सुंदरता को या जिंदगी को करीब से कविता में परिभाषित करते हैं या बिंबों में उसका करुण या शांत चित्र उतारते हैं तो उनका सौन्दर्य रस के इन स्थायी भावों को बदले बगैर एक दूसरे में घुला देता है,जैसे एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग। तभी उनकी कविता भी किसी पेंटिंग की तरह नजर आने लगती है। शमशेर की कला इसी मायने में उनकी निजी इमेज है। शमशेर ने खुद अपने लंबे अनुभव में इसकी खोज की है। उनकी खोज का दायरा है- मानव संस्कृति। शमशेर इसी मानव संस्कृति को सभ्यता का अंतर यानी आदिम सभ्यता से आज तक विकसित मानव संस्कृति को कुछ इस तरह समझते हैं-

“बहुत हौले-हौले नाच रहा हूँ/सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं/क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख शांति का राग हूँ/बहुत आदिम,बहुत अभिनव”।2

शमशेर कविता के बारे में लिखते हैं कि- “कविता के माध्यम से मैंने प्यार करना,अधिक से अधिक चीजों को प्यार करना सीखा है। मैं उसके द्वारा सौन्दर्य तक पहुंचा हूँ। मेरी चेतना इतनी कंडीशंड हो चुकी है कि हर चीज में मुझे एक सौन्दर्य दिखाई देता है”।3 शमशेर सच्चे अर्थों में सौन्दर्य के पारखी हैं। उनकी कवितायें एक खास किस्म के सौन्दर्य का चित्रण करती हैं। कहीं-कहीं यह सौन्दर्य देह से देहवाद तक पहुँच जाता है फिर भी उसमें कहीं से भी हल्कापन नहीं आ पाता है। इसी कारण शमशेर की कविता ऊपर से ओढ़ी गई भाषा की कविता नहीं लगती-

“गीली मुलायम लटें/आकाश/साव्न्लापन रात का गहरा सलोना/स्तनों के बिंबित उभार लिए/हवा में बादल सरकते/चले जाते हैं मिटाते हुए/जाने कौन से कवि को”।4

शमशेर की इस कविता में प्रकृति और प्रेम के अनुभव एकाकार हो उठा हैं। प्रकृति चित्रण की ही तरह प्रेम की अनुभूति भी शमशेर की रचना में तरल और अमूर्त नहीं है। वह दैहिक सौन्दर्य के ताप का अनुभव कराती है। शमशेर की कविता प्रेम की तीव्र आकांक्षा से भरी है। कभी कभी यह लगता है कि शमशेर मुख्यतः प्रेम और प्राकृतिक सौन्दर्य के कवि हैं,कहीं दोनों अलग हैं और कहीं दोनों का अद्भुत रासायनिक घोल है। शमशेर हिन्दी में अपने ढंग के वर्जनामुक्त प्रेम के कवि हैं। शमशेर की कला में वह जादुई तत्व है जो व्यक्तिगत प्रेम को ही नहीं सामाजिक सम्बन्धों के गहरे लगाव को भी नए सिरे से जानने का साधन बनाता है।

“एक ठोस अष्ट धातु का-सा/सचमुच/जंघाएँ दो ठोस दरिया/ठहरे हुए से/मगर जानता हूँ कि वो...”।5

शमशेर की कविताएँ पाठकों को भी आमंत्रित करते हुए कहती हैं कि ‘तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं’। इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद लगता है कि कवि प्रेम पाने के लिए हमेशा तत्पर रहता है,कवि प्रेम से आग़ा ही नहीं सकता। उनकी कई कविताओं में तीव्र प्रेमोन्माद पाया जाता। प्रेम की अप्राप्यता का बोध ज्यादा प्रकट होता है। इसलिए शमशेर को कुछ विद्वान ‘देह का कवि’ कहते हैं। आलोचकों एवं पाठकों को शमशेर की कविताओं से यह शिकायत रहती है कि यह काफी दुरूह और मुश्किल होती है इस पर गोबिन्द प्रसाद कहते हैं- “शमशेर के यहाँ ‘गैप्स’ के कारण कविता को ‘डीकोड’ करने में जटिलता आ जाती है। शमशेर शब्दों के प्रति मितव्ययी हैं। शमशेर आवाम के बीच मकबूल भाषा के कवि हैं”।6 अगर हम एक वाक्य में कहें तो शमशेर बहुरंगी भाषा के शिल्पी हैं। उनकी भाषा हिन्दी उर्दू का ‘दोआब’ है। मुक्तिबोध भी लिखते हैं कि- “कहना न होगा कि शिल्प की दृष्टि से शमशेर हिन्दी के अद्वितीय कवि हैं”।7 वे अपनी भाषा को सांस्कृतिक भाषा के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं- शायद इसी ‘कंपोज़ीशन’ के कारण कविता की भाषा में कुछ दुरूहता आ गयी हो- यह अस्पष्टता ही उनकी कविता की जान है- “हमारे सिवा इनका रस कौन जाने/वे अपनों की बातें वो अपनों की खू-बू/हमारी ही हिन्दी हमारी ही उर्दू/ये कोयल वो बुलबुल के मीठे तराने/हमारे सिवा इंका रस कौन जाने”।8

