सतत विकास के आयामवीरेन्द्र कुमार गाँधी


शोधार्थी, विकास एवं शांति अध्ययन

मा.गां.अं.हिं.वि.वि., वर्धा

ई.मेल-virenderkumargandhi@gmail.com

मो.-9455539267

विकास का मार्ग चयन करना विकासशील देशों की सबसे बड़ी आवश्यकता थी जिसने अब समस्या का रूप धारण कर लिया है| यह विकास का मार्ग इतना कठिन है कि ये मानव अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है| इसके प्रभाव और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ के परिणाम की चेतावनी प्रकृति निरंतर दे रही है| विकासशील देशों की सबसे बड़ी समस्या वहां के अधिकतर जनसंख्या की आवश्यकता की पूर्ति है| अपनी क्षणिक और भौतिक आवश्यकताओं की तुष्टि के लिए विकाशील देश प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल के बजाय दोहन कर रहे हैं| वहीं दूसरी तरफ विकसित देशों के लोगों का उपभोग का स्तर इतना ऊँचा है कि उनके लिए संसार के सभी संसाधन कम पड़ रहे हैं| वे संसाधनों का लगातार दोहन कर रहें हैं, जो मानव अस्तित्व के लिए घातक है|

प्राकृतिक अवस्था में जब मानव सभ्यता की शुरुआत थी तब मनुष्य प्रकृति के एकदम समीप रहकर सीधा-साधा जीवन यापित करता था| सीमित आवश्यकताओं की वजह से मनुष्य प्रकृति से अपने अनुसार संसाधनों में समन्वय बनाए रखता था| इस अवस्था में मनुष्यों के द्वारा प्रकृति को कोई नुकसान नहीं था| शायद ही उस समय किसी ने सोचा हो, कि ये विशाल संसाधन भी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बौने साबित होंगे| समय के सापेक्ष मानव जनसंख्या व उसका बौद्धिक विकास हुआ| परिणामस्वरुप मानवों के उपभोग के स्तर और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में भी चमत्कारिक विकास हुआ| अब स्थिति यह है कि संसाधनों के भंडार पर संकट उत्पन्न हो गया है| मनुष्य प्रकृति से दूर होने के साथ-साथ वह प्रकृति को दूषित भी किया| परिणाम स्वरुप सतत विकास की अवधारणा संसार के सामने आयी| सतत विकास की अवधारणा ने स्पष्ट किया कि, “प्राकृतिक सम्पदा हमें उत्तराधिकार में नही प्राप्त हुई, यह हमारे पास भावी पीढियों की धरोहर है|”

सतत विकास की चिंता का मुख्य विषय :- हमारे लिए यह विचार का बिंदु यह है कि आखिर क्या कारण है जिससे मनुष्य को इस विषय पर अध्ययन करने के लिए विवश होना पड़ रहा है| कुछ तो चिंता रही होगी इस उत्तर औद्योगिक सभ्यता वाले मानवों की जिससे यह विषय प्रकाश में आया| चिंताए निम्न है-

(1) विकास की अंधी दौड़ :- विकास की अंधी दौड़ ने हमारे पर्यावरण को बहुत ही प्रभावित किया है| खनिज संसाधनों को निकालने में और निकालने के बाद बहुत सारे अवशिष्ट पदार्थ निकले जो जल संसाधनों को निरंतर दूषित कर रहे हैं| रात-दिन उद्योगों से निकलने वाला धुंआ और कार्बनिक अपशिष्ट वायुमंडल को दूषित कर रहे हैं| रासायनिक कूड़ा और न्यूक्लियर के प्रयोग से निकलता रेडियोधर्मी रिसाव, मानव पर कहर बरपाने के साथ-साथ पृथ्वी को रहने योग्य भी नहीं छोड़ा है| ऐसे संकटों से निजात पाना ही इस विषय के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य और चिंतन का केंद्रबिंदु है|

(2) पर्यावरण एवं जीवन की गुणवत्ता :- सतत विकास का अध्ययन की चिंता का स्त्रोत जीवन की बढती गुणवत्ता है| गुणवत्ता प्राप्त करने का एकमात्र साधन पर्यावरण बन रहा है| जीवन की भौतिक गुणवत्ता असीमित है इस लिए समस्या दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है| यदि हम गुणवत्ता की एक सीमा तक पहुचतें है तो उससे कुछ दूरी पर एक दूसरी सीमा का निर्माण हो जाता है|

