“श्रृंखला की कड़ियाँ” में निहित स्त्री विमर्श के स्वर नेहा गोस्वामी


शोधार्थी

केंद्रीय शिक्षा संस्थान, दिल्ली विश्वविद्यालय

ई-मेल:nehagoswami003@gmail.com

भारतीय स्त्री विमर्श का फ़लक बहुत ही व्यापक है। वह अपने आप में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विमर्श बन गया है। इसमें एक ओर मनुवादी पुरुष वर्चस्व का विरोध है तो दूसरी ओर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से उन विशिष्ट तत्वों का स्वीकार भी है जो मानवता के नव विकास के लिए उपयुक्त है। आज भारतीय नारी अपने अधिकारों एवं स्वायत्तता को पाने के लिए और सब तरह के शोषण से मुक्त होने के लिए संघर्षरत है। वर्तमान में यदि स्त्री विमर्श की बात की जाए तो ज़्यादातर समसामयिक लेखिकाओं की ही बात की जाती है, परंतु यदि हम हिन्दी साहित्य के इतिहास की ओर लौटे, तो महादेवी वर्मा प्रथम विचारक के रूप में सामने आती है जिन्होंने स्त्री विमर्श की नींव गद्य के रूप में रखी। अपनी विभिन्न रचनाओं के जरिए महादेवी जी ने भारतीय स्त्री जीवन के अनदेखे पहलुओं पर प्रकाश डाला है। उनका निबंध संग्रह ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ भारतीय नारी की विषम परिस्थितियों की धुंधली रेखाओं को स्पष्ट करने का प्रयास है। कृष्ण कुमार अपनी पुस्तक ‘चूड़ी बाज़ार में लड़की’ (2014) में लिखते है कि “’श्रृंखला की कड़ियाँ’ में लिखे गए निबंधो का हिन्दी साहित्य में अनूठा स्थान है। भावुक हुए बिना वह हमारे मन में उस घुटन और विवशता को स्पर्श देता है, जो भारतीय स्त्री-जीवन में लंबे समय से व्याप्त है”। यह निबंध 1931 से 1934 के बीच लिखे गए थे, परंतु वर्तमान संदर्भ में भी इनकी प्रासंगिकता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। के एम मालती अपनी पुस्तक ‘स्त्री विमर्श : भारतीय परिप्रेक्ष्य’ में लिखती है कि “महादेवी वर्मा की ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ स्त्री विमर्श की आक्रमकता और प्रगतिशीलता का महत्वपूर्ण बिन्दु है”। वे भारतीय स्त्री के पक्ष में अपनी बेबाक राय रखती है। उनका मानना है कि “स्त्री, पुरुष की छाया मात्र नहीं है बल्कि उसका स्वतंत्र अस्तित्व है।“ वे स्त्री एवं पुरुष में भिन्नताओं के लिए वातावरण एवं परिस्थितियों को भी जिम्मेदार मानती है। इस संदर्भ में वे कहती है कि ‘प्राय: पुरुष का जीवन अधिक स्वछ्न्द वातावरण में विशिष्ट व्यक्तियों के संसर्ग द्वारा बनता है और स्त्री का संकीर्ण सीमा में परंपरागत रूढ़ियों से, जिससे न उसे अपने कुटुंब से बाहर किसी वस्तु का अनुभव होता है, न अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान। महादेवी जी स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत होने की सलाह देती है। वे स्त्रियों के लिए संपत्ति के स्वामित्व की वंचितता की ओर भी ध्यान दिलाती है। वे बार बार प्राचीन वैधानिक व्यवस्थाओं में संशोधन की मांग करती है। वे संस्कृति के नाम पर स्त्रियों को संकीर्णता में बांधने वाली रूढ़ियों की दुहाई देती है। इस संदर्भ में उनका मानना है कि “प्राचीनता की पूजा बुरी नहीं, उसकी दृढ़ नीव पर नवीनता की भित्ति खड़ी करना भी श्रेयस्कर है, परंतु उस की दुहाई देकर जीवन को संकीर्णतम बनाते जाना और विकास के मार्ग को चारों ओर से रुद्ध कर लेना, किसी जीवित व्यक्ति पर समाधि बना देने से भी अधिक क्रूर और विचारहीन कार्य है। 1933 में ‘नारीत्व का अभिशाप’ में वे लिखती है- “अग्नि में बैठकर अपने आपको प्रतिप्राणा प्रमाणित करने वाली स्फटिक सी स्वच्छंद सीता में नारी की अनंत युगों की वेदना साकार हो गई है”। एक जीवित व्यक्ति का इतना कठोर त्याग, इतना निर्मम बलिदान दूसरा हृदयवान व्यक्ति इतने अकातर भाव से कैसे स्वीकार कर सकता है?

