समय और समाज की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति : मंगलेश डबराल -धीरेन्द्र कुमार (शोधार्थी)


परिस्थितियों के अनुसार देश-काल में परिवर्तन होता रहता है। वजह जो हो, परिवर्तन एक शाश्वत नियम है| इन बदलावों का एक सिलसिला होता है| उन सिलसिलों की कुछ कड़ियां मानीखेज होती हैं| समय और समाज इनसे गहरे तौर पर मुतास्सिर होता है, इसलिए इनकी गूंज लम्बे वक्फे तक किसी-न-किसी रूप में कायम रहती हैं| बीसवीं शताब्दी का सातवाँ दशक ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं से होकर गुजरा है, जिसने समाज, संस्कृति और राजनीति को एक साथ प्रभावित किया| समय के बदलाव की इस बयार में कोई भी पीछे नहीं था। हिन्दी कविता ने इन घटनाओं को बारीकी से परखते हुए इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। भारत-चीन युद्ध (1962), कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन (1964), नक्सलबाड़ी आन्दोलन (1967) और इसके बाद नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकार तथा साहित्य के क्षेत्र में अकविता आन्दोलन सातवें दशक की महत्वपूर्ण घटना थी। राजकमल चौधरी और धूमिल अकविता आन्दोलन के प्रतिनिधि कवि थे। विजय कुमार के शब्दों में, “अकविता आन्दोलन युवा पीढ़ी के इस भौतिक और मानसिक विस्थापन, असुरक्षा बोध और विशुद्ध दैनंदिन अस्तित्व के स्तर पर झेले जाने वाले संकट की विस्फोटक अभिव्यक्ति था। वह स्वप्न भंग का आन्दोलन था- किन्हीं अर्थों में एक नेगेटिव ऊर्जा का आन्दोलन भी।­”­­1 मंगलेश ने शुरुआती दौर में कुछ कविताएं ऐसी जरुर लिखी लेकिन वे जल्द ही इस आन्दोलन की गिरफ्त में जाने से बच गए। अकविता आन्दोलन के प्रमुख कवियों में राजकमल चौधरी, धूमिल, गंगाप्रसाद विमल, श्याम परमार, जगदीश चतुर्वेदी, सौमित्र मोहन, विष्णुचन्द्र शर्मा, चन्द्रकांत देवताले जैसे अनेक कवि शामिल थे। सातवें दशक के अंतिम वर्षों में भूमिहीन किसानों की बढ़ती संख्या और विषम विकास के चलते सरकार के प्रति पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में किसानों का गुस्सा देखने लायक था। किसानों ने जोर-शोर से अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठायी लेकिन सरकार ने दमनकारी रवैया अपनाया। हजारों किसानों-मजदूरों की नृशंस हत्या कर दी गई और इस आन्दोलन को शांत कर दिया गया। इस आन्दोलन के परिवर्तनकारी प्रयास ने देश भर के साहित्यकारों, संस्कृतकर्मियों, राजनीतिज्ञों, छात्रों की चेतना को न केवल झकझोरा बल्कि उन्हें इस पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद कविता के कथ्य में बदलाव देखा गया। हर रचनाकार अपनी रचनाओं में किसान-मजदूर वर्ग की अभिव्यक्ति करने लगा। कवियों में धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, वेणु गोपाल, कुमार विकल, अलोक धन्वा, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह तथा विजेंद्र आदि ने नक्सलबाड़ी आन्दोलन का जोर-शोर से समर्थन किया। राजेश-अरुण-मंगलेश-उदय की पीढ़ी भी इस आन्दोलन से प्रभावित थी लेकिन इन कवियों ने अभी लिखना ही शुरू किया था इसलिए ये कवि इस आन्दोलन में फंसने से बच गए। इस आन्दोलन के बाद हिन्दी कविता के स्वर में बदलाव आया। प्रगतिशील लेखक संघ के 1975 के भाषण में नामवर सिंह ने कहा था कि 1967 के नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया है।