(3) पृथ्वी और भावी पीढ़ी :- पर्यावरणवादी बताते हैं कि “पृथ्वी किसी की निजी संपत्ति नहीं है और नही यह हमें हमारे पूर्वजों के द्वारा उत्तराधिकार में मिला है बल्कि यह हमें यह भावी पीढियों की धरोहर के रूप में मिला है|” पर मानव स्वभाव यह समझता ही नहीं है| सतत विकास के लिए यही मुख्य चिंता का विषय है| मनुष्य समझता ही नहीं है कि वह दायित्वों से बंधा है, पृथ्वी के समस्त संसाधनों की सुरक्षा उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है क्योंकि अनेक भावी पीढ़ियां इसी पृथ्वी का हिस्सा बनेंगी|

सतत विकास की संकल्पना :- सतत विकास की संकल्पना में प्रायः दो सिद्धांत काफी निकट हैं जिससे विकास के साथ शांति भी बनी रह सकती है-

(1) मनुष्य व प्रकृति के टूटे संबंध को पुनर्स्थापित करना|

(2) मनुष्यों के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक जीवन को नए रूप में ढालना|

यह सत्य है कि आज संसार में औद्योगिक समाज प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन पर आश्रित है| जिस कारण मनुष्य प्रकृति से काफी दूर हो गया है और मनुष्य को प्रकृति से पुनः जुड़ने के लिए प्रकृति के प्रति शालीन होना पड़ेगा साथ ही मनुष्य को संसार के सभी जीव जंतुओं को उनके अधिकार देने होंगे| आज शांति के लिए आर्थिक संवृद्धि, केन्द्रीयकरण, अधिकारी तंत्रियकरण और भौतिकवाद सबसे बड़े खतरे हैं| यदि मनुष्य को शांति के साथ-साथ विकास की आवश्यकता होगी तो सतत विकास एक मात्र ऐसा मार्ग है जिसमें भावी पीढियों के लाभ छिपे है| प्रकृति के पास रहकर शांति पूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए निम्न पक्षों पर ध्यान देना होगा- स्ववालम्बनीयता, छोटी-छोटी वस्तुओं और संगठनों के गुणों की पहचान, जनसंख्या नियंत्रण, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, आध्यात्मिक पुनर्जागृति और प्रकृति के साथ पुनः जीवन व्यतीत करने की इच्छा आदि| ये सारे अत्यंत आवश्यक पक्ष हैं| विकासशील देशों को अपनी विस्फोटक जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना होगा| इसके अतिरिक्त विकसित औद्योगिक देशों को अपने देश के उपभोग के स्तर को स्वतः ही कम करना होगा| जनसंख्या कम होने के बावजूद भी विकसित औद्योगिक देशों के उच्च उपभोग स्तर का दुष्परिणाम पर्यावरण झेलता है|

इस पक्ष में पर्यावरणवादी कहते हैं कि पिछले दो सौ वर्षो में जिस प्रकार से प्रकृति का शोषण किया गया है उनका नवीनीकरण संभव नहीं है| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नवोदित राष्ट्र भी विकसित राष्ट्रों की राह पर चलने लगे हैं जिसमें आर्थिक विकास प्रमुख है| इस प्रकार के विकास के अंतर्गत माल निर्माण प्रणाली के लिए मिट्टी, पानी, वन सम्पदा, खनिज स्त्रोतों को निचोड़ना अत्यंत जरुरी हो जाता है| इन्हीं कार्यों से पर्यावरण पर खतरा उत्पन्न होने लगता है और जीवदायनी शक्तियों का विनास होता है| ओजोन परत के छेद का लगातार बढ़ते जाना इसका एक प्रमुख उदाहरण है| इसके जानने के बाद भी पूंजीपति बाजारवाद का निर्माण कर रहे हैं| इसमें वे ग्राहकों को आकर्षित करके उनके मन में इच्छा उत्पन्न कराते हैं जिससे अपव्यय पूर्ण उपभोग को बढ़ावा मिलता है और ये मानवता के लिए घातक है| उक्त सभी समस्याओं का आदर्श निवारण सतत विकास में निहित है|

