सभ्यता का संकट और उसका समाधान:रजनीश कुमार अम्बेडकर

1.

शोध आलेख

डॉ. देवानंद कुंभारे

पूर्व शोधार्थी, पी-एच.डी.,

अहिंसा एवं शांति अध्ययन विभाग,

म.गां.अं.हिं.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)

Email: devanand.kumbhare75@gmail.com

Mob.-09921336873

2. रजनीश कुमार अम्बेडकर

शोध छात्र,

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र

म.गां.अं.हिं.वि.,वर्धा (महाराष्ट्र)

Email: rajneesh228@gamil.com

Mob.09423518660/08421966265

सभ्यता का संकट और उसका समाधान

हिंदी शब्दकोष के अनुसार सभ्यता का अर्थ है ‘सभ्य होने का भाव’ और सभ्य का अर्थ है- सुसंस्कृत, नम्र एवं विश्वस्त, शिष्ट, सभा के योग्य।’ गिलिन व गिलिन के अनुसार, ‘सभ्यता संस्कृति का अधिक जटिल तथा विकसित रूप है।’ वही, जिसबर्ट के अनुसार, सभ्यता बताती है कि, ‘हमारे पास क्या है’, और संस्कृति यह बताती है कि, ‘हम क्या हैं’।

इस अलोक में आज के सभ्यता के व्यावहारिक अर्थ और ही बन गए हैं। वे हैं-पक्के बढ़िया मकान में रहने वाला, सफेद तथा स्वच्छ कपड़े पहनने वाला, मिठी-मिठी बातें करने वाला, दूसरों की किसी भी बात का प्रतिवाद न करने वाला,लड़ाई-झगड़े में शांति स्थापित करने वाला, वैज्ञानिक उन्नति से लाभ उठाने वाला और नवीन वैज्ञानिक विचारों को स्वीकार करने का दावा करने वाला। यही आज के सभ्यता की वैश्विक संस्कृति बन चुकी है।

प्राय: सभ्यता और संस्कृति को समानार्थी समझ लिया जाता है, जबकि ये दोनों अवधारणाएँ अलग-अलग हैं। काण्ट ने सभ्यता और संस्कृति के अन्तर को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सभ्यता बाह्य व्यवहार की वस्तु है, परन्तु संस्कृति में नैतिकता की आवश्यकता होती है तथा यह आन्तरिक व्यवहार की वस्तु है। वहीं, ग्रीन ने सभ्यता व संस्कृति के मध्य अन्तर को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि, ‘एक संस्कृति तब ही सभ्यता बनती है, जबकि उसके पास एक लिखित भाषा, दर्शन, विशेषीकरणयुक्त श्रम विभाजन, एक जटिल विधि और राजनीतिक प्रणाली हो।’ सभ्यता और संस्कृति में मौलिक अन्तर यह है कि, सभ्यता का सम्बन्ध जीवन यापन या सुख-सुविधा की बाहरी वस्तुओं से है, जबकि संस्कृति का सम्बन्ध आन्तरिक वस्तुओं से। सभ्यता मूल में तो व्यवहार की साधुता के द्योतक होती है।

विश्व के प्राचीन इतिहास ने अनेक सभ्यताएँ देखी हैं जिसमें प्रमुखता से हैं मिस्र या सुमेरियन की सभ्यता, मिसापोटामिया की सभ्यता, सिन्धु सभ्यता, इजियाई सभ्यता आदि। ये सभ्यताएं विस्तार से और बहुत लम्बे समय तक फली-फूली। इन्होंने अपनी वैभवावस्था में कई बड़ी-बड़ी इमारतें, बड़े-बड़े दुर्ग, अन्नागार, स्नानघर, सड़कें, नालियां आदि सुविधाएँ विकसित की थी जो अभी हमें अवशेषों और खंडहरों में मिलती हैं।

कोलकाता के अजायबघर में मिस्र की पांच हजार साल पहले की एक ममी रखी हुई देखी जा सकती है जो मानव समाज और सभ्यता के लंबे एवं जटिल सफर और चंढाव-उतार की तस्वीरें सामने लाती है। यह ममी सुदूर अतीत में एक विकसित सभ्यता के अस्तित्व की गवाही दे रही है। प्राचीन मिस्र एवं मिसोपोटामिया के समसामयिक सिंधु घाटी की सभ्यता के भग्नावशेषों के साथ संयुक्त राज्य अमरीका की सीमा के अंतर्गत ऐनासांजी तथा कैहोकिया, मध्य अमरीका के माया नगर, दक्षिण अमरीका में मॉशे तथा तिवानाकु, अफ्रीका में ग्रेट जाम्विबिया विलुप्त हुई सभ्यताओं के चंद उदाहरण हैं। ये सभ्यताएँ कैसे विनष्ट हुई हैं इसका एक लम्बा इतिहास है।

