स्त्री-पुरूष संबन्ध और ‘गोदान’


प्रेमचन्द के ‘गोदान’ उपन्यास को भारत के 20वीं शती के चौथे दशक की महाकथा कहा जाता है। ‘गोदान’ में एक ओर गाँव का जीवन है, तो दूसरी ओर शहर का। गाँव में सीधे-सादे किसान हैं, अनपढ़, विपन्न, जिनकी विपन्नता ने उनकी कोमल वृत्तियों के स्रोत सुखा दिये हैं। उनके छोटे-छोटे खेत हैं, जिनमें काम करके वे महाजनों, जमींदारों के पेट भरते हैं और खुद भूखों मरते हैं। गाँव में साहूकार हैं जो निर्ममता के साथ जोकों की तरह किसानों के खून से चिपटे रहते हैं। गाँव में पंचायत है, जिसमें अब पंच परमेश्वर नहीं बसते हैं, बल्कि इसकी जगह पर निर्दय आत्मसेवी बसते हैं। गाँव में धर्म के भूत का दयनीय डर है तो साथ ही समाज में संकीर्ण नेग-नियम भी हैं। दूसरी ओर शहर है जहाँ सब पैसे के गुलाम बसते हैं, जो पाखण्ड को समाज के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त मानकर बरतते या जीते हैं, जो स्वार्थ को निर्लज्जता के साथ बिना शिष्टाचार के श्वेत परिधान में टाँके, व्यवहार करते हैं। जहाँ प्रेम, प्रेम न रहकर वासना या स्वार्थ का दूसरा नाम है और जहाँ मानवता समाज से निष्कासित होकर रास्तों में ठोकरें खाती फिरती है। इस ग्रामीण-शहर के विस्तृत चित्रण के बाद प्रेमचन्द ने स्त्री-पुरूष के चिर संबंधों की व्यंजना, समाज की वर्तमान परिस्थितियों में उसका स्वरूप, प्रेम का रहस्य दर्शन भी ‘गोदान’ में अछूता नहीं छोड़ा है।

