समकालीन कविता के मुख्य स्वर


समकालीन कविता मानवीय जीवन सन्दर्भों के अभिव्यक्ति की कविता है|यह एक ऐसा काव्यान्दोलन है जो नयी कविता के विविध काव्यान्दोलनों में प्रमुख है|समकालीन कविता में मूल्य और काल दोनों का समानधर्मी महत्त्व है|काल से संदर्भित करें तो इसे आठवें दशक की कविता कहेंगे,और यदि मूल्य के परिप्रेक्ष में मूल्याङ्कन करें तब वे समस्त सरोकार व प्रश्न आयेंगे जो मनुष्य तथा समाज के उत्थानार्थ उठाये जाते हैं|समकालीन कविता समय के सभी हलचलों को रेखांकित करती है|समकालीन कविता को अपने समय के मुख्य अंतर्विरोध तथा द्वंदों की कविता स्वीकार करते हुए डॉ.विश्वम्भरनाथ उपाध्याय लिखते हैं कि-“समकालीन कविता को पढ़कर वर्तमान काल का बोध हो सकता है|क्योंकि उसमें जीते संघर्ष करते,लड़ते,बौखलाते,तड़पते तथा ठोकर खाकर सोचते आदमी का परिदृश्य है|आज की कविता में काल अपने गत्यात्मक रूप में ठहरे हुए क्षण या क्षणांश के रूप में नहीं|यह काल क्षण की कविता नहीं,काल प्रवाह के आघात और विस्फोट की कविता है|”1

समकालीन कविता जीवन यथार्थ की कविता है|जिसमें जीवन के विविध पहलुओं का मूल्याङ्कन किया जाता है|समकालीन कविता अविधात्मक रूप में जीवन के अंग-उपांगों का वर्णन बड़ी शिद्दत से करती है|वह जड़,निष्क्रिय,स्थिर मनुष्य के बजाय चेतन क्रियाशील व जागरूक व्यक्ति की पक्षधरता रखती है|समकालीन कविता का मूल मंतव्य सामाजिक यथार्थ के साथ ही साथ युगीन बोध की सजग और सार्थक अभिव्यक्ति भी है|समकालीन कविता के बारे कवियों और आलोचकों के अलग ही मत दृष्टिगत होते हैं|साठोत्तरी कविता के प्रमुख कवि सुदामा पाण्डेय धूमिल अपनी राय व्यक्त करते हैं-“रूप,रंग,और अर्थ के स्तर पर आजाद रहने की,सामने बैठे आदमी की गिरफ्त में न आने की तड़प,एक आवश्यक और समझदार इच्छा,जो आदमी को आदमी से जोड़ती है,मगर आदमी को आदमी की जेब या जूते में नहीं डालती| स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा और उसके लिए पहल तथा उस पहल के समर्थन में लिखा गया साहित्य ही समकालीन साहित्य है|”2 धूमिल की परिभाषा से जो बात स्पष्ट हो रही है वह यह कि वे मुक्ति के प्रबल आग्रही कवि हैं,किन्तु मुक्ति भी समवेत हो,और खैरात में नहीं बल्कि संघर्ष से अर्जित की गयी हो|वे विचार को महत्त्पूर्ण मानते हैं,तथा उसका कर्म में रूपांतरण करना चाहते हैं|कविता को वे आम जनता के भविष्य की बेहतरी में अपना योगदान देते हुए देखना चाहते हैं|

समकालीन कविता का अपने समय और समाज से गहरा जुड़ाव है|वह आसपास की गंभीर समस्याओं,अंतर्विरोधों,चिंताओं और उलझनों से अनुभव संपृक्त हो अभिव्यक्ति करती है|समकालीन कविता जीवन के सुख दुःख को सचाई और ईमानदारी से उद्घाटित करती है|समकालीन कविता की प्रमुख चिंता आमजन के जीवन संघर्ष,उसके रहन-सहन के ढंग,विलुप्त होते मूल्य,टूटते रिश्ते,सूखती संवेदनाएं आदि हैं|समकालीन कविता रिश्तों के पहचान पर बल देती है|रिश्ते व्यक्ति के जुड़ाव को मजबूती प्रदान करते हैं|रिश्ते भरोसा,विश्वास और गहन अनुभूति का एहसास दिलाते हैं|कवि नरेश सक्सेना ‘कांक्रीट’ कविता के माध्यम से इस सम्बन्ध को व्याख्यायित करते हैं| -“आपस में सटकर फूटी कलियाँ/एक दूसरे के खिलने के लिए जगह छोड़ देती हैं/ जगह छोड़ देती हैं गिट्टियां/आपस में चाहे जितना सटें /अपने बीच अपने बराबर जगह / खाली छोड़ देती हैं /जिसमें भरी जाती है रेत /और रेत के कण भी /एक दूसरे को चाहे जितना भीन्चें /जितनी जगह खुद घेरते हैं /उतनी ही अपने बीच ख़ाली छोड़ देते हैं /इसमें भरी जाती है सीमेंट /सीमेंट कितनी महीन और आपस में कितनी सटी हुई/लेकिन उसमें भी होती हैं खली जगहें/जिनमें समाता है पानी|”3