इसके विनाश के कारणों पर विद्वानों में एकमत नहीं हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के अवसान के पीछे विभिन्न तर्क दिये जाते हैं जैसे: बर्बर आक्रमण, जलवायु परिवर्तन एवं पारिस्थितिक असंतुलन, बाढ तथा भू-तात्विक परिवर्तन, महामारी, आर्थिक कारण। ऐसा लगता है कि इस सभ्यता के पतन का कोई एक कारण नहीं था बल्कि विभिन्न कारणों के मेल से ऐसा हुआ। जो अलग-अलग समय में या एक साथ होने की सम्भावना है। अनुमान किया जाता है कि इन रहस्यमयी परित्यक्त संरचनाओं में से अनेकों के विनाश की शुरूआत पर्यावरणीय समस्याओं के कारण हुई थी। मनुष्य ने आज से करीब पचास हजार साल पहले आविष्कारशीलता, दक्षता एवं शिकार करने के हुनर विकसित किए। तभी से उसके लिए पर्यावरणीय निरन्तरता बनाए रखना कठिन रहा है। लोग अनजाने में अपने उन पर्यावरणीय संसाधनों का विनाश करते रहे, जिन पर उनकी सभ्यता एवं समाज निर्भर थे। इसी तरह आज भी हम हमारी बहुत सारी अच्छी सभ्यताओं को नष्ट कर रहे हैं, आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के द्वारा और एक विनाशकारी गर्त में डूब रहे हैं। सभ्यता के विनाश के आठ कारण बताएं जाते है जिन प्रक्रियाओं के जरिए अतीत के इन समाजों ने अपने पर्यावरण को भंगुर बनाया। जंगलों की कटाई एवं वासभूमि का विनाश, भूमि समस्याएं भूक्षरण, लवणीकरण एवं भू-उर्वरा हानि, जल प्रबंधन समस्याएं, अत्यधिक शिकार, मछलियों की अत्याधिक पकड़, आयातित प्रजातियों के मूल प्रजातियों पर असर, मनुष्य की जनसंख्या वृद्धि एवं आबादी का प्रति व्यक्ति प्रभाव।

सवाल यह है कि क्या आधुनिक प्रौद्योगिकी हमारी सभ्यता की समस्याएं सुलझाएगी या यह जितनी पुरानी समस्यों को सुलझाएगी, उससे अधिक नई समस्याएं उत्पन्न करती रहेगी? जब हम एक संसाधन उत्पादित करते हैं तो कई नए संसाधन नष्ट करते हैं? पर्यावरणीय आत्मघात के संदेह की पुष्टि पुराविदों, जलवायु विशेषज्ञों, इतिहासकारों, जीवाश्म विशेषज्ञों एवं पुष्परेणु विशेषज्ञों के हाल के दशकों की खोजों से होती है। बहुत से लोगों की सोच है कि आज की दुनिया के लिए जैविक, रासायनिक और नाभिकीय अस्त्र साथ ही उभरते रोगों के मुकाबले पर्यावरणीय आत्मघात अधिक बड़ा संकट है। हमारे समक्ष जो पर्यावरणीय समस्याएं हैं, उनमें उपरोक्त आठ के साथ चार और अतिरिक्त समस्याएं जुड़ गई हैं। ये हैं मानवीय हस्तक्षेप के कारण होने वाला जलवायु परिवर्तन, परिवेश में जहरीले रसायनों का इकट्ठा होना, ऊर्जा की कमी और धरती की प्रकाश संश्लेषण उत्पाद क्षमता का संपूर्ण उपयोग। ऐसा दावा किया जाता है कि अगले कुछ दशकों में इन बारह खतरों में से अधिकतर चरम पर पहुंच जाएंगे।

वर्तमान में धरती के अनेक भागों में अनेक सभ्यताएँ मौजूद हैं। यह सभ्यताएँ आर्थिक , सामाजिक, राजनितिक और धार्मिक हैं। इन में सर्वोपरी है वर्चस्व की सभ्यता। अभी तक विश्व दो ध्रुवीय था , 1. अमरीका और 2. रूस। सोवियत संघ टूटने के बाद मानो यह एक ध्रुवीय ही हो गया है। सभी तरफ अमरीका का ही बोलबाला है। कुछ अरसे पहले पूर्व की सभ्यताएँ और पश्चिम की सभ्यताएँ थी लेकिन आज केवल पश्चिमी सभ्यता ही पूरे धरती पर राज करने के लिए उतावली है। अमेरिका पुर्वीय सभ्यता का नेतृत्व करने वाला राष्ट्र है। इसके दादागिरी के तमाम साक्ष्य हमारे सामने पूरी तरह स्पष्ट हैं।

