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समाजद्रोही कवि अज्ञेय का व्यक्तित्व एवं काव्य सौन्दर्य


“मैं सभी ओर से खुला हूँ

वन –सा ,वन-सा अपने में बंद हूँ

शब्द में मेरी समाई नहीं होगी

मैं सन्नाटे का छंद हूँ “

अज्ञेय जैसा बहुमुखी प्रतिभा का धनी समाजद्रोह का साहस रखने वाले तीक्ष्ण द्रष्टि कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को शब्दों में परिभाषित करना कठिन ही नहीं नामुमकिन है .7 मार्च, 1911 को कुशीनगर में जन्मे सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार थे। वह न केवल प्रतिभासम्पन्न कवि, कथाकार, ललित-निबन्धकार, अपितु कई प्रसिदध समाचार पत्र यथा सैनिक ,प्रतीक ,साप्ताहिक दिनमान ,नवभारत टाइम्स के निपुण सम्पादक भी रहे ।न केवल देश में अपितु विदेशों में भी अपनी सर्जना का लोहा मनवाने वाले अज्ञेय को भारत में भारतीय पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय 'गोल्डन रीथ' पुरस्कार आदि के अतिरिक्त साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964) ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978) से सम्मानित किया गया था। इनके पिता पण्डित हीरानंद शास्त्री प्राचीन लिपियों के विशेषज्ञ थे। इनका बचपन इनके पिता की नौकरी के साथ कई स्थानों की परिक्रमा करते हुए बीता। लखनऊ, श्रीनगर, जम्मू घूमते हुए इनका परिवार 1919 में नालंदा पहुँचा। नालंदा में अज्ञेय के पिता ने अज्ञेय से हिन्दी लिखवाना शुरू किया। इसके बाद 1921 में अज्ञेय का परिवार ऊटी पहुँचा ऊटी में अज्ञेय के पिता ने अज्ञेय का यज्ञोपवीत कराया और अज्ञेय को वात्स्यायन कुलनाम दिया। इन्होने अपने घर पर ही भाषा, साहित्य, इतिहास और विज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा आरंभ की। 1925 में अज्ञेय ने मैट्रिक की प्राइवेट परीक्षा पंजाब से उत्तीर्ण की इसके बाद दो वर्ष मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में एवं तीन वर्ष फ़ॉर्मन कॉलेज, लाहौर में संस्थागत शिक्षा पाई। वहीं बी।एस।सी।और अंग्रेज़ी में एम।ए।पूर्वार्द्ध पूरा किया। इसी बीच भगत सिंह के साथी बने और 1930 में गिरफ़्तार हो गए। अज्ञेय ने छह वर्ष जेल और नज़रबंदी भोगने के बाद 1936 में कुछ दिनों तक आगरा के समाचार पत्र सैनिक के संपादन मंडल में रहे, और बाद में 1937-39 में विशाल भारत के संपादकीय विभाग में रहे। कुछ दिन ऑल इंडिया रेडियो में रहने के बाद अज्ञेय 1943 में सैन्य सेवा में प्रविष्ट हुए। 1946 में सैन्य सेवा से मुक्त होकर वह शुद्ध रुप से साहित्य में लगे। मेरठ और उसके बाद इलाहाबाद और अंत में दिल्ली को उन्होंने अपना केंद्र बनाया। अज्ञेय ने प्रतीक का संपादन किया। प्रतीक ने ही हिन्दी के आधुनिक साहित्य की नई धारणा के लेखकों, कवियों को एक नया सशक्त मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता का नया इतिहास रचा। 1965 से 1968 तक अज्ञेय साप्ताहिक दिनमान के संपादक रहे। पुन: प्रतीक को नाम, नया प्रतीक देकर 1973 से निकालना शुरू किया और अपना अधिकाधिक समय लेखन को देने लगे। 1977 में उन्होंने दैनिक पत्र नवभारत टाइम्स के संपादन का भार संभाला। अगस्त 1979 में उन्होंने नवभारत टाइम्स से अवकाश ग्रहण किया। काव्य कृतियों में भग्नदूत (1933) चिंता (1942)इत्यलम (1946)हरी घास पर क्षण भर (1949)बावरा अहेरी (1954)आंगन के पार द्वार (1961)पूर्वा (1965) कितनी नावों में कितनी बार (1967)क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (1969) सागर मुद्रा (1970) पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (1973)उपन्यास विधा में शेखर,एक जीवनी (1966) नदी के द्वीप (1952) अपने अपने अजनबी (1961) इनकी सर्वाधिक प्रसिदध कृतियाँ हैं जिन्हें आज भी पाठक बड़े ही मगन होकर पढ़ते हैं और उनके शब्द संयोजन ,अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण कला के अद्भुत सामंजस्य युक्त सर्जना का रसास्वादन करते हैं ।