समकालीन कविता सर्वहारा के वर्ग संघर्ष को बखूबी चित्रित करती है|एक ओर जहाँ वह समय के सच व विडंबना को जन मानस के समक्ष प्रस्तुत करती है,वहीं दूसरी ओर आज के सामाजिक,राजनीतिक,सांस्कृतिक विघटन के बरक्स संघर्षरत आम आदमी की स्थिति को भी जीवन्तता प्रदान करती है|समकालीन कवि समाज के निचले तबके के साथ खड़े रहने में सुखद स्थिति का अनुभव करता है|वह सर्वहारा की मूलभूत आवश्यकताओं को समझता है,तथा उनकी आवाज को अपनी लेखनी के माध्यम से उठाता है|साथ ही उनके जीवन में आवश्यक तब्दीली चाहता है|चूँकि सर्वहारा पूरी तरह से कुंठाओं से ग्रस्त हो चुका है,उनके मुख मंडल और जीवन में खुशहाली लानी होगी|यहाँ पर समकालीन युवा कवि श्रीरंग की चिंता जायज ठहरती है-“वे जानते थे नावें कैसे बन जाती हैं-जहाज/जहाज किस तरह तब्दील हो जाते हैं,जल बेड़ों में.../जल बेड़ों का व्यापारिक और औपनिवेशिक स्वभाव /वे भली-भांति जानते थे/उन्होंने जीवनभर जहाजों का विरोध किया था/...वे अकेले नहीं थे उनके साथ राष्ट्र था |”4

समकालीन कविता एक स्वस्थ व प्रदूषण मुक्त समाज की कामना करती है|क्योंकि असंतुलन और प्रदूषण चाहे समाज में हो या प्रकृति में नुकशान दुनिया को ही होगा|प्रकृति और समाज को संतुलित बनाये रखना समाज के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है|समाज को बचाए रखने में ही भलाई है|दुनिया को बचाने की फिक्र सबकी होनी चाहिए,न कि समाज के कुछ व्यक्ति विशेष की|जिस प्रकार से स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मस्तिष्क का निवास होता है,उसी प्रकार संतुलित व्यक्ति द्वारा ही आदर्श समाज निर्माण संभव है|कवि त्रिलोचन शास्त्री ‘दुनिया कैसे बचे’ कविता में इसी सोच में व्याकुल दिखाई पड़ते हैं|उनकी दूरदर्शिता आज अक्षरसः प्रमाणित हो रही है|उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से आज फसलों की पैदावार तो बढ़ गई,किन्तु कई महत्वपूर्ण जीवों का अस्तित्व संकटग्रस्त हो गया है|गिद्ध आज लगभग ख़त्म हो गए है|पर्यावरण प्रदूषण बहुत बढ़ गया है|कवि की चिंता पर्यावरण व जीवन को बचाने की है|कवि त्रिलोचन कह उठते हैं-“उर्वरकों के अंधाधुंध/उपयोग से कृषि के लिए /हानिकारक कीट तो नष्ट /ही हो गए/साथ ही दूसरे जीव भी/समाप्त हो गए/वनस्पतिओं के सहारे जीने वाले /जीवजन्तु भी जीव रहित हो गए/गिद्ध आदि जो वायुमंडल को /स्वच्छ रखा करते थे/नष्ट होते-होते नष्ट हो चले /एस दुर्घट योग से दुनिया कैसे बचे|”5

समकालीन कविता का मुख्य स्वर समवेत मुक्ति का रहा है|यदि हम विचार करें तब पाते हैं कि कविता का फलक आज बहुत विस्तृत हो गया है,साथ ही वह बहुआयामी घटकों को साथ लिए हुए है|समकालीन कविता सर्वहारा व स्त्री समाज को अपनी रचनात्मकता में मुख्य मानता है|वह न्याय की पक्षधरता का काव्य रचता है|समकालीन कवि आस्थावादी,यथार्थ की तल्ख़ पहचान रखने वाला,समय की विडम्बनाओं पर सार्थक हस्तक्षेप करने वाला है|वह सामयिक कुचक्रों को शीघ्र ही समझ लेता है |साथ ही समय अपनी नियति स्वयं ही तय करता है,बदलाव अवश्यम्भावी है,मनुष्य उसकी गति में और तीव्रता ला सकता है,अपनी सकारात्मक मेधा एवं पौरुष द्वारा||कवि केदारनाथ सिंह अपनी ‘रोटी’शीर्षक कविता में हमारी वर्तमान आवश्यकताओं के स्वरूप को भूख से अभिहित करते हैं-“आप विश्वास करें /मैं कविता नहीं कर रहा/सिर्फ आग की ओर इशारा कर रहा हूँ/वह पाक रही है/और आप देखेंगे –यह भूख के बारे में/आग का बयान है/जो दीवारों पर लिखा जा रहा है/आप देखेंगे दीवारें धीरे-धीरे/ स्वाद में बदल रही हैं|”6