आज के वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के दौर में अमेरिका का लक्ष्य है तमाम मौजूद सभ्यताओं को नष्ट करके एकमात्र साम्राज्यवादी सभ्यता का वर्चस्व कायम करना। औपनिवेशिक दौर से ही यह प्रक्रिया कई रूपों में कई रास्तों से चल रही है। वैश्वीकरण के दौर में उसमें अभूतपूर्व तेजी आ गई है। बाजार नहीं तो हथियार के बल पर समस्त अस्मिताओं को साम्राज्यवादी सभ्यता से चेलेंज मिला है। गाँधी ने ठीक इसे शैतानी सभ्यता कहा है। अमेरीका और उसके पिट्ठुओं की टेक है कि वैश्वीकरण के दौर में साम्राज्यवाद ही सभ्यता है और साम्राज्यवादी ही सभ्य होता है। यह अकारण नहीं कि कोई भी संस्था, सरकार या राजनैतिक-बौद्धिक नेतृत्व इस साम्राज्यवादी सभ्यता के बढ़ते प्रसार को रोकने में सक्षम नजर नहीं आते। दुनिया के ज्यादातर नेता, बुद्धिजीवी, मीडियाकर्मी, मध्य और उच्च वर्ग इस सभ्यता के मोहपाश में बंधे हैं। दुनिया की विशाल आबादी के हिस्से की लूट पर छोटी सी आबादी की अनन्त मौजमस्ती और अनंत स्वेच्छाचार इस सभ्यता का पहला और आखिरी पाठ है। हम सभी जानते है कि यही पाठ बाजार और हथियार के बल पर हासिल और कायम किए जाते हैं। यह बाजारी और हथियारी सभ्यता मानवता के इतिहास के समस्त मूल्यों, नैतिकता और विवेक को मिटा देने पर आमादा है। अमेरीकी और अमरिकावादी बुद्धिजीवी जिसे सभ्यताओं का संघर्ष कहकर प्रचारित कर रहे हैं, वह असलियत में ‘बाजारी’ और ‘हथियारी’ सभ्यता का आत्म-संघर्ष है। नोम चोमस्की जैसे विद्वान लम्बे समय से यह कह रहे है कि अमेरीका दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी-साम्राज्यवादी देश है। लेकिन भारत सहित दुनिया के ज्यादातर बुद्धिजीवी उसे लोकतंत्र और स्वतंत्रता का अभयारन्य प्रचारित करते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप के बारे में कहा जाए तो इसकी सभ्यता काफी पुराणी है। बहुतसे विदेशी विद्वानों ने प्राचीन भारतीय सभ्यता का वर्णन और सराहना की है। साथ ही आधुनिक काल में गाँधी ने अपने विचारों और आचरण के जरिये दुनिया के सामने एक ऐसी मानवीय सभ्यता की रुपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें कमजोर-से-कमजोर मनुष्य, समुदाय, राष्ट्र, समाज और संस्कृति अपनी संपूर्ण पहचान, गरिमा और बराबरी के साथ रह सके। शैतानी सभ्यता द्वारा व्यापक मानव समाज पर ढाएं जानेवाले अत्याचारों का प्रतिरोध करने के लिए गाँधी ने सिविल नाफ़रमानी की क्रांतिकारी कार्यप्रणाली उस दौर में विकसित और स्थापित की जब दुनिया की मानवता शैतानी सभ्यता की साम्राज्यवादी लूट और युद्धवादी विध्वंस से आक्रांत थी। उन्होंने शैतानी सभ्यता के तात्कालिक और भावी परिणामों को गहरी दृष्टि से देखा और समझा।