अक्षय विकास का आदर्श सिद्धांत सभी देशों के लिए अनुकरणीय है| विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग(1987) ने इस सिद्धांत का निरूपण किया जिसकी मान्यता यह थी कि, “वर्त्तमान पीढ़ी को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति इस ढंग से करनी चाहिए कि भावी पीढ़ियां अपनी आवश्यकता को पूरा करने असमर्थ न हो जाएं|” तात्पर्य यह है कि अब हमें अपनी आवश्यकताओं व उपभोग के स्तर को निम्नतम कर उच्चतम उत्पादन करना चाहिए| इस सन्दर्भ में महात्मा गाँधी का श्रम सिद्धांत एकदम प्रासंगिक है कि, “प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर से इतना श्रम अवश्य करना चाहिए जिससे वह अपनी दैनिक आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन स्वयं कर सके|” इस संदर्भ में पर्यावरणवादी कहते हैं कि मानव जीवन के लिए आर्थिक संवृद्धि जैसी नियति को छोड़ देना चाहिए| साथ ही वे स्पष्ट करते हैं कि वही एक मजबूत अर्थव्यवस्था होगी जो मानवों के आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति करेगी जिसमें वस्तु उत्पादन तथा प्रदूषण उत्पादन का स्तर निम्न होगा और वर्तमान में व्याप्त आर्थिक विषमता को भी दूर करेगा| इसके लिए परम्परागत आर्थिक वृद्धि की संकल्पना को इस्तेमाल में लाना होगा| इस सम्बन्ध में गैरेट हार्डिन ने अपने 1981 के लेख में बताया कि, “सभ्यता की जीवन नौका को डूबने से बचाने के लिए इसके अतिरिक्त बोझ को समुद्र में फेंक देना चाहिए|” कुछ भी हो इसे एकमात्र पर्यावरण का हिस्सा नहीं माना जा सकता|

सतत विकास के समर्थक चाहते हैं कि इस उत्तर औद्योगिक समाज को पुनः पूर्व औद्योगिक समाज में लौट जाना चाहिए जहाँ पर कम-से-कम आवश्यकता और खर्च थे| वे कहते हैं कि हमें पृथ्वी को बचाने के लिए अमेरिकी उपभोग परस्ति को छोड़ना होगा| विश्व में अमेरिकी 6%हैं जो विश्व के एक तिहाई ऊर्जा खपत के लिए जिम्मेवार हैं| इससे निर्धन देशों में बहुत कम ही ऊर्जा आ पाती है, और यह खुद अमेरिकियों के लिए खतरनाक है| सतत विकासवादी यह सुझाव देते हैं कि,“हमें निजी वाहन की जगह सार्वजनिक वाहन और साइकिल, मांस-मछली की जगह हरी सब्जी और दाल, कोयले-बिजली और न्यूक्लियर ऊर्जा की जगह पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहिए| सतत विकासवादी औद्योगिक समाज को गांवो की तरफ, साइकिल चलाने व प्राकृतिक भोजन की तरफ लौटने का सुझाव देते हैं जिससे मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन की अवस्था में रहे न कि प्रकृति को हानि पहुंचाए|

निष्कर्ष

जहाँ एक साधारण राजनीति का संबंध विभिन्न समूहों के स्वार्थो की लड़ाई होती है वहां पर सामंजस्य बैठाने के तरीके ढूंढे जाते है परन्तु यहाँ तो सतत विकास से अभिप्राय सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लक्ष्य से है| इस दृष्टि से यह राजनीति का उदात्त पक्ष है| इसके उद्देश्य से जब उद्योगों के विस्तार और उपभोग के स्तर को संयमित किया जाता हो तो पूंजीपतियों के निहित स्वार्थ पर आंच आती है तथा उनके व्यक्तिगत मुनाफे में कटौती होती है| इस उत्तर औद्योगिक समाज में ये स्वार्थ बहुत ही सबल और साधन संपन्न हैं जो सतत विकास के मार्ग में रूकावटे पैदा कर रहे हैं| कुछ वामपंथी दल इस लिए सतत विकास का विरोध करते हैं कि यह तीव्र उत्पादन की गतिविधियों पर अंकुश लगाता है जिससे समाज में बेरोजगारी की समस्या बढ़ने का खतरा है| सतत विकासवादियों के पास ऐसा साधन नहीं है जिससे औद्योगीकरण और पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव को प्रत्यक्षतः रोका जा सके| इसका लाभ दूर-दूर तक बिखरा है तथा लोगों तक धीरे-धीरे पहुंचता है जिन्हें संगठित करना कठिन है| यही कारण है जिससे सतत विकासवादियों को व्यापक सफलता प्राप्त नहीं हुई और न ही जन चेतना में व्यापक परिवर्तन हुआ|

सन्दर्भ सूची

(1) बी.एल.फड़िया, 2006,अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध सिद्धांत एवं समकालीन मुद्दे, साहित्य भवन पब्लिकेशन्स, आगरा

(2) माँरगेनथाऊ हंस जे, (1990) राष्ट्रों के मध्य राजनीति (तृतीय संस्करण)(अनुवादक- प्रेमनारायण मित्तल), हरियाणा साहित्य आकादमी, चंडीगढ़

23 views

©2019 by Jankriti. Proudly created with Wix.com