आधुनिकतावादी कविता ने जिन-जिन मानदंडों को अपनाया था,और जिससे उसकी पहचान बनी थी,समकालीन कविता उससे भी एक कदम और आगे जाकर अपने तर्क को और अधिक पुष्ट करती हुई दिखाई पड़ती है|समकालीन कविता उन सबको अपना विषय बनती है, जो आधुनिकता के निशाने पर थे-उत्पीड़ितउपेक्षित आमजन,स्त्रियाँ,आम बच्चे,मनुष्यता,पर्यावरण,प्रेम,कामना,अनुराग,सहिष्णुता,मानवीय सम्बन्ध आदि|समकालीन कवि नारी को मात्र भोग्या नहीं मानता,बल्कि उनके अस्तित्व को सहज स्वीकार करता है|वह यह तो मानता है कि नारी पौरुष में जाकर समर्पित हो जाती है,किन्तु उसका यह भाव कदापि नहीं कि उसका अस्तित्व ही समाप्त हो गया|नारी पुरुष के जीवन संघर्ष को आसन बनती है,उसके जीवन में मिठास भी भारती है|कैलाश वाजपेयी की कविता में यह प्रवृत्तियां देखी जा सकती हैं-“यों हुआ कि एक दिन/धरती को तोड़कर/एक बहुत दुबली-सी चन्दन धुली हुई/अलसायी धार/आकर समुद्र की/बाँहों में सो गयी/धरा तो खो गयी/पर उस समुद्र की/बूंद-बूंद शहदीली हो गयी/कहते हैं कभी एक भूखा समुद्र था|”7

समकालीन कविता का कोई एक सीमित दायरा नहीं है|उसका सम्पूर्णता के अध्ययन पर विश्वास है|किसी एक अंग-उपांग पर ही उसकी दृष्टि नहीं ठहरती,बल्कि उसका जोर समूचे विश्लेषण पर होता है|उसका मानना है कि किसी एक विचारधारा से कव्यधार्मिता का मूल्याङ्कन संभव नहीं है|वह सम्पूर्ण काव्ययात्रा के मूल्याङ्कन में मानवीय सरोकार को प्राथमिकता देती है|समकालीन कवि जीवन और रचना दोनों के प्रति सचेत और कर्तव्यनिष्ठ दीख पड़ता है|यही कारण है कि समकालीन कविता में विशिष्ठ के बजाय सामान्य जन और हाशिये के समाज को महत्त्व दिया गया है|समकालीन कविता अन्याय और शोषण की शक्तियों को पहचान कर उन्हें रेखांकित करती है|वह सर्वहारा के वर्ग संघर्ष की पक्षधरता करता है,साथ ही उन्हें सत्य,असत्य के बीच फर्क करने की शक्ति भी प्रदान करता है|समकालीन कविता अत्याचारी चेहरे को पहचान कर उसे कटघरे में खड़े करने की बात करता है|समकालीन कवि रघुवीर सहाय समय की नजाकत को समझते हुए कह उठते हैं-“यदि तुम रंगों का हमला रोक सको तो रोको वरना/मत आँको तस्वीरें /कम से कम/ विरोध में /और अगर चेहरे गढ़ने हों तो अत्याचारी के चेहरे खोजो/अत्याचार के नहीं|”8

समकालीन कविता में वर्तमान व्यवस्था के प्रति आक्रोश अधिक है|वह जिसका दामन थामता है,उसके साथ न्याय भी करता है|वह अवसर परस्त नहीं है,जिससे प्रेम भी करता है,उसे पूरी स्वतंत्रता भी देता है|मानसिकता के स्तर पर निर्णय लेने की पूरी छूट होती है|प्रेम जीवन के रागात्मक स्थिति का सुखद क्षण होता है|समकालीन कवि उसपर गर्व की अनुभूति करता है जिसे वह सही समझता है -“प्रेमी होना यदि कवि होना है/तो मैं एक कवि हूँ/कवि होना यदि जादूगर होना है/तो मैं एक जादूगर हूँ/जादूगर होना अगर माना जाता हो ख़राब /तो ख़राब माना जा सकता है मुझे/लोंगों को अगर नापसंद हो ख़राब माना जाना /तो अभिशप्त हूँ मैं इसके लिए/ज्यादातर लोंगों द्वारा नापसंद किया जाना ही /है सच्चा प्रेमी होना/मैं साफ-साफ कहता हूँ मैं प्रेमी हूँ|”9