दरअसल, सातवें दशक की कविता में कथ्य एवं शिल्प के स्तर पर बदलाव देखने को मिलता है। इस समय अधिकांश कवि मध्यवर्ग या निम्न-मध्यवर्ग से आये हुए थे जो अपनी रचनाओं में किसानों-मजदूरों को उनकी वस्तुस्थिति से जोड़कर देखकर रहे थे। इसलिए इस समय की कविता में एक ओर तीव्र आक्रोश भरा हुआ दायित्वबोध, मुखर राजनैतिक चेतना का आग्रह दिखाई पड़ता है तो दूसरी ओर गहन बेचैनी, तिलमिलाहट, कुंठा, अवमानना, नकार और अनास्था का स्वर दृष्टिगत होता है। सातवें और आठवें दशक के बदलते समय का प्रभाव बाद के कवियों की चेतना में काफी समय तक बना रहा। सातवें दशक का “एक कवि कहता है कि यह कविता ‘कविता नहीं गोली दागने की समझ है’। दूसरा कवि कविता को पहले ‘एक सार्थक वक्तव्य’ मानता है। तीसरा कवि अपनी कविता में ‘शोषक वर्ग की मौत का ऐलान’ करने लगता है।”2 इस प्रकार कवियों में आवेश भरी मुखरता का स्वर स्पष्ट देखा जा सकता है। वह उद्घोषणा करने लगता है और अपनी पक्षधरता को लेकर सभी को आश्वस्त करना चाहता है। कवि की इस इकहरी पक्षधरता के कारण कविता में एक बड़ा पक्ष छूट रहा था जिसकी ओर विजय कुमार इशारा करते हैं, “धूमिल हो या आलोक धन्वा या वेणु गोपाल- ये सभी शासक वर्ग की संस्कृति के शोषक रूपों को एक संज्ञान के स्तर पर ही इस दौर की कविता में रख पाते हैं, उनकी क्रियाविधि और विविधवर्णी छायाओं की शिनाख्त इस समय तक नहीं हो पाती।”3 यही कारण है कि अकविता तथाकथित उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग की नब्ज तो टटोलती है लेकिन निम्न मध्यवर्ग के सामाजिक यथार्थ को बारीकी से उद्घाटित नहीं कर पाती। इस समय की कविता में मनुष्य एक राजनैतिक प्राणी है लेकिन अपने समय और समाज के प्रति अन्य मनुष्य या वर्गों के प्रति, एक जटिलतम समय या स्थितियों में उसका आपस में किस प्रकार का रिश्ता है यानी सामाजिक यथार्थ का रूप कैसा है। इसका कोई संज्ञान हमें इस समय की कविता से प्राप्त नहीं होता। इसलिए आवेश और क्रांति की सरल भविष्यवाद की गोद में जन्मी इस कविता का धूमिल की मृत्यु (1977) के बाद उफान थम गया और आपातकाल के कुछ ही वर्षों बाद समकालीन कविता का चरण शुरू हुआ।

सन 1975 का वर्ष भारतीय इतिहास में एक काला धब्बा है। कांग्रेस सरकार ने देश में आपातकाल लागू कर दिया। कम्युनिस्ट पार्टी के संघर्ष और आन्दोलन से जो सपने उभर रहे थे, वह दबा दिए गए। कांग्रेस सरकार ने दमन और तानाशाही का अनूठा उदाहरण पेश किया। ‘पहाड़ पर लालटेन’ की कई कविताएं आपातकाल से उत्पन्न निराशा और दहशत की छाया से जुड़ी हुई हैं| चाहे ‘गिरना’ हो ‘आते-जाते’ हो या फिर ‘सम्राज्ञी’ हो जो इंदिरा गांधी को लक्ष्य करती है। इस कविता का कथ्य और शिल्प इतना मजबूत है कि वह संकेत में ही इंदिरा गांधी और आपातकाल से त्रस्त लोगों की हालत को बयां कर देती है। ‘आते-जाते’ कविता आपातकाल से भयभीत लोगों की गाथा ही नहीं है बल्कि इसके बाद उत्पन्न परिस्थितियों की झलक भी प्रस्तुत करती है। एक कवि या सर्जक का अपने समय और समाज के प्रति जो दायित्वबोध है उसकी आश्वस्ति इस कविता में दिखाई पड़ती है। वह ऐसे समय में कविता लिख रहा है जहां चारों ओर लोग डरे हुए हैं| कवि कहता है-