‘गोदान’ में स्त्री-पुरूष सम्बंध पर दृष्टि डाली जाये तो सबसे पहले हमें ग्रामीण जीवन में होरी और धनिया की प्रेम कहानी दिखाई देती है जो गोदान के नायक-नायिका हैं। इस प्रेमकथा के नायक-नायिका प्रेम के किसी उद्दाम दौर से नहीं गुजरते। हिन्दुस्तानी देहात में पति-पत्नी बनाने वाली एक सामाजिक प्रथा उन दोनों को एक साझा जिन्दगी देती है। वे स्त्री-पुरूष के रूप में जीते हैं, मुखर प्यार भी वे कम ही जानते हैं। होरी और धनिया के प्यार में दो-दो बातें हो रही हैं। होरी कहता है कि दुनिया बहुत गमखोर है। धनिया कहती है कि होरी के साथ दूसरी स्त्री का निर्वाह नहीं होता। होरी धनिया के नैहर रूठकर चले जाने और अपने मनुहार करने की याद दिलाता है तो धनिया कहती है कि ‘‘जब गरज सताती थी तब मनाने आते थे लाला, मेरे दुलार से नहीं।’’1 यहाँ प्रेमचंद जी लिखते हैं – ‘‘वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है। फिर मध्याह्न के प्रखर ताप में लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है उसके बाद विश्राममयी संध्या, शीतल और शांत, जब गम से थके पथिकों की भांति दिन भर की यात्रा का वृत्तांत करते और सुनते हैं – तटस्थ भाव से।’’2 इन पंक्तियों में दाम्पत्य रति की सांध्यदीप्त की अवसादमयी अनुभूति बड़ी ही मार्मिक हो जाती है। पति-पत्नी के सहज संबंधों में परिस्थितियाँ कड़वाहट घोल देती हैं। गोदान में होरी क्रोध में आकर धनिया को सबके सामने पीटता है। धनिया इसके बदले में सिर्फ मान करती है। साथ ही प्रेमचन्द ने इसकी तरफ संकेत किया है कि क्रोध और मान दाम्पत्य जीवन की स्थायी भावनाएं नहीं हैं। पत्नी पति के प्रति कभी अनुदार नहीं हो सकती। होरी इस घटना के बाद बीमार पड़ता है। धनिया का सारा मान समाप्त हो जाता है। धनिया होरी से समय-समय पर उलझती रहती है। धनिया को होरी की भीरुता सहन नहीं होती। जीवन में बहुत से ऐसे अवसर आते हैं जब धनिया अपने तीखे वचनों से होरी को मर्माहत कर देती है। धनिया होरी का विरोध तो करती है क्योंकि जीने के लिए यह जरूरी है कि अन्याय और कायरता का विरोध किया जाय। इसके साथ ही धनिया होरी के कृषकाय शरीर को अपने सम्पूर्ण-सतीत्व से अभयदान देती है। जीवन की कड़वाहट में दाम्पत्य जीवन का रस बहाती रहती है। धनिया जीवन के संघर्षों में घर और घर के बाहर खेतों में अपना पूरा सहयोग देती है। होरी जीवन के प्रत्येक धरातल पर बुरी तरह पराजित है। अपने अंतिम क्षणों में वह धनिया से विदा मांगता है। उसकी मृत्यु के समय ‘गोदान’ की बात उठती है और धनिया सुतली बेचकर जो बीस आने पैसे पाती है वही पति के हाथ में रखकर ‘गोदान’ कर देती है। पति का वह यहां साथ नहीं दे पाती है। पति के प्रति वह पूर्ण समर्पिता है पर अंत में वह पछाड़ खाकर ऐसी गिरती है कि जैसे वह पति के बिना निशेष हो चुकी है।

दूसरी तरफ देखें तो ‘गोदान’ में धनिया कई बार होरी का विरोध तो करती है लेकिन वह होरी के प्रति कोई कठोर निर्णय नहीं लेती है। रिश्ते को बचाने का जिम्मा प्रेमचन्द केवल धनिया पर ही छोड़ देते हैं, क्यों? प्रेमचन्द स्त्री-पुरूष के जीवन के दो पहिये की गाड़ी को केवल धनिया (एक पहिये) से घिसटाने के लिए उसके हिस्से में छोड़ देते हैं, क्यों? क्यों हर कदम पर स्त्री ही अपना सब कुछ त्याग करती रहे? क्यों वह पुरूष के हृदय परिवर्तन का इन्तजार करे? वह क्यों न पुरुष के रिश्ते तोड़ने से पहले ही तोड़ दे? लेकिन नहीं, धनिया ऐसे निर्णय ले ये प्रेमचन्द को शायद सही नहीं लगता क्योंकि धनिया को देवी बनाने के लिए उससे त्याग कराना तो आवश्यक था। नहीं तो लोग धनिया का प्रेम होरी के प्रति देखकर यह नहीं कह पाते कि देहात की स्त्री शिक्षिता नहीं है पर उसके विचारों में गहराई है। पति के प्रति उसकी निष्ठा एकनिष्ठ है, उसकी निष्ठा, सतीत्व की मर्यादा और नारीत्व की गरिमा युग-युग की नारी की विभूति है। वह नारीत्व के सम्पूर्ण तप और व्रत से अपने पति की मंगल-कामना ही नहीं करती अपितु जीवन-संघर्ष के लिए प्रेरणा भी देती है।

