समकालीन कविता के सूत्रधार- अखिलेश गुप्ता


रिवर्तन प्रकृति की नियति है । आज हमें जो तर्कसंगत और प्रासंगिक लगता है, हो सकता है कि कुछ दिनों पश्‍चात्‍ वही अप्रासंगिक और बेहूदा लगे । हिन्दी साहित्य में काव्य की प्राचीन और समृद्ध परंपरा का साहित्येतिहास में जब वर्गीकरण होता है, तब प्राय: उसकी प्रवृत्तियों के आधार पर ही साहित्य का इतिहासकार काल-विभाजन और नामकरण करता है । अपने समय की व्यापक हलचलों और बदलावों की छाया का प्रभाव साहित्य में भी पड़ता है । आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक की काव्य-यात्रा में उसके कथ्य, भाषा शैली और शिल्प विधान में परिवर्तन का कारण भी यही है । आधुनिक काल में साहित्य की प्रवृत्ति में बदलाव बड़ी तेजी से हुआ है । भारतेन्दु युग से लेकर प्रयोगवाद की काव्य प्रवृत्तियों को हम आसानी से समझ सकते हैं, किन्तु नयी कविता के संदर्भ में ऐसा नहीं है ।

नयी कविता के दौरान कवियों में अपनी काव्यगत रचना-प्रवृत्तियों को लेकर उसे अपने तरीके से नामकरण करने की होड़ लग गई । बकौल राजेश जोशी “साठ के दशक में अकविता और उसके आसपास कवि समूहों ने अपनी अलग अस्मिता के चलते अपने समूहों और अपनी कविता के कई नामकरण किए, मसलन सनातन सूर्योदयी कविता, युयुत्सावादी कविता, अस्वीकृत कविता, अकविता, क्षुत्कातर कविता, सकविता, उत्कविता, विकविता, लिम्बादलमोतवादी कविता, एब्सर्ड कविता, ठोस कविता, कोलाज कविता, युवा कविता, विचार कविता आदि । और इसी तरह भूखी पीढ़ी, श्मशानी पीढ़ी, नंगी पीढ़ी आदि ।”1 यदि देखा जाए तो उस समय जितने कवि हुए उतने ही प्रकार से कविताओं का नामकरण हुआ । इसी टिप्पणी में कविता के नामकरण में स्थिरता के कारण को स्पष्‍ट करते हुए उन्होंने लिखा कि “हो सकता है नामकरण की इस अतिशयता ने ही नामकरण की इस महिमा से एक किस्म की ऊब और निरर्थकता के अहसास को पैदा किया हो । ...शायद इसीलिए पिछले तीस-पैंतीस वर्ष की कविता के लिए समकालीनता जैसे पद का इतना अधिक इस्तेमाल किया गया ।”2 इसी कारण सत्तर के बाद की कविताओं के संदर्भ में समकालीनता रूढ़ हो गई ।

समकालीन क्या है ? कविकर्म के दौरान रघुवीर सहाय को इसी प्रश्‍न से बार-बार जूझना पड़ा । इसलिए इसे व्याख्यायित करते हुए उन्होंने लिखा है कि “मेरी दृष्‍टि में समकालीनता मानव-भविष्‍य के प्रति पक्षधरता का दूसरा नाम है । भविष्य के प्रति, नियति के प्रति नहीं । जिस किसी परिवेश में कवि का अनुभव उससे काव्य सृष्‍टि कराता है उसमें वर्तमान मानव परिस्थिति को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना और उससे अपने को बाहर रखकर उसका समर्थक वर्णन या आलेखन कर देना भी कविता हो सकती है । किन्तु वह सृष्टा का काम नहीं है । वह अच्छी पद-रचना हो सकती है, काव्य-रचना, मेरी दृष्‍टि में, नहीं ।”3 कवि को सृष्‍टा की संज्ञा देकर वे समकालीनता की सही पहचान के लिए कवि की भाषा और उसके भावबोध के परस्पर संबंध में मानव-भविष्‍य के प्रति पक्षधरता की तलाश करते हैं ।