“यहाँ आते-जाते

मैंने दुनिया के बारे में सोचा

जो चारों ओर से बंद और डरी हुई थी

हमारे दिमागों की तरह

नंगी पड़ी चीजों से बाहर और भीतर

खामोश थी किताबों में

चौरस्तों पर आसमान में

कविताएं लिख-लिखकर

हम एक विशाल अंधेरे में फेंकते जाते थे

हमारे शब्दों से कितनी दूर

जिन्दा रहते थे लोग

हमारी चीख से कितनी दूर मार दिये जाते थे

किसी मोड़ पर.”4

सन 1980 में कविता की प्रकृति में आये बदलाव को आपातकाल एवं इंदिरा गांधी की सत्ता में पुनर्वापसी के रूप में देखा जाता है। आपातकाल के समय बुध्दिजीवियों को यह महसूस होने लगा कि कृषक-मजदूर समाज के हित के लिए जनतान्त्रिक ढांचे को बचाया जाना आवश्यक है। इंदिरा गांधी की वापसी के बाद राजनीति में एक नया चेहरा उभरा जिसने जनता के अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया। जनवादी संगठनों/संस्थाओं की हालत भी इनके अत्याचारों से त्रस्त थी। पूंजीपतियों के निवेशीकरण ने मध्यवर्ग एवं निम्न मध्यवर्ग का उपभोग करना शुरू किया जिसके चलते उपभोक्तामूलक संस्कृति का जन्म हुआ। इन पूंजीपतियों ने व्यक्ति के अंदर आत्मकेंद्रित किस्म के सपने जगाये जिसका हश्र यह हुआ कि ये वर्ग आसानी से मजदूर वर्ग का शोषण करने लगा। राजनीति और राजनीति से बाहर अनेक माफियाओं का जन्म हुआ जिसके चलते गुण्डागर्दी का एक ऐसा माहौल बन गया जिसने जनता पर बर्बरतापूर्वक कहर ढाने शुरू कर दिए। विजय कुमार का मानना है, “शिक्षा, प्रशासनिक ढांचे, पुलिस और न्यायपालिका पर कालेधन और भ्रष्टाचार की बढ़ती हुई जकड़न अस्सी के दशक की एक प्रमुख पहचान है। मध्यवर्ग को अय्याशी, उत्तेजना, सनसनी और उदासीनता के अंधकार में इस प्रकार ढकेला जा रहा था कि उपेक्षित वर्गों पर होने वाले अत्याचार और दमन को लेकर उसमें कहीं कोई क्लेश या नैतिक विफलता बची न रह पाए। ग्रामीण क्षेत्रों में कायम सामन्ती आतंक और शहरों तथा कस्बों में आपराधिक और साम्प्रदायिक आतंक एक ही संस्कृति के दो पूरक रूप इस दशक के दौरान बने हैं। अस्सी के दशक में यह बात साफ हुई कि अभिजन वर्ग के अपने हित आज इतने एक्सक्लूसिव हो गए हैं कि मौजूदा समाज व्यवस्था को भीतर से लगातार खोखला और गैर-जनतान्त्रिक बनाकर ही वे अपने इन हितों को बनाये रख सकते हैं।”5 ऐसे समय में मंगलेश जैसा चिंतनधर्मी कवि अपने समय की वस्तुस्थिति से जनता को अवगत कराता है। सरकारी तंत्र और इसकी शय पर पलने वाले कुछ अराजकतावादी तत्वों ने आम आदमी के जीवन को अंधकारमय बना दिया। उनके जीवन में प्रकाश की जगह अंधकार घोल दिया। कवि अपनी कविता में ऐसे अराजकतावादी तत्वों का विरोध करते हुए आमजन की चीख को अभिव्यक्त करता है-