प्रेमचन्द के ‘गोदान’ में ग्रामीण जीवन में एक तरफ होरी धनिया का दामपत्य जीवन है तो दूसरी तरफ गोबर-झुनिया का। पहले गोबर झुनिया से प्रेम करता है। उससे बड़े-बड़े वायदे करता और कस्में खाता है। वही गोबर जब झुनिया को शहर ले जाता है तो वह वहाँ उसको मारता-पीटता है उसके प्रति वह उपेक्षित हो जाता है तो डॉ राजेश्वर गुरू कहते हैं – ‘‘गोबर और झुनिया का प्रेम प्रारम्भिक उन्माद की स्थिति से होता हुआ कर्तव्य के रास्ते पर तब तक स्थिर रहता है, जब तक गोबर शहर में झुनिया को लेकर उसे केवल विलास की वस्तु नहीं समझ लेता। उसके संतुलित जीवन में असंयम का प्रवेश उसके और उसकी पत्नी, दोनों के सुख को नष्ट कर देता है।’’3 इसके बाद गोबर अतृप्त रह जाता है और झुनिया विक्षुब्ध हो जाती है। झुनिया के बेटे की मृत्यु उसे और अधिक विरक्त कर देती है और गोबर से उसे अब विकर्षण होने लगता है। झुनिया के मन में बैठ गया था कि ‘‘यह पक्का मतलबी, बेदर्द आदमी है। मुझे केवल भोग विलास की वस्तु समझता है।’’4 इधर गोबर का मन झुनिया की ओर से खिंचता है। इस तरह से दोनों में द्वेष भावना उत्पन्न होने लगती है। मिल की हड़ताल में आहत होने के बाद गोबर को होश आता है, वह झुनिया से अपने किये की मांफी मांगता है और झुनिया श्रम करके कमाती है और कमा कर अपने पति को स्वस्थ बनाती है। इधर गोबर कटुता की जगह मृदुता और अभिमान की जगह नम्रता का पाठ सीख चुका था। एक तरफ प्रेमचन्द जी ने गोबर झुनिया प्रसंग में यह संदेश दिया है कि भोग विलास ही जीवन की सार्थकता नहीं है, त्याग और सेवा ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है। वहीं दूसरी तरफ देखा जाय तो इस प्रसंग में भी प्रेमचन्द जी ने सहनशील और त्याग की मूर्ति बनाने के लिए झुनिया के दायरे को सीमित कर दिया है। झुनिया कदम-कदम पर अपने अरमानों का त्याग करती जाती है। गोबर के द्वारा बेरहमी से पिटकर भी वह उसके प्रति कोई कठोर निर्णय नहीं लेती है बल्कि वह गोबर के हृदय परिवर्तन तक इन्तजार भी करती है।

मातादीन और सिलिया का संबंध प्रेम के आधार पर है। मातादीन ब्राह्मण है, सिलिया चमारिन। उसके प्रेम के पथ में एक रोड़ा जाति का है तो दूसरा रोड़ा है मातादीन के कृपणता और स्वार्थपरकता का। सिलिया निष्ठा के भाव से माता-पिता का अत्याचार सहकर, पति की विरक्तता सहकर अपना कर्तव्य निबाहती रहती है और उसकी अडिग निष्ठा और कर्तव्यशीलता एक दिन आखिर मातादीन से फिर उसको मिला देती है। मातादीन, ग्लानि और पश्चाताप के भाव से कहता है – ‘‘यह मेरी देवी का मंदिर है, जिसमें वह एक लोटा पानी उड़ेलकर नहीं चला जाएगा, जब तक प्राण है, सिलिया की शरण में रहूँगा। उसकी पूजा करूँगा।’’5 इस संबंध में गोपाल राय का मत है कि ‘‘गोदान में गोबर और झुनिया तथा सिलिया और मातादीन के विवाह के रूप में उन्होंने विधवा-विवाह का ही नहीं, अन्तर्जातीय विवाह का भी चित्रण किया है। इसमें गोबर और झुनिया के विवाह में तो कोई क्रान्तिकारिता नहीं है, पर सिलिया और मातादीन के विवाह में प्रेमचन्द एक सामाजिक क्रान्ति की ओर बढ़ते अवश्य दिखाई देते हैं।’’6 इस बात को तो नहीं नकारा जा सकता कि मातादीन और सिलिया का विवाह अन्तर्जातीय है। इस विवाह को प्रेमचन्द ने दिखाकर वास्तव में एक बड़ी क्रान्तिकारिता का परिचय दिया है परन्तु सिलिया जैसी स्त्री का चित्रण भी धनिया और झुनिया के पात्रों सा ही दिखाया है। वही त्याग और सहनशीलता का गुण सिलिया पर हावी है। सिलिया भी आखिर तक मातादीन के हृदय परिवर्तन का इन्तजार करती रहती है। इस तरह से देखा जाय तो कहीं-न-कहीं प्रेमचन्द स्त्री के पक्ष को दिखाने में कमजोर नजर आते हैं।