मानव-भविष्य के प्रति पक्षधरता नयी कविता के समय से ही दिखती है । मुक्‍तिबोध नयी कविता के दायरे में रहकर भी वर्तमान में नैतिक पतन और भ्रष्‍ट मानसिकता के कारण को लक्षित करते हुए कहते हैं कि “काल्पनिक योग्यता की पूँछ के बालों को काटकर/ होठों पर मूँछ लटका रखी है !!”4 स्वातंत्र्योत्तर भारत में जब योग्य होने के बावजूद व्यक्‍ति को नौकरी नहीं मिल पा रहा हो और अयोग्य व्यक्‍ति छल, बल और धन के कारण योग्य ठहराए जा रहे हों, तब उसका भविष्य किस कदर अंधकारमय हो सकता है; इसे बताने की जरूरत नहीं है । इसलिए नयी कविता की जमीन में रहकर भी वे समकालीन कविता की पृष्ठभूमि रचते हैं । उसी दौरान नागार्जुन बकायदा अभिनय करते हुए नुक्‍कड़ नाटक की शैली में झूठ, फरेब, भेद-भाव, अकर्मण्यता, अज्ञान, भ्रष्‍टाचार और शोषण इत्यादि का धारदार ढंग से प्रतिकार करते हुए जनता को संबोधित करते हैं-

“जहरीले साँपों पर दया नहीं करना

दुष्टों पर हमदर्दी के उसाँस नहीं भरना

कटखने कुत्तों पर रहमदिल न होना

भलमनसाहत में जान से हाथ मत धोना¨¨”5 (लू-शुन)

जाहिर है कि ऐसी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण समकालीन कविता अपनी आरंभिक चरण में ही इतनी प्रौढ़ता हासिल कर लेती है कि आज समकालीन कविता के दायरे से दोनों की कविताओं को पृथक रखने का दुस्साहस कोई आलोचक कर ही नहीं सकता । मुक्‍तिबोध की कविता, जैसा कि शमशेरबहादुर सिंह का कथन है कि ‘किसी-किसी कविता के कई अंश जासूसी उपन्यासों की याद भी दिलाते हैं’6 मगर यदि ध्यान दिया जाए तब लगता है कि कविता के वे अंश जिससे जासूसी उपन्यासों की याद आ जाती है; दरअसल उसमें जासूसी उपन्यासों की तरह किसी एक घटना विशेष के कारणों का पता लगाने के लिए की जाने वाली केवल बौद्धिक कसरत नहीं है, बल्कि व्यापक समाज को केंद्र में रखकर सामाजिक समरसता के संदर्भ में की गई की जासूसी है । वे आभिजात्य मानसिकता की जासूसी ही नहीं करते, अपितु उसमें अपने को भी शामिल करने की कोशिश करते हैं । इस प्रक्रिया में आभिजात्य का उनकी अपनी मानसिकता के साथ जब संक्रमण होने लगता है तब अपनों के साथ हो रहे शोषण की प्रक्रिया परत-दर-परत खुलकर सामने स्पष्ट हो जाती है । अपने ही लोगों के साथ किये गये इन अन्यायों में खुद को शरीक पाकर मन आत्मग्लानि से भर उठता है-

“ओ मेरे आदर्शवादी मन, /ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,

अब तक क्या किया ?/जीवन क्या जिया !!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गये, /भूतों की शादी में क़नात-से तन गये,

किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,

...बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गये, /करुणा के दृश्यों से हाय ! मुँह मोड़ गये,

बन गये पत्थर, /बहुत-बहुत ज़्यादा लिया, /दिया बहुत-बहुत कम,

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम !! /लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,

जन-मन-करुणा-सी माँ को हकाल दिया, /स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया,

भावना के कर्तव्य-त्याग दिये, /हृदय के मन्तव्य-मार डाले !

बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया, /तर्कों के हाथ उखाड़ दिये,

जम गये, जाम हुए, फँस गये, /अपने ही कीचड़ में धँस गये !!

विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में /आदर्श खा गये !”7

यह आभिजात्य मानसिकता है, जो निर्बाध शोषण की प्रक्रिया का प्रबल समर्थक है; जिसके कारण देश में भूखमरी, गरीबी, भ्रष्‍टचार, नैतिकता का पतन इत्यादि अपनी चरम सीमा में है । पूँजी के असमान वितरण के फलस्वरूप संपन्‍न व्यक्‍ति और धनाढ्य होता जा रहा है जबकि किसान, श्रमिक, मजदूर आदि गरीबी के गर्त में धँसते चले जा रहे हैं । इसी शोषण के कारण ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित हो चुकी है जहाँ आदमी-आदमी में विभेद एकदम स्‍पष्‍ट है-

“मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ

तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्‍न है

कि तुम्हारे लिए जो विष है, मेरे लिए अन्‍न है ।”8

जहाँ अधिकांश लोगों को उचित भोजन मुहैया नहीं होता हो, वहाँ एक ऐसा वर्ग भी है, जो अकूत संपदा का मालिक है । जिनकी त्याज्य वस्तुओं पर गरीब की जान टिकी हुई है । ऐसे में नागार्जुन की कविता की व्याख्या इसी भौतिक जगत के प्रभु वर्ग (शोषक वर्ग) को आधार मान कर की जाए, तब देखते हैं कि उन्होंने भी मुक्‍तिबोध की इसी बात का समर्थन किया है । मसलन-

“प्रभु तुम कर दो वमन !

होगा मेरी क्षुधा का शमन !!”9 (कर दो वमन !)

समाज में ऐसे लोगों के प्रति उनका विरोध जिस वीभत्स लहजे में प्रस्तुत हुआ है, निश्‍चित ही अद्‍भुत है । बकौल नामवर सिंह, “नागार्जुन पहले कवि हैं जिन्होंने सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में वीभत्स को एक नई शक्‍ति प्रदान की है ।”10 मुक्‍तिबोध की जासूसी किसी एक तबका विशेष तक सीमित नहीं है, अपने घर, परिवार और समाज की भी जासूसी करने से वे नहीं कतराते हैं; तब हठात्‍ उस रहस्य से भी पर्दा हट जाता है जो कि आदमी-आदमी में विभेद करता है लेकिन फिर भी नव-प्रभात में अलसाये हुए नींद से जगने पर आँखें मलते हुए हम जो कुछ भी देखते हैं, सच होने के बावजूद एकबारगी हमें उस पर सहज विश्‍वास ही नहीं होता । इसलिए समकालीन कविता हेतु मार्ग प्रशस्त करने वाले स्वयं सूत्रधार भी ‘स्वप्न’ अथवा ‘जागृति’ में विभेद करते समय तनिक संदेह में हैं-

“मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में

चमकता हीरा है,

हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,

प्रत्येक सुस्मित में विमल सदा नीरा है,

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में

महाकाव्य-पीड़ा है ।”11

पीड़ा की अभिव्यक्‍ति और प्रतिकार का साहस ही समकालीन कविता को वैचारिक उष्‍मा प्रदान करती है । समकालीन कविता के इन सूत्रधारों को इसका गहरा एहसास है कि आज देश की जनसंख्या की आधी से भी अधिक आबादी लगभग मरने को ही जी रहा है; जिसका प्रमुख कारण राजनैतिक और आर्थिक तो है ही, साथ ही सामाजिक कुरीतियों का भी कम योगदान नहीं है । इसलिए धर्म के माध्यम से फैलायी जा रही पाखण्ड के विरुद्ध भी सजग रहना कवि का उत्तरदायित्व है । त्रिलोचन इस तथ्य से बखूबी परिचित थे, इसलिए धर्म में फैल चुकी पाखण्ड की सत्ता के विरुद्ध अनवरत संघर्षरत रहे, ताकि भविष्य रौशन रहे-

“धर्म-विनिर्मित अन्धकार से लड़ते लड़ते

आगामी मनुष्य, तुम तक मेरे स्वर बढ़ते ।”12 (पश्यन्ती)

विचारधारा के हर चौखट में अनफिट तथा हर शिविर से बाहर, त्रिलोचन भविष्य को रौशन करने के लिए अपने समय में उठने वाली ध्वनि-तरंगों को पकड़कर जब सामाजिक यथार्थ से परिचित होते हैं; तब उस पर पड़े काजली रंगों को मिटाने हेतु वैद्य की भाँति मर्ज की दवा के रूप में एक नई भाषा ईजाद करते है । जो जन-संघर्ष को गति दे सके और उनकी आकांक्षाओं पर खरी उतर सके-

“लड़ता हुआ समाज, नई आशा अभिलाषा

नये चित्र के साथ देता हूँ नई भाषा ।”13 (ध्वनिग्राहक)