जैसा कि हमने ऊपर कहा है कि शमशेर एक सांस्कृतिक कवि हैं। उनकी संस्कृतिनिष्ठता ही उन्हें विलक्षण बनाती है। शमशेर हिन्दी के पंचमहाप्राण प्रगतिशील कवियों में से एक है। वास्तविक और ठोस प्रगतिशील मूल्यों की खोज में मुक्तिबोध, शमशेर ,नागार्जुन, केदारनाथ अग्ग्रावाल और त्रिलोचन की अपनी अपनी दास्तान रही है। उनके मानवीय अनुभव और ज्ञान के क्षितिज का विकास इस समय की सुर्खियों में नहीं मिलता है। शमशेर का ईमान जब-जब क्रूर महाजनी परिस्थितियों में लड़खड़ाया है उनकी आशावादी भावनाएं और दृढ़ होकर निखरती गईं। शमशेर का मुख्य रंग दर्द का,बेचैन धड़कते हुए इंसान का है। वह स्वीकृत करुणा या ‘पैथोस’ के भावों को आधुनिक या आज की कसौटी पर कसते रहते हैं- वह रह रह कर आम जनता के दुख व शोषण से कराह उठते हैं- “कराहती धरा/कि हाय-मय विषाक्त वायु/धूम्र तिक्त आज/रिक्त आज/सोखती हृदय,ग्वालियर के मजूर का”।9

प्रगतिशील कवियों में आम जनता के शोषण, दुख और दर्द के प्रति भयंकर आक्रोश दिखाई पड़ता है। समय की नब्ज टटोलते हुए वे केवल काव्य रचना करना तथा आतंक और दहशत, संत्रास का वर्णन करना ही अपना कवि कर्म नहीं मानते थे। उनकी दायित्व और अधिक गंभीर था। प्रगतिशील कविता गहरे मानवीय सरोकारों से अनुस्यूत है। वह हाशिये पर पड़े लोगों के लिए संबल व काटेलिस्ट की भांति कार्य करता है।शमशेर समेत सभी कवियों की प्रगतिशीलता साहित्य को सामाजिक एवं उत्तरदायी बनाती है। इनकी कविताओं में सामान्य जन उस जमीन पर पहुँच जाता है जहां एक सामूहिक मनोवृत्ति विद्रोह के लिए संघर्षरत है- “फिर वह एक हिलोर उठी/गाओ/वह मजदूर किसानों के स्वर कठिन हठी/कवि हे,उनमें अपना हृदय मिलाओ/उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग,/है अधिक ताप:”।10

शमशेर की प्रगतिशीलता पर चर्चा करते हुए कवि और समीक्षक गोबिन्द प्रसाद लिखते हैं- “प्रगतिशील हिन्दी कविता में शमशेर और शमशेर की कविता का स्वर सबसे अलग है। एकदम न्यारा और बिलकुल अलग... भिन्न इस अर्थ में कि उनका अनुभव विधान और संप्रेषित करने की पद्धति प्रक्रिया निराली है। उनका रंग सबसे जुदा है”।11 शमशेर की कविता ‘बात बोलेगी’ प्रगतिशील कविता के मनीफेस्टो और घोषणा पत्र के बीज वाक्य की तरह सबकी जबान पर चढ़ गई है। आज यह कविता एक नारे के रूप में प्रयोग होती है- “बात बोलेगी,हम नहीं/भेद खोलेगी,बात ही/सत्य का मुख/झूठ की आँखें/क्या देखें”।12