‘गोदान’ में दूसरी ओर जो स्त्री-पुरुष संबंध प्रभावित करता है वह है भोला और नोहरी का। भोला-नोहरी के संबंध को प्रेमचन्द ने कभी उचित नहीं माना, स्वाभाविक भी नहीं। धनिया भोला को ताने देते हुए कहती है, ‘‘जब औरत को बस में रखने का बूता न था, तो सगाई क्यों की थी? क्या सोचते थे, वह आकर तुम्हारे पांव दबाएगी, तुम्हें चिलम भर-भरकर पिलाएगी और जब तुम बीमार पड़ोगे, तो तुम्हारी सेवा करेगी। तो ऐसा तो वही औरत कर सकती है, जिसने तुम्हारे साथ जवानी का सुख उठाया हो।’’7 भोला और नोहरी के संबंध को प्रेमचन्द ने दिखाकर यह स्पष्ट किया है कि अनमेल विवाह व उसके कुपरिणाम क्या होंगे।

‘गोदान’ में मेहता जिस प्रेम को खूंख्वार शेर कहते हैं वह स्त्री-पुरुष सब में है, किन्तु सोना में सबसे अधिक प्रगट है। वह निरपराध सिलिया का भी अपमान कर देती है। प्रेमचन्द ने एक छोटे से प्रसंग में इनके प्रेमाकाश पर आ रही बादल की एक टुकड़ी की ओर इशारा किया है और बताया है कि किस प्रकार सोना अपने प्रेम की रक्षा करती है। सोना को जब जान पड़ता है कि उसका पति लम्पटता करना चाहता है, तो वह जैसे भूखी बाघिन की तरह झपटती है और तब उसके पति को सहमते ही बनता है। लेकिन यह सब क्षणिक है वे जैसे एक-दूसरे के मन को समझे हुए हैं, इसीलिए लड़कर भी एक हो जाते हैं। दूसरी तरफ रूपा के वैवाहिक जीवन को प्रेमचन्द ने पूर्ण सुखी बताया है। रामसेवक बूढ़ा है, इससे रूपा प्रभावित नहीं है प्रेमचन्द लिखते हैं कि ‘‘रूपा अपनी ससुराल में खुश थी। जिस दशा में उसका बालपन बीता था, उसमें पैसा सबसे कीमती चीज थी। मन में कितनी साधें थीं जो मन में ही घुट-घुटकर रह गई थीं। वह अब उन्हें पूरा कर रही थी।...अनाज के भरे हुए बखार, गाँव से सिवान तक फैले हुए खेत तथा द्वार पर ढोरों की कतारें और किसी प्रकार की अपूर्णता उसे अंदर आने ही न देती थी।’’8 रूपा अपने अभावों को रामसेवक के वैभव में पूरा होते देखती है। पति इसीलिए वृद्ध होकर भी उसके मन में अन्यथा भाव पैदा नहीं कर पाता। प्रेमचन्द जी की ये बात मेरे गले से नहीं उतरती है कि रूपा को रामसेवक के बूढ़े होने का अहसास नहीं होता होगा। कोई भी इन्सान क्या पैसे पाकर अपने पति की इतनी बड़ी कमी को भूल जायेगा। भले वह लोगों के सामने किसी कारणवश जाहिर न करे लेकिन उसके मन में यह जरूर रहता होगा कि उसका पति बूढ़ा है।