उनकी कविताओं में चंपा जैसी निरक्षर लड़की और ‘नगई महरा’ जैसे जन-साधारण में पाश्चात्य प्रभाव की उपज- ‘आधुनिकता’ से टकराने की जो अदम्य बौद्धिक ऊर्जा प्रकट होती है; वह गाँव के बेपढ़े-लिखे लोगों का संचित अनुभव है, जो कि धारदार ढंग से आधुनिकता की विसंगतियों और राजनैतिक कुटिलताओं का प्रतिकार करने में समर्थ है । इसलिए असमिया कवि नीलमणि फूकन कविता का लक्ष्य साधारण जनता तक संप्रेषित होने में मानते हैं-

“एक कवि ने कहा था; कविता नहीं पढ़ते जो

कविता है उन्हीं के लिए

उन्हीं के आहत दिलों, काँटों से बिंधी

उँगलियों के लिए

मृत और जीवित लोगों के लिए

पथ-वीथियों में अहर्निश गूँज रहे

चीत्कार के लिए”;14

और जन-साधारण तक कविता की पहुँच तभी संभव है, जब आम-जन-जीवन से कवि का गहन तादात्म्य रहा हो, उनकी आशा-आकांक्षाओं से परिचित हो, साथ ही उनके मानवेतर संबंधों से भी जुड़ाव रहा हो; और जब ऐसी काव्य-दृष्टि किसी रचनाकार को मिल जाती है तब कविता कालजयी हो जाती है । मसलन नागार्जुन की एक कालजयी कविता ‘अकाल और उसके बाद’ है-

“कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्‍की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।”15

नागार्जुन की यह कविता सैकड़ों लोगों की जुबान पर आज तक उपस्थित है, कारण यह कि इसमें मनुष्य मात्र की मंगलकामना हेतु राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर ही केवल विचार नहीं किया गया है, अपितु किसानी जीवन से सरोकार रखने वाले समस्त जीव-जन्तुओं के प्रति भी मंगलकामना निहित है । किसान की रसोई में चूल्हा के साथ दाल और अनाज पीसने के लिए चक्‍की हरेक घर में मिलती है तथा घर पर बच्‍चों का नेह-दुलार गाय-बछिया और किसान के आश्रय में पलने वाले कुत्ते-बिल्लियों पर भी बरसता है । यदि किसान भूखा रह जाए तब इसका सीधा-सीधा असर इन पालतू जीवों पर दिखने लगता है । किसान, श्रमिक और गरीबों के घरों में छिपकलियाँ और चूहे भी अपने लिए सुरक्षित स्थान ढूँढ ही लेते हैं, भले ही पूँजीपतियों के विशाल भवनों में इनके लिए कोई जगह न हो; दानों के अभाव के कारण भूख से कविता में इनकी हालत का जिक्र वही कर सकता है जो पूरे मनोयोग से इनसे जुड़ा हो । फलत: अभाव के दिन बीत जाने पर अर्थात्‍ खेत से अनाज कट कर घर पहुँचने के पश्‍चात्‍ खोई हुई रौनक पुन: लौट आती है, क्योंकि यह खुशी किसी अकेले प्राणी का न होकर चराचर के मंगल का विधान करने वाली है । इसीलिए नागार्जुन की कविताएँ सर्वग्राही हैं । रामचन्द्र ओझा का मंतव्य इसी तथ्य की पुष्टि करता है, “जन साधारण की संवेदना की कोई अलग रचना नहीं होती है, बल्कि जो रचना जन साधारण को प्रभावित करे वही जन साधारण की रचना बन जाती है । दरअसल एक रचना दूसरी रचना के शिल्‍प और प्रस्तुति के कारण अलग होती है । कृतियों को उनका गुणस्तर उन्हें अलग करता है । किसी रचना का आंतरिक व्यक्‍तित्व और उसका प्रभाव उत्पादक सामर्थ्य ही उसका मूल्य है । अत: किन्हीं बाह्य मूल्यों के आधार पर उनका श्रेणीकरण उचित नहीं । नागार्जुन को जन कवि इसलिये कहना उचित होगा, क्योंकि उनकी कविता सर्वग्राही है न कि इसलिये कि उनकी रचनाओं के केन्द्र में ‘जनवादी’ कहे जाने वाले यथार्थ की प्रस्तुति व विचारधारा का प्रवर्त्तन है । अभिव्यक्‍ति की सहजता और संप्रेषणीयता के कारण तुलसीदास लोक के कवि हैं, विचारधारा के कारण नहीं । यही कारण है कि ऐसी रचनाओं का प्रभाव देश-काल की सीमा में नहीं बँधता ।”16 (काव्येतर आधुनिकता और कविता)