यह कविता बोलने की स्थिति को एक परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत करती है। शमशेर बहादुर सिंह जिस सौन्दर्य बोध के लिए जाने जाते हैं,उससे भी दो कदम आगे वह जनता के प्रतिनिधि कवि के रूप में भी जाने जाते हैं।एक ओर जहां वह शाम को ‘एक पीली शाम पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं तो वहीं एक दूसरे किस्म की यथार्थवादी शाम का चित्रण प्रस्तुत करते हैं। यह शमशेर की निराली प्रगतिशीलता नहीं तो और क्या है- “शाम होने को हुई लौटे किसान/दूर पेड़ों में बढ़ा खग ख/धूल में लिपटा हुआ आसमान/शाम होने को हुई नीरव/तू न चेता/काम से थककर/फटे मैले वस्त्रों में कमकर/लौट आए खोलियों में मौन/चेतने वाला न तू- है कौन”।13

शमशेर इस स्थिति से आवाम को चेताते भी हैं और उन्हें सही स्थिति से अवगत भी कराते हैं। शमशेर की प्रगतिशीलता का सबसे भिन्न रूप तब देखने को मिलता है जब वह सांप्रदायिकता की आग में सुलग रहे देश के लोगों के लिए अमन का राग गाते हैं। वह देश को सांप्रदायिक स्टार पर बंटते हुए देखकर बेचैन और अधीर लगते हैं। जहां तक लगता है शमशेर ही एक मात्र ऐसे कवि हैं जिन्होने अपनी प्रगतिशीलता का व्यापक स्टार पर परिचय दिया है- “हर घर में सुख/शांति का युग/हर छोटा-बड़ा,हर नया-पुराना आज-कल-परसों के/आगे और पीछे का युग/शांति की इसी कला का नाम/जीवन की भरी-पूरी गति है”।14 शमशेर पूरब-पश्चिम के बीच एक सांस्कृतिक सेतु की तरह काम करते हैं। वह कलाओं और संस्कृतियों के मुक्त आदान-प्रदान की बात करते हैं। इससे शमशेर की सांस्कृतिक प्रगतिशील दृष्टि का पता चलता है। अगर हम कवि शमशेर को संस्कृति और शांति का सेतु कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी- ये पूरब-पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं.../बहुत हौले-हौले नाच रहा हूँ/सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं/क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख शांति का राग हूँ/बहुत आदिम,बहुत अभिनव”।15

हम देखते हैं कि शमशेर विश्वव्यापी प्रगतिशीलता के कवि हैं। वे पूरब-पश्चिम के सांस्कृतिक सेतु हैं। मुक्तिबोध ने शमशेर को मनोवैज्ञानिक यथार्थवादी मानते हुए भी आत्मपरक कवि कहा है। शमशेर सबसे अधिक अपने खिलाफ लड़ते रहे हैं,आत्महंता के स्तर तक। घोर वैयक्तिक,अतार्किक भावुकता की कवितायें शमशेर के निजी विषाद की दृढ़ता की चिंताओं को उभारती रही हैं। ‘उदिता’ की कविताओं में कवि वर्तमान में खुद को बेहद अकेला महसूस करता है। शमशेर में इस तरह का खुलापन या सजीवता का वातावरण या साहस का एकांत भाव नजर आता है। वह अपने प्रेम प्रसंगों में भी बहुत कम खुलते हैं। वह अपनी घोर वैयक्तिक निराशा में लय होकर अपनी ही गति को समझाने का मानसिक या अनार्किक सुख हासिल करते हैं- “प्रेम का स्वभाव/भूखा है आत्मसंताप”।16

शमशेर की कविता शिल्प की दृष्टि से उनके प्रगतिशील साथियों की तुलना में सर्वाधिक विविधतापूर्ण और प्रयोगधर्मी मानी गई है। शमशेर की कविता में सामाजिक यथार्थ का आंदोलनात्मक स्वर आद्यंत मुखर है- “शमशेर एक साथ अंतर्मुखी और बहिर्मुखी रहे हैं। वे समाज सत्या को अपने में और अपने को समाज सत्या में पाना चाहते हैं। एक ओर वे प्रणय जीवन के कोमल चित्र प्रस्तुत करते हैं तो दूसरी ओर मध्यवर्गीय किसान मजदूरों के चित्र। एक ओर उनमें प्रेमानुकूलता,निराशा और अवसाद है तो दूसरी ओर मामूली आदमी के प्रति सहानुभूति भी। एक ओर यदि विलगन है तो दूसरी ओर सामाजिक दायित्व की भावना। ये दोनों विरोधी प्रवृत्तियाँ शमशेर के काव्य में साथ-साथ दिखाई पड़ती हैं”।17 यहाँ दो विरोधाभासी कविताओं को एक साथ देखा जा सकता है,पहली- “मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहां मैं/एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ/मुझको सूरज की किरणों में जलने दो/ताकि उसकी आंच और लपट में तुम/फव्वारे की तरह नाचो”।18 और दूसरी- “वाम-वाम दिशा/समय साम्यवादी/पृष्ठभूमि का विरोध अंधकार लीन।...व्यक्ति/कहास्पष्ट हृदय भाव,आज हीन/हीन भाव,हीन भाव-मध्य वर्ग का समाज दीन”।19