‘गोदान’ में एक तरफ ग्रामीण जीवन में स्त्री-पुरुष संबंध को प्रेमचन्द ने दिखाया है तो दूसरी तरफ शहरी जीवन में भी स्त्री-पुरुष संबंध को दिखाया है। जो पूरे उपन्यास पर छाया हुआ है। खन्ना और गोविन्दी के निर्मल जीवन-आकाश में मालती घटा की तरह घिरती है। प्रेमचन्द कहते हैं कि ‘‘खन्ना और गोविन्दी में नहीं पटती।’’9 लेकिन प्रेमचन्द जानते हैं कि इनमें क्यों नहीं पटती। गोविन्दी विलास की दासी नहीं, कर्तव्यानुरत है और उसका स्वामी विलास के पीछे प्रमत्त। वह आगे लिखते हैं कि ‘‘बच्चों का लालन-पालन और गृहस्थी के छोटे-छोटे काम ही उसके लिए सब कुछ हैं। वह इनमें इतना व्यस्त रहती है कि भोग विलास की ओर उसका ध्यान ही नहीं आता। आकर्षण क्या वस्तु है और कैसे उत्पन्न हो सकता है, इसकी ओर उसने कभी विचार नहीं किया। वह पुरुष का खिलौना नहीं है, न ही उसके भोग की वस्तु। फिर क्यों आकर्षण बनने की चेष्टा करे। अगर पुरुष उसका असली सौन्दर्य परखने के लिए आंखें नहीं रखता, कामिनियों के पीछे मारा-मारा फिरता है। तो वह उसका दुर्भाग्य है। वह उसी प्रेम और निष्ठा से पति की सेवा किये जाती है।’’10 गोविन्दी का दुख पति की विलास-प्रियता के कारण है। खन्ना मालती के तितली रूप के पीछे दीवाने हैं लेकिन वह पति की बेरूखी से अचिंतित अपने कर्तव्य निर्वाह में लगी रहती है। एक बार अवश्य वह बहुत दुखी होकर अपने कर्तव्य से भागना चाहती है। वह घर छोड़कर चले जाने का संकल्प करती है। ऐसे अवसर पर मेहता उसे समझाकर घर में रहने के लिए कहते हैं। मेहता के समझाने से वह और अधिक संलग्नता से, मनोयोग से अपने काम में लग जाती है। आखिर विजय उसी की होती है। पथ भ्रान्त खन्ना को उस दिन होश आता है जिस दिन उसकी मिल में आग लगती है। उस समय उन्हें संतोष अपनी पत्नी की छाया से मिलती है। इस तरह से खन्ना-गोविन्दी का संबंध टूटने से बच जाता है। इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए मन में कुछ प्रश्न जरूर उठते हैं वह यह कि क्या गोविन्दी जैसी मध्यवर्ग की स्त्री को प्रेमचन्द पुरुषों के द्वारा लिए गये निर्णयों पर चलने के लिए विवश नहीं दिखा रहे? क्या प्रेमचन्द गोविन्दी को खन्ना द्वारा दिये जा रहे दुख-दर्द को सहने के लिए विवश नहीं दिखा रहे? क्यों प्रेमचन्द हर कदम पर गोविन्दी से ही त्याग करवाते हैं वही त्याग खन्ना क्यों नहीं कर सकता? यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं है कि प्रेमचन्द का उद्देश्य खन्ना और गोविन्दी प्रसंग में गोविन्दी जैसे पात्र को स्वाभिमानी, स्वतंत्रता और स्वावलम्बी दिखाने का नहीं रहा है बल्कि प्रेमचन्द खन्ना और गोविन्दी के माध्यम से यह बताना चाहते है कि शहर में रहने वाले कुछ सहृदय मनुष्यों को छोड़कर पूरा एलीट समाज का जीवन विघटन की ओर अग्रसर हो रहा है। वह इसलिए कि पुरुष समाज स्वार्थी और विलास की ओर अधिक प्रवृत्त हो रहा है।