अमेरिका द्वारा इराक, अफगानिस्तान और सीरियाई हमलों पर भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े कहे जानेवाले लोकतंत्र ने कोई कारगर भूमिका नहीं निभाई है। क्योंकि भारत का तर्क रहा है कि, अमेरीका दुनिया का महाबली है और व्यवहारकुशलता इसी में है कि, उसे किसी भी सूरत में नाराज न किया जाएं। क्योंकि अमेरीका डॉलर देगा, हथियार देगा, टेक्नालाजी देगा, कश्मीर में चल रहे सीमा पार के आतंकवाद से निजात दिलाएगा और कश्मीर समस्या हल करा देगा आदि। व्यावहारिकता के नाम पर चलाएं जाने वाले इस तर्क की जड़ को अगर देखा जाए तो वहां परावलंबन, असमानता, और गुलामी की मानसिकता गढ़ी मिलती है। इस तर्क को गढ़ने और बढ़ाने में पुराने ब्राह्मणवाद और नए पूंजीवाद की मुकम्मल जुगलबंदी है, जिसमें सरकार और विपक्ष से लेकर संपन्न सवर्ण तबके शामिल हैं। गाँधी ने अपना संघर्ष देश के लिए स्वावलंबन, समानता और आजादी हासिल करने के लिए किया था। उनका संघर्ष न केवल भारत के लिए बल्कि साम्राज्यवाद के चंगुल में फंसे दुनिया के सभी देशों के लिए था। यह सबसे महत्वपूर्ण तथ्यहै कि गाँधी के संघर्ष के समय साम्राज्यवाद का सूरज कभी डूबता नहीं था। एक गुलाम देश का वासी होते हुए भी उन्होंने संपूर्ण आत्मविश्वास और और विनम्रता के साथ खुद साम्राज्यवादियों के सामने यह पेशकश की थी कि वे सभी के स्वावलंबन, समानता और आजादी की उपयोगिता समझें; मानव सभ्यता का हिस्सा बने।

लेकिन भारत स्वतंत्र होने के बाद से लेकर आज की तारीख तक में भी गाँधी के सभ्यता के मूल्य अधिक प्रासंगिक होने के बावजूद इसकी स्वर दब सी गई है और उपनिवेशवादियों की बुलंद हो चुकी है। इसी संदर्भ में एक बार लोहिया ने कहा था, ‘बीसवी सदी के अंत तलक गाँधी और परमाणु बम में से किसी एक की विजय होगी।’ लोहिया का मतलब था की गाँधी की जित होगी लेकिन हुआ उल्टा है। मानव सभ्यता के ऊपर परमाणु बम यानि शैतानी सभ्यता स्थापित हुई है। यह जीत और मजबूत तथा दीर्घजीवी होगी अगर सभ्यता के गाँधीवादी विचार में आस्था रखने वाले लोग भी दुनिया में परमाणु बम बनाने की होड़ का समर्थन करेंगे। तब शैतानी सभ्यता का कोई विकल्प नहीं बचेगा और उसकी निर्णायक जीत सुनिश्चित हो जाएगी।

अगर हम तब तक इन समस्याओं को नहीं सुलझा पाते, तो समस्याएं हमें निगल जाएंगी। मनुष्य जाति के विनाश के प्रलयंकारी दृश्य अथवा औद्योगिक सभ्यता के सर्वनाश की बजाय केवल निम्न जीवन स्तर, दीर्घकालिक गंभीर खतरों एवं हमारे प्रमुख मूल्यों को खोखला कर देने वाला भविष्य बचेगा। यह विनाश कई रूप लेगा। जैसे रोगों का पूरे संसार में प्रसार अथवा संसाधनों की कमी। अगर यह बात सही है, तो हमारे आज के प्रयास उस दुनिया का चरित्र तय करेंगे, जो आज के शिशु, बालक एवं युवाओं को विरासत में मिलेगी।

इन सारी आपत्तियों से निजात पाने के लिये गांधी का दर्शन सक्षम प्रतीत होता है। और अभी सही समय है बदलाव के लिये, यदि हम ऐसा कर पाएंगे तभी आधुनिक मानव सभ्यता हम जिन्दा रख पाएँगे और आने वाली पीढ़ियों को सुख-समृद्धी दे पाएंगे।

सभ्यता के उपरोक्त वर्णित संकटों के समाधान के लिए निम्नर कुछ उपाय जरूर कारगर हो सकते हैं-

1. किसी देश में सैन्य हस्तक्षेप को रोकना चाहिए,

2. साम्राज्यवादी सभ्यता के विस्तार को रोकना चाहिए,

3.मानव सभ्यता के लिए जगह बनाने की दिशा में गंभीर और दूरगामी शांततामय मार्ग से अहिंसात्मक

आन्दोलन देश और दुनिया में खड़ा करना चाहिए।

संदर्भ सूची:

1. सभ्यता की ओर, गुरूदत्त, हिंदी साहित्य सदन, वाराणसी

2. उदारीकरण की तानाशाही, डा. उपेन्द्र प्रसाद, नमन प्रकाशन, नई दिल्ली

3. http:hi.wikipedia.org/s/5mre

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