समकालीन कविता अपने समाज के दैनिक क्रियाकलापों में घटित हो रही घटनाओं पर अवलोकन करते हुए प्रकारान्तर से वह इस बारे में चिन्तन करती है कि क्या होना चाहिए ? और क्या घटित हो रहा है ? अंग्रेजों से देश को आजाद करने के लिए सैकड़ों देशभक्‍तों ने अपनी कुर्बानियाँ दीं, जिनका मकसद देश की प्रगति रहा; लेकिन आजादी के बाद भी बहुजन समाज अपनी यथास्थिति में ही जी रहा है । आज लोकतन्त्र के नाम पर लोगों पर सिर्फ तन्त्र (नियम, कायदे, कानून इत्यादि) हावी है और यह इस ढंग से हावी है कि शोषण के बावजूद भारत के जन-बाहुल्य को अपने छले जाने का अहसास तक नहीं है ! कारण यह कि जहाँ शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य- शिक्षा ग्रहण करने वाले को अपने साथ हो रहे अन्याय और शोषण को समझाना और किसी भी प्रकरण में उसके विविध आयामों को लेकर सोचने-समझने की एक वैचारिकी निर्मित करना रहा है; उस शिक्षा की बुनियाद (प्राथमिक शिक्षा) ही कमजोर कर दी गई है । इसीलिए लोक इस तंत्र का गुणगान करने में लीन हैं । अत: समकालीन कविता ऐसी व्यवस्था के मूल में निहित कुटिलताओं के प्रति प्रश्‍नाकुल हैं-

“राष्ट्रगीत में भला कौन वह /भारत-भाग्य-विधाता है

फटा सुथन्‍ना पहने जिसका /गुन हरचरना गाता है। मखमल टमटम बल्लम तुरही

पगड़ी छत्र चँवर के साथ /तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर

जय-जय कौन कराता है ।

पूरब-पच्छिम से आते है /नंगे-बूचे नरकंकाल

सिंहासन पर बैठा, उनके /तमग़े कौन लगाता है ।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन- /अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका /बाजा रोज बजाता है ।”17 (अधिनायक)

इन परिस्थितियों का कारण लक्षित करते हुए के. सच्‍चिदानंदन समकालीन कविता में ‘प्रभावी तत्त्व की खोज’ के संदर्भ में लिखते हैं- “गांधी युग का अन्त, नए शासन से बढ़ता मोहभंग, मूल्यों का विघटन, साम्यवाद के स्तालिनवादी भाष्य से मोहभंग, ग्रामीण समाज का बिखराव, शहरी नरक का विकास, औपनिवेशिक किस्म की शिक्षा से उद्‍भूत तनावों, धर्मों और विचारधारा के प्रति अनास्था और परिणामत: व्यक्तित्व-विघटन के खतरे ने कवि की विश्‍व-दृष्टि को ही रूपांतरित कर दिया ।”18 तो ऐसे भयावह परिस्थितियों की उपज के कारण को समझने के लिए कविता आँखें खोलकर दैनिक क्रियाकलापों को केवल ताकते हुये नहीं रह सकती । इसके लिए अति सूक्ष्म दृष्‍टि से वह मानवीय गतिकी का मूल्यांकन करती है, ताकि उस महाबलशाली और अधिनायकवादी विचारधाराओं की कुटिलताओं को समझ सके, क्योंकि कुटिलता के इन कुहासों को चीरकर ही जनतन्त्र का सूर्योदय हो सकता है । वस्तुत: समकालीन कविता में कवि की इसी रूपांतरित विश्व-दृष्टि ने कुहासों को चीरकर जीवन के कड़वे यथार्थ पर प्रकाश आलोकित करने का काम किया । इसीलिए अपने समय के दबावों और मुश्किलों से जूझते हुए समकालीन कविता एक आदमी से दूसरे आदमी के बीच के अन्तराल की शिनाख़्त करती है :