मालती और मेहता ‘गोदान’ के सबसे आकर्षक पात्र हैं। रायसाहब के यहाँ उत्सव में हम उन्हें पहली बार देखते हैं। दोनों में अजीब सजीवता है एक में बौद्धिकता और स्पष्टवादिता के कारण दूसरे में अपने तितलीपन के कारण। पहले ही दृश्य में दोनों के विनोदपूर्ण जीवन के चित्र हमें मिलते हैं। संयोग मेहता और मालती को निकट लाता है। लेकिन मेहता के विचार मालती के प्रति इस प्रकार हैं ‘‘तुम सब कुछ कर सकती हो,...स्वाभिमानी हो,...त्याग कर सकती हो, लेकिन प्रेम नहीं कर सकतीं।’’11 क्योंकि मेहता को जिस त्याग और प्रेम पर उन्हें श्रृद्धा है वह मालती में नहीं बल्कि गोविन्दी में दिखती है।

इस बीच मेहता के संपर्क में आकर मालती में परिवर्तन होना शुरू होता है। जिस मालती ने खन्ना के सम्पर्क में पुरुषों को कभी सम्मान की वस्तु नहीं समझा, वही मालती मेहता के संपर्क में आकर कहती है ‘‘पुरुष अब सम्मान की वस्तु हो गई इसीलिए कि मैंने पुरुष का जो रूप अपने परिचितों की परिधि में देखा था, उससे वह कहीं सुंदर है।’’12 मालती के जीवन पर किसानों का भी प्रभाव पड़ता है। वह गरीबों के घर बिना फीस के ही मरीजों को देखने चली जाती थी। उसके व्यवहार में मृदुता आ गई थी। इस नये रूप में मालती मेहता के आकर्षण का केन्द्र बन जाती है प्रेमचन्द लिखते हैं कि ‘‘ज्यों-ज्यों वह मालती को निकट से देखते थे उनके मन में आकर्षण बढ़ता जाता था। रूप का आकर्षण तो उन पर कोई असर न कर सकता था ये गुण का आकर्षण था।’’13 इस बात पर एक प्रश्न उठता है कि क्या स्त्री के बिना त्याग के उससे प्रेम नहीं किया जा सकता? शायद यह बात मालती समझ गई थी इसीलिए तो मेहता मालती के इन गुणों के आकर्षण के चलते भी उसे पूरा-पूरा नहीं पा सके। मालती कहती है ‘‘...मैं क्यों अस्थिर और चंचल हूँ इसलिए कि मुझे वह प्रेम नहीं मिला जो मुझे स्थिर और अचंचल बनाता। अगर तुमने मेरे सामने उसी तरह आत्मसमर्पण किया होता जिस तरह मैंने तुम्हारे सामने किया है, तो तुम आज मुझ पर यह आक्षेप न रखते।’’14 आगे वह कहती है ‘‘मैं प्रेम को संदेह से ऊपर समझती हूँ। यह देह की वस्तु नहीं, आत्मा की वस्तु है। संदेह का वहाँ जरा भी स्थान नहीं और हिंसा तो संदेह का ही परिणाम है। वह सम्पूर्ण आत्मसमर्पण है। उसके मंदिर में तुम परिक्षक बनकर नहीं, उपासक बनकर ही वरदान पा सकते हो।’’15 इस कषाघात से मेहता को आत्मविश्लेषण का मौका मिला। इस बीच मालती में आत्मतुष्टि आ गई और मेहता में तृष्णा। मालती संलग्नता के साथ अपने कामों में लगी रहती। मेहता उसे तृष्णा भरी आँखों से देखते रहते। प्रेमचन्द लिखते हैं ‘‘मालती केवल रमणी नहीं है, माता भी है और ऐसी-वैसी माता नहीं, सच्चे अर्थों में देवी और जीवन देने वाली जो पराये बालक को भी अपना समझ सकती है, जैसे उसने मातापन का सदैव संचय किया हो और आज दोनों हाथों से उसे लुटा रही हो।’’16 मालती के इस रूप दर्शन ने मेहता के मुँह से बरबस कहला लिया कि ‘‘मालती तुम देवी हो-त्याग की, मंगल की, पवित्रता की।’’17 जिस मिलन के लिए दोनों बावले थे। आज मिलकर खो गये। लेकिन दूसरे ही क्षण में उन्होंने अपने अस्तित्वों को पारिवारिकता के बन्धन में बाँध लेने के बजाय समाज-हित के लिए सदैव आजाद रखने का निश्चय कर लिया। मेहता और मालती के प्रसंग से प्रेमचंद ने यह स्पष्ट किया है कि स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध सिर्फ दाम्पतिक-जीवन ही नहीं हो सकता है बल्कि उन दोनों के बीच एक मैत्रीपूर्ण या मित्रवत् संबंध भी हो सकता है।