शमशेर में एक खास तरह की बेचैनी पायी जाती है। इसी कारण वे जनता से जुड़कर लिखना चाहते हैं। शमशेर स्वयं लिखते हैं कि- “मैं बिलकुल ऐसी कविता के पक्ष में हूँ,बशर्ते कि वह सामान्य जनता की वास्तविक समस्याओं से सच्चे भाव धरातल पर नैसर्गिक प्रतिभा के माध्यम से जुड़ती हो”।20 निश्चित रूप से अपनी प्रगतिशीलता के कारण ही शमशेर कभी अकेले से अकेलेपन में भी सामान्य जनता की वास्तविक समस्याओं से उदासीन नाही रहें हैं। जब शमशेर इस भाव से कविता लिखते हैं कि उनका सामाजिक-साहित्यिक दायित्व है जिसे पूरा करना ही है,वहाँ से वे सपाट हो जाते हैं। लेकिन जब घटनाएँ उनपर गहरा असर छोड़ती हैं तब उनका कवि मन व्यथा में गहरे डूबकर पीड़ा से छटपटाती पंक्तियाँ निकाल लाता है। ग्वालियर की सामंती सरकार ने मजदूरों के जुलूस पर गोली चलाई तो शमशेर ने उसका एक मार्मिक चित्र खींचा है- “य’ शाम है/कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का/लपक उठी लहू भारी दरांतियाँ/-कि आग है: /धुआँ-धुआँ/सुलग रहा/ग्वालियर के मजूर का हृदय”।21

अंततः यह बात स्पष्ट है कि शमशेर व शमशेर का काव्य बहुरंगी प्रगतिशीलता वाला काव्य है। वह अपने निजी एकांत क्षणों में भी सामाजिकता से दूर नहीं हो पाते हैं। शमशेर के यहाँ हर चीज का कंपोज़ीशन मिलता है। जैसे वे भाषा के स्तर पर हैं वैसे ही वे वर्णन के स्तर पर भी प्रगतिशील हैं। कविता और कला मनुष्य की आत्मा का सबसे बड़ा संघर्ष है क्योंकि उसी में यह ताकत है कि वह मानव समाज को एक कर दे। शमशेर की काव्य संवेदना का विस्तार प्रकृति,मनुष्य से लेकर मानवीय भावों तक है। शमशेर मानवतावादी कवि हैं। वे काल से होड़ लेने वाले,उसे ललकारने वाले प्रगतिशील कवि हैं। उनकी प्रगतिशीलता काल से टकराती हुई सतत विकसनशील प्रगतिशीलता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1.कवि कह गया है- अशोक वाजपेयी, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या- 02

2.शमशेर बहादुर सिंह : प्रतिनिधि कविताएं- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 92

3.काल से होड़ मेरी- विष्णुचन्द्र शर्मा, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 66

4.शमशेर बहादुर सिंह : प्रतिनिधि कविताएं- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 106

5.शमशेर बहादुर सिंह : प्रतिनिधि कविताएं- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 184

6.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 21

7.काल से होड़ मेरी- विष्णुचन्द्र शर्मा, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 56

8.दोआब : शमशेर बहादुर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 89

9.दोआब : शमशेर बहादुर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 41

10.दोआब : शमशेर बहादुर सिंह राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 27

11.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 49

12.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 43

13.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 45

14.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 94

15.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 92

16.कविता के सम्मुख- गोबिन्द प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 93

17.उदिता- शमशेर बहादुर सिंह, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 63

18.समकालीन हिन्दी कविता- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 30

19.समकालीन हिन्दी कविता- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 109

20.समकालीन हिन्दी कविता- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 47

21.धरातल- सितंबर अंक, पृष्ठ संख्या- 39

-शिप्रा किरण

नई दिल्ली

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