“कौन है जो उजाले में अँधेरा मिलाता है

एक विरोध पत्र लिखते हुए

वे जिस चीख का वर्णन करते हैं

वह उनकी अपनी ही हालत होती है”6

दरअसल इसी बौध्दिक सोच के कारण अस्सी के दशक में युवा कवियों के भावबोध में बदलाव देखा गया। इन कवियों की कविता में रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जुड़े सवाल गूंजने लगे। ये मानवीय संवेदना को बचाने के लिए घर-परिवार, स्त्री-बच्चे, पास-पड़ोस, पर्यावरण सुरक्षा एवं संघर्ष आदि का राग अलापने लगे। इन्होंने निम्नवर्ग की सहानुभूति को ही नहीं अपितु मनुष्य और मनुष्य के बीच जीवंत रिश्तों की भी तलाश की, जो शोषण की चक्की में पिसते आ रहे थे। अपने दौर के सवालों को कविता के माध्यम से राजेश-अरुण-मंगलेश-उदय की युवा पीढ़ी लेकर सामने आई। इन कवियों ने जल-जंगल-जमीन के सवालों से जनता को अवगत कराया। पूंजीवाद और औद्योगीकरण से उत्पन्न समस्याओं के कारण लोगों को अपनी जमीन से विस्थापित होना पड़ा। इस विस्थापन को लेकर मंगलेश बहुत सजग हैं। चाहे वह पहाड़ से शहर में विस्थापन हुआ हो या मैदानी गाँव से। विस्थापन की त्रासदी तो सबको झेलनी पड़ती है। ‘एक पुरानी कहानी’ कविता विस्थापित लोगों की मनःस्थिति की गाथा ही नहीं है अपितु शहर के वातावरण में अपने को किसी तरह ढालने की विकट अकुलाहट भी है-

“चाहे जैसी भी हवा हो

यहीं हमें जलानी है अपनी आग

जैसा भी वक्त हो

इसी में खोजनी है अपनी हँसी”7

मंगलेश की कविता अपने समय और समाज को लेकर बहुत ही सजग है। समकालीन कविता में अस्सी के आसपास घर-परिवार, स्त्री-पुरुष, बच्चे, पेड़-पौधे आदि विषयों को लेकर कविता लिखी जा रही थी। उसकी अभिव्यक्ति मंगलेश की कविता में साफ झलकती है। ‘शुरुआत’ एक ऐसी कविता है जिसमें कवि बदलते वक्त के मिज़ाज को उद्घाटित करने का प्रयत्न करता है। कवि एक तरफ गाँव की बदलती प्रकृति का वर्णन करता है वहीं दूसरी ओर पेड़ों पर कम फल आने की आहत एवं दुबले-पतले बच्चों और उनके कातर माता-पिता की स्थिति को प्रकट करता है-

“यह ज़मीन हर साल

और कठोर होती जाती है

पेड़ हर साल कुछ कम फल देते हैं

बच्चे दिखते हैं और भी दुबले

उनके माँ-बाप कुछ और कातर

मौसम बदल रहा है

रात किसी जानवर की तरह

गाँव को दबोचे हुए है”8

ऐसे समय में मंगलेश समय की गति के महत्त्व को पहचानने की वकालत करते हैं। वह अपनी एक अन्य कविता में रेल की सीटी के माध्यम से सोये हुए लोगों की ज़िन्दगी को जगाने का प्रयास करते हैं। समय चीजों को पीछे ढकेलते हुए अवरुध्द गति से आगे बढ़ रहा है जिस तरह रात्रि के बियाबान में रेल सीटी देते हुए अपने गंतव्य पर आगे बढ़ती रहती है-

“नींद जैसे एक बियाबान में

रेल सीटी देती है

समय बीत रहा है

समय बीत जायेगा

चीजों को पीछे छोड़ते हुए.”9

कवि तेजी से बदलते समय में अपने समय और समाज के यथार्थ को बारीकी से परखता है। वह मानवीय भावनाओं के प्रति संवेदनशील है। समय के मिजाज को देखते हुए वह चिंता व्यक्त करता है। आज बुजुर्ग लोगों के लिए अपना घर, अपने बेटे अपने नहीं हैं। वे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। एक बड़ी संख्या में बूढ़े माता-पिता को बेसहारा किया जा रहा है| क्योंकि आज मनुष्य के पास अपने व्यस्त जीवन में उनकी देखभाल के लिए समय नहीं। ऐसे संवेदनहीन समय में कवि मनुष्य को, रिश्तों की बदलती शक्ल पर सोचने के लिए बाध्य करता है-

“कैसा वक्त है यह

दोस्त धमकाते हैं दोस्तों को

बूढ़े भटकते हैं जगह-जगह

पते पूछते हुए

मैं चाहता हूँ हम गहरा शोक व्यक्त करें इस पर”10

मंगलेश ने अस्सी के बाद उभरी साम्प्रदायिकता को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने राजनीति के फासीवादी चरित्र को बेनकाब कर मानवीयता को बचाने की वकालत की। सन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लाखों सिक्ख भाइयों की नृशंस हत्या ने मानवीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया। दिल्ली के हालात कुछ ऐसे थे जहाँ चारों ओर आग और खून की नदी बह रही थी। सिक्ख भाइयों की बहू-बेटियों के साथ जघन्य अपराध कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। यह देश की राजधानी को शर्मसार करने वाली बड़ी घटना थी जिसने उस समय एक खास कम्युनिटी के अंदर भय और दहशत का माहौल पैदा कर दिया। मंगलेश की ‘शोकगीत’ कविता चौरासी के दंगों का स्पर्श मात्र नहीं करती बल्कि उस समय के शोकगीत को अपने में अभिव्यक्त करती है। कवि लिखता है-