वे आधुनिकता के वातावरण में विकसित नारी की कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हुए कहती है कि आधुनिक स्त्री जितनी अकेली है, उतनी प्राचीन नहीं, क्योंकि उसके पास निर्माण के उपकरण मात्र है, कुछ भी निर्मित नहीं। आधुनिक दृष्टिकोण रखने वाला पुरुष समाज समर्थन का भाव रखते हुए भी क्रियात्मक सहयोग देने में असमर्थ रहते है और उग्र विचार वाले प्रोत्साहन देकर भी उन्हें अपने साथ ले चलना कठिन समझते है। भविष्य में भारतीय समाज कैसा हो? नारी की क्या स्थिति हो, उसके अधिकारों की क्या सीमा हो? शिक्षित नारियों को समाज के लिए क्या करना चाहिए, इन सारे पहलुओं पर सोचने के लिए उनके लेख हमें मजबूर करते है। अपने लेख ‘घर और बाहर’ में वे कामकाजी स्त्रियों की समस्याओं से परिचय कराती है। स्त्रियों का कार्य क्षेत्र केवल घर है या बाहर या दोनों ही, इस समस्या का अब तक समाधान नहीं हो सका है। वे स्त्रियों के कार्यक्षेत्र को घर से बाहर रखने पर उनकी स्वतन्त्रता की बात करती है। उसे आने-जाने की, अन्य व्यक्तियों से मिलने-जुलने की तथा उसी क्षेत्र में कार्य करने वालों से सहयोग लेने-देने की आवश्यकताएं पड़ेंगी, ऐसी स्थिति में यदि पुरुष उसके प्रत्येक कार्य को संकीर्ण और संदिग्ध दृष्टि से देखेगा तो स्त्री का जीवन असहाय हो उठेगा। महादेवी जी विभिन्न क्षेत्रों में स्त्री की अनुपस्थिति एवं कम संख्या पर भी प्रश्न करती है। वे नारी शिक्षा की ज़रूरत पर अपनी आवाज़ बुलंद करती है। वे समाज में स्त्री शिक्षा के प्रति उदासीनता पर प्रहार करती है। वे कहती है “ पुरुष ही अपने समान बुद्धिमान तथा विद्वान स्त्री से विवाह करने में क्यों भयभीत होता है? इस प्रश्न का उत्तर पुरुष के उस स्वार्थ में मिलेगा जो स्त्री से अंधभक्ति तथा मूक अनुसरण चाहता है”। वे कन्याओं की शिक्षा की सार्थकता की बात करती है “माता पिता को बाध्य होना चाहिए कि वे अपनी कन्याओं को अपनी-अपनी रुचि तथा शक्ति के अनुसार कला, व्यवसाय आदि की ऐसी शिक्षा पाने दें, जिससे उनकी शक्तियाँ विकसित हो सकें और वे इच्छा तथा आवश्यकतानुसार अन्य क्षेत्रों में कार्य भी कर सकें”। उनके अनुसार शिक्षा विकास के लिए दी जानी चाहिए न कि विवाह के बाज़ार में उनका मूल्य बढ़ाने के लिए। वे अपने लेखों में समाज में प्रचलित उन मान्यताओं का तर्क सहित खंडन करती है जो या तो स्त्री विरोधी है या स्त्रियों को विकसित होने से रोक रही है। वे वर्तमान में विकराल रूप ले चुकी बलात्कार एवं यौन उत्पीड़न की समस्या पर 1934 में लिखे अपने लेख ‘जीवन का व्यवसाय’ में लिखती है “पुरुषों की दुर्बलताओं का दंड स्त्रियों को मिलता है। एक ओर उन्हें जीवन के सारे कोमल स्वपन, भव्य आदर्श, मधुर इच्छाएँ कुचल देनी पड़ती है और दूसरी ओर सामाजिक व्यक्ति के अधिकारों से वंचित होना पड़ता है। जबकि पुरुष की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता। आरंभ में प्राय: सभी देशों के समाज ने स्त्री को कुछ स्पृहणीय स्थान नहीं दिया परंतु सभ्यता के विकास के साथ-साथ स्त्री की स्थिति में भी परिवर्तन होता गया। भारतीय स्त्री की स्थिति में आदिम युग की स्त्री की परवशता और पूर्ण विकसित समाज के नारीत्व की गरिमा का विचित्र सम्मिश्रण है। महादेवी जी स्त्री पुरुष दोनों को ही एक खुशहाल जीवन जीने के लिए आवश्यक मानती है। वे लिखती है “स्त्री और पुरुष यदि अपने सुखों के लिए एक दूसरे पर समान रूप से निर्भर रहते तो उनके संबंध में विषमता आने की संभावना ही नहीं रहती”। वे सभी सामाजिक व्यवस्थाओं की रूपरेखा का आधार स्त्री एवं पुरुष, दोनों को ही मानती है और सलाह देती है यदि स्त्री पुरुष दोनों ही एक-दूसरे को समझ कर अपनी त्रुटियों एवं विशेषताओं का हृदयंगम कर ले तो समाज सुंदर हो जाएगा।

इस प्रकार हम देखते है कि महादेवी वर्मा के स्त्री विमर्श संबंधी विचार आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान संदर्भ में नारी विमर्श एक जीवन दृष्टि बन चुका है। सूचना प्रोद्योगिकी एवं भूमंडलीकरण के इस दौर में जब हम महादेवी जी के इन विचारों पर चिंतन मनन करते है तो उनकी क्रांतदर्शिता की गहराई तक पैठने में अपने को असमर्थ पाते है।

संदर्भ ग्रंथ:

1. महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ, द्वितीय पेपरबैक सं.-2012, लोकभारती पेपरबैक्स

2. कृष्ण कुमार, चूड़ी बाज़ार में लड़की, प्रथम सं. 2014, राजकमल प्रकाशन

3. के एम मालती, स्त्री विमर्श: भारतीय परिप्रेक्ष्य, प्रथम सं. 2010, वाणी प्रकाशन

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