“मैं एक-एक से मिला

मैंने एक-एक से बात की

मुझे आश्चर्य हुआ

लोगों को तो लोग

जानते तक नहीं थे !”19 (एक और अकाल)

मानव समाज में यह अपरिचय, वैमनस्य और अजनबीपन केवल भौतिक संसाधनों को अधिक-से-अधिक अपने पास जुटाने की होड़ के कारण निर्मित हुई । इन नकारात्मक बोध के दुश्‍चक्र की सर्वप्रथम पहचान करने वाले स्वयं कवि केदारनाथ सिंह को इन्हें तोड़कर उच्‍चतर मानवीय गुणों का आदर्श उपस्थित नहीं कर सकने का मलाल भी है । इसीलिए वे लिखते हैं- “कुल मिलाकर सन्‍ ’60 के बाद लिखी जानेवाली कविताएँ सच्‍चे अर्थ में समकालीन उपकरणों के द्वारा समकालीन कवि की ओर से समकालीन पाठक के प्रति संबोधित कविताएँ हैं और अपने समय की कोई प्रौढ़ और संपूर्ण व्यवस्था चाहे न दे पाती हों, पर उसके प्रति एक सीधी और सच्‍ची मानवीय प्रतिक्रिया की अभिव्यक्‍ति जरूर करती हैं ।”20 इस मानी में यह याद आना लाजिमी है कि, ‘Prevention is better than cure.’ वस्तुत: सही निदान तक पहुँचना प्रत्येक वैद्य का प्राथमिक दायित्व होता है । क्योंकि इसी ‘स्टेज’ के बाद ही मर्ज़ हेतु उपयुक्‍त दवा की खोज की जाती है अथवा दी जाती है । नैदानिक व्यवस्था के अभाव में मर्ज़ का इलाज करना अँधेरे में तीर चलाना होगा । यहाँ लक्ष्य-भेद हेतु लक्ष्य की पहचान कराने का दायित्व को जब कविता अपना प्राथमिक कर्तव्य समझती है, तब उस समय चलाये जा रहे अनेकानेक काव्यांदोलन के वशीभूत होकर लिखी जाने वाली कविताओं से अपना पृथक अस्तित्व जनाती हुई यह प्रस्तुत होती है । ये सारे नये वैचारिक आयाम ही दरअसल समकालीन कविता हेतु एक ऐसी पृष्ठभूमि रचते हैं, जिसे हम समकालीन कविता की गंगोत्री भी कह सकते हैं । जहाँ से आगे चलकर वह सबके हिताहित की बात करते हुए आदमी-आदमी के बीच की खाई को पाटने के लिए भरसक प्रयासरत है-

“जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा ।...

* * * *

मैं फ़ुरसत से नहीं

उनसे एक ज़रूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा ।...

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा ।”21

विनोद कुमार शुक्ल के सन्‍ 1992 में प्रकाशित संग्रह ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ से उद्धृत इन पंक्तियों के संदर्भ में युवा कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी के अध्यवसाय की पुस्तक ‘जीने का उदात्त आशय’ में निहित मंतव्य का उल्लेख न करना समकालीन कविता की वैचारिकी से खिलवाड़ करना होगा । वे लिखते हैं- “मज़े की बात यह है कि कुँवर नारायण ने 1959 में ही ‘तीसरा सप्तक’ में कुछ-कुछ इसी तरह का उद्‍गार व्यक्‍त किया था, लेकिन उसमें विश्लेषण इससे आगे का था; क्योंकि वे दरअसल उस महत्वपूर्ण कारण की भी शिनाख़्त करते है, जो उन्हें अन्यों के समीप जाने के लिए विवश करता है-

“ये पंक्‍तियाँ मेरे निकट आयीं नहीं,

मैं ही गया उनके निकट

उनको मनाने,

ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को

पास लाने ।...

...मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,

ग़ैर को अपना बनाने :

क्योंकि मुझमें पिण्डवासी

है कहीं कोई अकेली-सी उदासी

जो कि ऐहिक सिलसिलों से दूर

कुछ सम्बन्ध रखती उन पराई पंक्तियों से ।”22

इसे पढ़कर सन्‍ ’60 के बाद की कविता के संदर्भ में संशय की यह मलिनता कि, ‘अपने समय की कोई प्रौढ़ और संपूर्ण व्यवस्था न दे सकी’ भी धुल-पूछ जाती है; हम कह सकते हैं कि यह क्रमश: प्रखरतम रूप की ओर अग्रसित होती जाती है । इन सभी कारकों का परिणाम यह रहा कि अपने समय की कुंठा, संत्रास, घुटन, अकेलेपन अथवा बंजरपन देखने के बावजूद समकालीन कविता ने अपना एक अलग ‘प्लॉट’ स्थापित किया और इस दौरान विकसन की ओर ही उन्मुख रहा, नकारात्मक रुख अपने पर कभी हावी होने नहीं दिया । वस्तुत: इतने बुरे दौर में भी वह यह कह सकने में समर्थ है कि, ‘जमाना बुरा नहीं, केवल विलक्षण है’ । इन कवियों को अपने दायित्व का गहरा अहसास है, एक आस उनमें सदैव बनी हुई है कि क्या पता लोगों में समतामूलक भाव-बोध विकसित करने हेतु आग का दरिया पार करते समय कविता सद्‌विचारों को समझाने और लोगों को इस हेतु झकझोर देने में सफल हो जाए :

“उम्मीद नहीं छोड़तीं कवितायें

वे किसी अदृश्य खिड़की से

चुपचाप देखती रहती हैं

हर आते-जाते की

ओर बुदबुदाती हैं

धन्यवाद ! धन्यवाद !”23 (उम्मीद नहीं छोड़तीं कवितायें)

संदर्भ :

1. राजेश जोशी (2005), ‘समकालीनता का प्रश्‍न और कविता’, आलोचना, सहस्‍त्राब्दी: अंक 23 (अक्‍तूबर-दिसम्बर) : 31

2. वही: 31

3. रघुवीर सहाय (1978), ‘लिखने का कारण’, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली: 26

4. गजानन माधव मुक्‍तिबोध (2003), ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली: 136

5. नागार्जुन (1984), नामवर सिंह (सम्पा.), नागार्जुन: प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल पेपरबैक्स, नयी दिल्ली: 62

6. गजानन माधव मुक्‍तिबोध (2003), ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली: 24

7. वही: 268-269

8. वही: 121

9. नागार्जुन (1984), नामवर सिंह (सम्पा.), नागार्जुन: प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल पेपरबैक्स, नयी दिल्ली: 105

10. वही: 6

11. गजानन माधव मुक्‍तिबोध (2003), `चाँद का मुँह टेढ़ा है’, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली: 91

12. त्रिलोचन (1985), केदारनाथ सिंह (सम्पा.), त्रिलोचन: प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल पेपरबैक्स, नयी दिल्ली: 26

13. वही: 16

14. डॉ. अवधेश नारायण मिश्र, डॉ. नन्दकिशोर पाण्डेय (सम्पा.), ‘आधुनिक भारतीय कविता’, विश्‍वविद्यालय

प्रकाशन, वाराणसी: 46

15. नामवर सिंह (सम्पा.), ‘नागार्जुन: प्रतिनिधि कविताएँ’, राजकमल पेपबैक्स नई दिल्ली: 98

16. एकान्त श्रीवास्तव, कुसुम खेमानी (सम्पा.), वागर्थ (मासिक), भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता: 20-21

17. रघुवीर सहाय, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (1967), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली: 20

18. के. सच्‍चिदानंदन (2003), ‘प्रभावी तत्त्व की खोज : आधुनिक मलयालम कविता की सत्ता-मीमांसा’, अनामिका

(सम्पा.), भारतीय साहित्य : स्थापनाएँ और प्रस्तावनाएँ’, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली: 92

19. केदारनाथ सिंह, ‘अकाल में सारस’ (1988), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली: 74

20. केदारनाथ सिंह, ‘मेरे समय के शब्द’ (1993), राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली: 30

21. विनोद कुमार शुक्ल, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ (1992), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली: 13

22. पंकज चतुर्वेदी, ‘जीने का उदात्त आशय’ (2015), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली: 22

23. केदारनाथ सिंह, ‘अकाल में सारस’ (1988), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली: 106-07

संपर्क : शोध-अध्येता, हिंदी विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्यप्रदेश) 470003

मोबाईल : 08085913848, E-mail : akhilesh.src@gmail.com

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