“चारों तरफ से आते इस शोकगीत को सुनो

जिसमें कोई स्वर नहीं कोई लय नहीं

स्मृतियाँ भी नहीं हैं

सिर्फ रात है उन अक्षरों पर गिरती हुई

जिन्हें तुम अज्ञात लिपि की तरह पढ़ते हो रात भर.”11

सन 1992 में बाबरी-मस्जिद विध्वंस से एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए। राजनीति और धर्म के ठेकेदार इस घटना के बाद उभरी आग से अपनी रोटी सेंकते रहे। ऐसे समय में कवियों ने हिन्दुत्ववादी ताकतों के खिलाफ आवाज बुलंद की। मंगलेश ने अयोध्या में धर्म के नाम पर हुए इस कुकृत्य पर अपनी कविता में विरोध दर्ज किया। उन्होंने धर्म के नाम पर लोगों के अंदर आग भड़काने वाले व्यक्तियों की मानसिकता को न केवल कठघरे में खड़ा किया बल्कि अराजकतावादी ताकतों को देश के लिए खतरनाक भी बताया। कवि ‘दूसरे लोग’ कविता में लिखता है-

“आग लगाने वालों

इससे दूसरों के घर मत जलाओ

आग मनुष्य की सबसे पुरानी अच्छाई है

यह आत्मा में निवास करती है और हमारा भोजन पकाती है.

अत्याचारियों

तुम्हें अत्याचार करते हुए बहुत दिन हो गये

जगह-जगह पोस्टरों अख़बारों में छपे तुम्हारे चेहरे कितने विकृत हैं

तुम्हारे मुख से निकल रहा है झाग.

और तुम जो कुछ कहते हो उससे लगता है

अभी नष्ट होने वाला है हमारा संसार.”12

ऐसे समय में मंगलेश मानवीय मूल्यों को बचाने की वकालत करते हुए लिखते हैं-

“यह ऐसा समय है

जब कोई हो जा सकता है अंधा लंगड़ा

बहरा बेघर पागल.”13

2002 में गुजरात साम्प्रदायिकता की आग में जलने लगा । अयोध्या से लौट रहे सैकड़ों हिन्दू लोगों को मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में जलाकर रख कर दिया। इसके बाद गुजरात साम्प्रदायिक दंगों में जलने लगा। मुस्लिम और हिन्दुओं के बीच भड़के दंगों ने लाखों मनुष्यों को जलाकर रख कर दिया। सत्ता के मौन रवैये और विवादास्पद चरित्र ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटलबिहारी वाजपेयी सरकार को हस्तक्षेप करने पर मजबूर होना पड़ा | ऐसे क्रूरतापूर्ण समय में हिन्दी कवियों ने भारी संख्या में कविता लिखकर गुजरात के नरसंहार की भर्त्सना की। इस प्रकार कविता ने अपनी सामाजिक भूमिका अदा करते हुए साम्प्रदायिकता को रोकने में काफी मदद की। ‘गुजरात के मृतक का बयान’ मंगलेश की एक ऐसी कविता है जो पाठक को बताती है कि गुजरात दंगों में मनुष्य मात्र की कम, मनुष्यता की ज्यादा मृत्यु हुई। किसी एक समुदाय के सम्पूर्ण परिवारों को निर्ममतापूर्वक मारे जाना मानवीयता की हत्या से कम नहीं था। कवि इस कविता में एक जगह लिखता है-