प्रेमचन्द स्त्री पात्र को मजबूती देने में कमजोर नजर आते हैं जैसे पुनिया को हीरा सबके सामने पीटता है तो पुनिया उसे महज भला-बुरा कहकर ही चुप हो जाती है। मीनाक्षी का विद्रोह साहचर्य का विद्रोह है जबकि पुनिया का विद्रोह वर्चस्व का विद्रोह है। एक शिक्षित और आधुनिकता से प्रभावित है तो दूसरी अशिक्षित और परम्परा से ग्रसित। मीनाक्षी दिग्विजय सिंह के अत्याचारों को सहने के लिए तैयार नहीं है। यह दोनों टूटते हुए दाम्पत्य-जीवन का वीभत्स दृश्य उपस्थित कर देते हैं। प्रेमचन्द लिखते हैं ‘‘एक दिन मीनाक्षी क्रोध में आकर हंटर लिया। दिग्विजय सिंह के बंगले पर पहुँची, शोहदे जमा थे और वेश्या का नाच हो रहा था, उसने रणचण्डी की भाँति पिशाचों की इस चांडाल-चौकड़ी में पहुँच कर तहलका मचा दिया। हंटर खाकर लोग भागने लगे। जब दिग्विजय सिंह अकेला रह गया तो उसने उन पर सड़ा-सड़ हंटर जमाने शुरू किये। इतना मारा कि कुंवर साहब बेदम हो गये।’’18 यह प्रसंग उपन्यास में ऐसा नाटकीय रूप उपस्थित करता है कि पाठक इसमें खो जाता है। यह स्त्री जागरण का नव-उन्मेष है। प्रेमचन्द ने इसके माध्यम से यह बताना चाहा है कि स्त्री भी अपने अधिकार के लिए पुरुष से लड़ सकती है। वह जीवन की गति में पुरुष से भी आगे निकल सकती है लेकिन प्रेमचन्द मीनाक्षी के चरित्र का विकास नहीं दिखाते हैं। वे मीनाक्षी-दिग्विजय प्रसंग को अधूरा ही छोड़ देते हैं, क्यों? ऐसी अवस्था में मीनाक्षी दाम्पत्य-जीवन की परिस्थितियों में घुट-घुटकर जीने वाली स्त्रियों के लिए क्या प्रेरणा का स्रोत हो सकती है? प्रेमचन्द ने पुरुष-सत्ता के विरुद्ध मीनाक्षी के द्वारा किये गये प्रबल प्रतिकार को एक तार्किक परिणति तक क्यों नहीं पहुँचाया?