समकालीन कविता में मात्र जीवन का यथार्थ अनुभव ही व्यक्त नहीं होता अपितु प्रतीकात्मक रूप में भी सामने देखने को मिलता है|कविता में यथार्थ अनुभव पुनर्रचित होकर भी प्रस्तुत होता है|इसी वजह से कभी कभी काव्यगत यथार्थ और जीवनगत यथार्थ में काफी विषमता दृष्टिगत होती है|आज की अवसरवादिता और राजनीतिक गुटबाजी को प्रतीकात्मक रूप में समकालीन कवि कुमार अम्बुज की कविता ‘एक आदमी जंगल में’ व्यक्त करती है-“मगर नहीं कहा उसने /शेर से उसकी हिटलरशाही के बारे में/हाथी से अकर्मण्यता के बारे में/हिरण से कमअक्ली/सियार से उसके कपट /या कोयल से उसके कालेपन के बारे में /नहीं कहा उसने किसी से भी /ऐसा कुछ/जो उसे दिक्कत देता/उसकी उम्र का जंगल काटने में|”10

समकालीन कविता का मुख्य स्वर मनुष्यता की पक्षधरता रखना है|वह मनुष्य की समवेत मुक्ति का आकांक्षी है|समाज में मानवीय संसक्ति की प्रतिष्ठा का व्यापक उपक्रम भी रचती है|समता,समानता व बंधुत्य समकालीन कविता का मुख्य प्रयोजन है|सभी जन सुखी तथा खुशहाल रहें ऐसी कामना समकालीन कविता का केन्द्रीय विषय है|हर गरीब तबके की मदद हो व उसको उसकी उचित भागीदारी का प्रतिफल मिले|समकालीन कविता नारी व सर्वहारा वर्ग के विषय पर बराबर हस्तक्षेप करती है|समाज के यथार्थ स्वरूप का उद्घाटन करना उसका एक प्रमुख उद्देश्य है|समाज की रुढ़िवादी मान्यताओं को ढ़ोता हुआ आमजन आज पूर्णतःऊब चुका है|उसका धैर्य और साहस अब जवाब देने लगा है|जीवन और मृत्यु में उसे अब बहुत फरक नहीं महसूस होता है|समकालीन कविता इसी बात पर करारा प्रहार करती है|यही उसका मूल मंतव्य है|समकालीन कविता की जमीन तो ग्रामीण है,किन्तु उसका दृष्टिकोण नवीन है|समकालीन कविता की भाषा अविधात्मक व व्यंग की धार पैनी है|समकालीन कविता शोषक वर्ग के एकजुटता की वकालत करता है,क्योंकि एकता के आधार पर ही शोषित वर्ग का समाज में अस्तित्व स्थापित हो सकता है|

सन्दर्भ सूची-

1.डॉ.प्रमिला एस.राउत-समकालीन कविता में मानवीय रिश्ते,सत्य प्रकाशन दिल्ली,पृष्ठ संख्या11

2.ए.अरविंदाक्षन –समकालीन हिंदी कविता,राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 59

3.नरेश सक्सेना-कवि ने कहा,किताबघर प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या 67

4.श्री रंग –वे पार कर गए नदी,अक्षरपर्व,जुलाई 2004,पृष्ठ संख्या 38

5.त्रिलोचन-दुनिया कैसे बचे,प्रभात खबर,दीपावली विशेषांक 2002, पृष्ठ संख्या100

6. ए.अरविंदाक्षन –समकालीन हिंदी कविता,राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 40

7.अशोक त्रिपाठी-समकालीन हिंदी कविता तीन दशक,विभा प्रकाशन,इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या 70-71

8.माधुरी छेड़ा,रवीन्द्र कात्यायन-(सं)समकालीन कवि और कविता,अनंग प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या 176

9.राजेश जोशी-एक कवि की नोटबुक,राजकमल प्रकाशन,नयी दिल्ली, पृष्ठ संख्या 155

10. डॉ.प्रमिला एस.राउत-समकालीन कविता में मानवीय रिश्ते,सत्य प्रकाशन दिल्ली,पृष्ठ संख्या 58

धीरेन्द्र सिंह

(शोध अध्येता )

हिंदी विभाग

डॉ.हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय,सागर

(म.प्र.) 470003

मो.09005939570

ईमेल.dhirendra.sam2012@gmail.com

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