“मेरी औरत मुझसे पहले ही जला दी गयी

वह मुझे बचाने के लिए मेरे आगे खड़ी हो गई थी

और मेरे बच्चों को मारा जाना तो पता ही नहीं चला

वे इतने छोटे थे उनकी कोई चीख़ भी सुनाई नहीं दी

मेरे हाथों में जो हुनर था पता नहीं उसका क्या हुआ

वे अब सिर्फ जले हुए ढांचे हैं एक जली हुई देह पर चिपके हुए

उनमें जो हरकत थी वही थी उनकी कला”14

पं. जवाहरलाल नेहरु ने साम्प्रदायिकता के विषय में कहा था, “साम्प्रदायिकता इस देश के शरीर में घोंपा हुआ खंजर है और जो व्यक्ति जातिवादी होगा, वह सच्चा धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता।”15 नेहरु जी का यह कथन आज भी सार्थक लगता है। ऐसे में जहां मनुष्यता का पतन जारी है, उसे बचाने की बहुत जरूरत है। ऐसे समय में मंगलेश जैसा कवि इंसानियत को बचाने की वकालत करता है-

“एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है

मसलन यह कि हम इंसान हैं

मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सच्चाई बची रहे”16

कविता अपने समय और समाज की सच्चाई को प्रकट करती है। सोवियत संघ के विघटन के बाद मार्क्सवादी विचारधारा के रचनाकारों को एक बहुत बड़ा झटका लगा। अमरीकी साम्राज्यवाद की जीत ने अनेक कवियों, साहित्यकारों एवं बुध्दिजीवियों के सपने को चकनाचूर कर दिय। उस समय कवि अशांत, उदास एवं बेचैनी के दौर से गुजर रहे थे। उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी साफ झलक रही थी। ‘अभिनय’ मंगलेश की ऐसी कविता है जो शहर के व्यक्ति के जीवन में व्याप्त उदासी एवं मन की अशांति को उद्घाटित करती है। यह कविता एक कवि की सोवियत संघ के विघटन के बाद की स्थिति को अभिव्यक्त करती है तो दूसरी तरफ शहरी लोगों के जीवन की यथास्थिति को उद्घाटित करती है। कवि लिखता है-

“एक गहन आत्मविश्वास से भरकर

सुबह निकल पड़ता हूँ घर से

ताकि सारा दिन आश्वत रह सकूं

एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ

वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी

एक से तपाक से हाथ मिलाता हूँ

वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत”17

इनकी अधिकांश कविताएं दुख, करुणा और बेचैनी से भरी हुई हैं। समाज में हर तरफ मनुष्य विरोधी शक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है और मनुष्य इनके खिलाफ अपनी सारी लड़ाई स्थगित किये हुए है। इनकी कविताओं में एक अजब सी बेचैनी है जिसके पीछे आवाजों की चीख सुनाई देती है। ‘अपनी तस्वीर’ कविता के माध्यम से कवि समय की इस पीड़ा को उद्घाटित करता है-

“लड़ने की उम्र जबकि बिना लड़े बीत रही है

इसमें किसी युध्द से लौटने की यातना है”18

पंकज चतुर्वेदी ने इनकी कविताओं के विषय में लिखा है, “वह ऊपरी तौर पर सतही और शांत जान पड़ सकती हैं, पर उनकी भीतरी तहों में बेचैनी की आवाजें भरी हुई हैं।”19 वास्तव में मंगलेश की कविता का स्वर शांत है लेकिन अंदर बेचैनी और करुणा की महीन आवाजों का संसार व्याप्त है।

बाजारवाद और भूमंडलीकरण के इस दौर में मंगलेश की कविता इक्कसवीं सदी के यथार्थ को हमारे सामने प्रकट करती है। आज जब सम्पूर्ण विश्व में बाज़ार का बोलबाला है, भूमंडलीकरण ने सम्पूर्ण विश्व को एक वैश्विक गाँव में तब्दील कर दिया है। ऐसे समय में यथार्थ को पकड़ना काफी जटिल है। आज एक ओर किसान-मजदूर वर्ग की स्थिति अत्यंत सोचनीय है वहीं दूसरी ओर पूंजीपति वर्ग और उच्च मध्यवर्ग की ज़िन्दगी का स्तर बहुत ऊँचा है। साधारण व्यक्ति या कवि के लिए यह ज़िन्दगी चकाचौंध करने वाली है। कवि इस यथार्थ को उद्घाटित करता है लेकिन ऐसा करते वक्त ‘नये युग का शत्रु’ उस पर हमला करता है-