अज्ञेय का काव्य सौन्दर्य

अज्ञेय कविता कहने के लिए भारी भरकम क्लिष्ट शब्दों का जमघट लगाने के वजाय कम शब्दों में वजनदार बात कहना ज्यादा उपयुक्त समझते थे , उनके मंतव्य को उनके काव्य को पढ़कर समझा जा सकता है ,लेकिन उन्हें या उनके भाषा सौन्दर्य को शब्दों में बयान करना मानो सूरज को दीपक दिखाना है ,अज्ञेय शब्दों के कुशल चितेरे थे ,मितभाषा उनका स्वाभाव भी था और उनके काव्य की विशेषता भी ।वह कम शब्दों में शुद्ध भाषा और मनोभावों का ऐसा सुन्दर शिल्प निर्मित करते हैं जैसे बया छोटे -छोटे तिनकों से सुन्दर एवं कलात्मक घोंसले का निर्माण करती है ।उनकी कविताओं में एक ख़ास व्यंग्य और लक्ष्य छिपा होता था ,वह किसी लक्ष्य विशेष पर भावपूर्ण लघु शब्दों से खेल व्यंग्यात्मक कटाक्ष कर जाते थे । उन्हें शब्दों की बिसात पर समाज में व्याप्त बुराइयों के मोहरों को शय और मात देना खूब भाता था । उन्होंने कविता “जितना तुम्हारा सच है “में लेखकों और कवियों को यह बात समझाने की कोशिश की है ,कैसे आइये देखें-

“मौन भी अभिव्यंजना है

जितना तुम्हारा सच है

उतना ही कहो “

अज्ञेय के अनुसार काव्य में अभिव्यक्ति से ज्यादा सम्प्रेषण मायने रखता है अथार्थ अगर बात सिर्फ सुनी गयी और सुनने वाले के दिल में न उतरी तो उस बात का कहना फिजूल गया ,कभी कभी जो बात शब्दों से बयां नहीं होती उसे आपका मौन या आपकी आँखें या हाव भाव संप्रेषित कर जाते हैं ।'अज्ञेय' अपने काव्य में नित नए प्रयोग करते रहते थे ,वह काव्य में हर उस चीज का समावेश करते थे जो उन्हें पसंद आती जैसे -उनके काव्य में आपको लोक कथाओं की रोचकता भी मिलेगी लोक गीतों की मिठास भी मिलेगी और मुहावरों का चटपटा प्रयोग भी मिलेगा,वह क्लिष्ट भाषा का भी प्रयोग करते थे और आम बोलचाल की भाषा में भी लिखते थे ,उनका लेखन किसी एक शैली में सीमित नहीं वरन बहुआयामी था ।अज्ञेय कवियों की भेडचाल और उनके लेखन की भड़ास से क्षुब्द थे और अपने काव्य के माध्यम से वह नए कवियों और लेखकों को सीख भी दिया करते थे ,”हरी घास पर क्षण भर “उनकी इस प्रसिद्द कविता में वह नए कवियों को निर्देश देते हैं कि –

“सुनो कवि: भावनाएं नहीं हैं सोती

भावनाएं खाद हैं केवल

जरा उनको दवाकर रखो

जरा सा और पकने दो

ताने और तचने दो “

अज्ञेय ने 1943 में सात कवियों के वक्तव्य और कविताओं को लेकर एक लंबी भूमिका के साथ तार सप्तक का संपादन किया। अज्ञेय ने आधुनिक हिन्दी कविता को एक नया मोड़ दिया, जिसे प्रयोगशील कविता की संज्ञा दी गई। इसके बाद समय-समय पर उन्होंने दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक और चौथा सप्तक का संपादन भी किया। अज्ञेय का कृतित्व बहुमुखी है और वह उनके समृद्ध अनुभव की सहज परिणति है,वह साहित्य समाज और संस्कृति को जीवन की जरूरत मानते थे और यही तीनो तत्व उनके सृजन का मूल आधार भी थे । अज्ञेय की प्रारंभ की रचनाएँ अध्ययन की गहरी छाप अंकित करती हैं या प्रेरक व्यक्तियों से दीक्षा की गरमाई का स्पर्श देती हैं, बाद की रचनाएँ निजी अनुभव की परिपक्वता की खनक देती हैं। और साथ ही भारतीय विश्वदृष्टि से तादात्म्य का बोध कराती हैं। अज्ञेय स्वाधीनता को महत्त्वपूर्ण मानवीय मूल्य मानते थे, परंतु स्वाधीनता उनके लिए एक सतत जागरुक प्रक्रिया रही। अज्ञेय ने अभिव्यक्ति के लिए कई विधाओं, कई कलाओं और भाषाओं का प्रयोग किया, जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, यात्रा वृत्तांत, वैयक्तिक निबंध, वैचारिक निबंध, आत्मचिंतन, अनुवाद, समीक्षा, संपादन। उपन्यास के क्षेत्र में 'शेखर' एक जीवनी हिन्दी उपन्यास का एक कीर्तिस्तंभ बना। नाट्य-विधान के प्रयोग के लिए 'उत्तर प्रियदर्शी' लिखा, तो आंगन के पार द्वार संग्रह में वह अपने को विशाल के साथ एकाकार करने लगते हैं,वह गद्ध लेखन अपने पूरे नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के नाम से करते थे और काव्य मात्र अज्ञेय के नाम से उनके कई उपनाम भी थे जैसे कि –श्रीवत्स,कुट्टीचातन ,गजानन पंडित ,डॉ अबुल लतीफ़ और समाजद्रोही इत्यादि ।

सपना मांगलिक

एफ -६५९ कमला नगर आगरा २८२००५

९५४८५०९५०८ email- sapna8manglik@gmail.com

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