“यथार्थ इन दिनों इतना चौंधियाता हुआ है

कि उससे आँखें मिलाना मुश्किल है

मैं उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ता हूँ

तो वह एक हिंस्र जानवर की तरह हमला करके निकल जाता है”20

ऐसे दौर में मंगलेश मनुष्य के अंदर इंसानियत को देखने की कोशिश करते हैं। गाँव से शहर तक हर जगह हत्याएं, लूट, बलात्कार जैसे भीषण अपराधों की संख्या बढ़ती जा रही है। लचर प्रशासन व्यवस्था और सरकार की असंवेदनशील एवं गैर जिम्मेदारी के कारण आये दिन ऐसी घटनाएँ पुनः देखने को मिल रही हैं। ऐसे समय में कवि व्यक्ति से कहता है-

“अपने भीतर जाओ और एक नमी को छुओ

देखो बची हुई है या नहीं इस निर्मम समय में”21

मंगलेश धीरे-धीरे खत्म हो रहे जीवन मूल्यों और व्यक्ति में उत्पन्न असंवेदनशीलता पर वार करते हैं। वह समकालीन हिन्दी कविता का ध्यान उस ओर दिलाना चाहते हैं जिसकी आज समाज को जरूरत है। समाज एवं सत्ता की ठेकेदारी करने वालों ने आज समाज और देश को इतना खोखला कर दिया है जिसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है। इसलिए कवि कहता है कि समाज के उत्थान के लिए जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया, उन बेचारों को क्या मिला? जिन लोगों ने समाज एवं सत्ता का भोग किया आज वही समाज के नियंता बने हुए हैं। मंगलेश की यह चिंता विचारणीय है-

“जिसने कुछ रचा नहीं समाज में

उसी का हो चला है समाज”22

कवि सदैव अमानवीय ताकतों का विरोध करता है। समाज और राष्ट्र के हित के लिए अपने जीवन में अनेक अभाव एवं कष्ट झेलता है। ताकत की दुनिया से उसका कोई सरोकार नहीं। वह तो मानवता को सदा पल्लवित और पुष्पित होते देखना चाहता है। मंगलेश की कविता इसी भाव भूमि से उर्वरता प्राप्त करती है। ‘ताकत की दुनिया’ कविता एक कवि एवं मनुष्य के लिए साधारण जीवन जीने की वकालत करती है। एक मनुष्य की पहचान बताते हुए आवश्यकतानुसार कम से कम चीजों के उपभोग पर बल देती है। समाज में असमानता एवं अत्याचार को दूर कर समानता लाने की मुखालफत करती है। मंगलेश लिखते हैं-

“मैं क्यों कब्जा करूंगा इस धरती पर

किसी को जरूरत हुई तो दे दूँगा उसे जो भी होंगे मेरे खेत खलिहान

मैं कोई दरिंदा नहीं जो किसी धरती पर बम गिराने चला जाऊंगा

मैं मनुष्य हूँ

तेल पीते और खून चूसते हुए मैं क्यों बिता दूँगा अपना जीवन.”23

संदर्भ ग्रंथ-सूची

१. विजय कुमार – कविता की संगत , पृ. ४१

२. उपर्युक्त, पृ. ४३-४४

३. उपर्युक्त, पृ.४४

४. मंगलेश डबराल – पहाड़ पर लालटेन, पृ.१२-१३

५. कविता की संगत , पृ.४७

६. मंगलेश डबराल – हम जो देखते है ,पृ.८१

७. मंगलेश डबराल – घर का रास्ता ,पृ.२९

८. उपर्युक्त, पृ. ३७

९. पहाड़ पर लालटेन, पृ.५७

१०. घर का रास्ता ,पृ.६०-६१

११. उपर्युक्त, पृ.३८

१२. मंगलेश डबराल – आवाज भी एक जगह है ,पृ. ८५-८६

१३. हम जो देखते है ,पृ. ८३

१४. मंगलेश डबराल – नये युग में शत्रु ,पृ. ५२

१५. निराशा में भी सामर्थ्य,पृ. ४९

१६. हम जो देखते है ,पृ. ८४

१७. उपर्युक्त, पृ. १३

१८. उपर्युक्त, पृ. २८

१९. निराशा में भी सामर्थ्य,पृ. २२

२०. नये युग में शत्रु ,पृ. २०

२१. उपर्युक्त ,पृ. ४०

२२. आवाज भी एक जगह है ,पृ. ८८

२३. नये युग में शत्रु ,पृ. ३६

धीरेन्द्र कुमार (शोधार्थी )

भारतीय भाषा केंद्र

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

नयी दिल्ली-110067

Mob.- 9643358835

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