इस प्रकार ‘गोदान’ में स्त्री-पुरुष संबंधों के प्रसंगों में हमें होरी-धनिया, गोबर-झुनिया, मातादीन-सिलिया, भोला-नोहरी, मथुरा-सोना, खन्ना-गोविन्दी, मालती-मेहता, दिग्विजय-मानाक्षी इत्यादि प्रसंग मिलते हैं। इन प्रसंगों के संबंधों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उपन्यास में प्रेमचन्द का कथ्य किसान का सम-सामयिक जीवन ही नहीं है बल्कि वे मानव संबंधों की कथा भारतीय संदर्भ में कहना चाहते हैं। स्त्री की प्रेम करने की प्रवृत्ति सहज स्वाभाविक है, वह नगर और गाँव की सीमाओं में नहीं बंधती। झुनिया प्रेम करती है, साथ आश्रय भी पाती है। यहाँ विधवा समस्या के रूप में झुनिया को लिया गया है। विधवा आश्रय की खोज में भटकती है। प्रेमचन्द क्योंकि सुधारवादी थे। इसलिए उन्होंने झुनिया का पतन नहीं दिखाया, अपितु विधवा-विवाह को मान्यता दी है। साथ ही इस प्रसंग के माध्यम से वह प्रेम और भोग, त्याग और वासना में अन्तर दिखाना चाहते थे। ‘गोदान’ में सिलिया और मातादीन की प्रेमकथा भी है। वस्तुत: यहाँ पर भी सिलिया के प्रेम में अछूत समस्या अधिक है। धर्म और ऊँच-नीच की दीवारें व्यक्ति-व्यक्ति को अलग-अलग बाँट नहीं सकतीं। उन्होंने इस कथा के माध्यम से धर्म के ढोंग पर भी व्यंग्य किया है। दिग्विजय और मीनाक्षी तथा कुछ हद तक मेहता और मालती के प्रसंग को छोड़कर और जितने भी प्रसंग हैं उन सब के स्त्री पात्र स्वाभिमान, स्वतंत्रता, स्वावलम्बन और निर्णय लेने की क्षमता की दृष्टि से कमजोर दिखाई देते हैं। इन सबके बावजूद हमें इन प्रेम कथाओं में स्त्री के गरिमामय रूप का ही अंतिम में चित्रण मिलता है। ‘गोदान’ में कर्तव्यशील स्त्री प्रेम माँगती है और सबका सुख भी। इस तरह स्त्री-पुरुष के संबंधों को देखने से पूरा ‘गोदान’ ही ‘प्रेमकथा’ के रूप में नजर आने लगता है।

संदंर्भ-सूची

1. गोदान – प्रेमचन्द, मारुति प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 26

2. वही, पृष्ठ संख्या – 26

3. प्रेमचन्द का अध्ययन – डॉ. राजेश्वर गुरु, पृष्ठ संख्या – 241

4. गोदान – प्रेमचन्द, मारुति प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 221

5. वही, पृष्ठ संख्या – 274

6. हिन्दी उपन्यास का इतिहास – गोपाल राय, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 136

7. गोदान – प्रेमचन्द, मारुति प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 233

8. वही, पृष्ठ संख्या – 282

9. वही, पृष्ठ संख्या – 149

10. वही, पृष्ठ संख्या – 149-150

11. वही, पृष्ठ संख्या – 64

12. वही, पृष्ठ संख्या – 228

13. वही, पृष्ठ संख्या – 245

14. वही, पृष्ठ संख्या – 247

15. वही, पृष्ठ संख्या – 248

16. वही, पृष्ठ संख्या – 266

17. वही, पृष्ठ संख्या – 269

18. वही, पृष्ठ संख्या – 256

सोनम मौर्या

पी.एच.डी. (हिन्दी), प्रथम सत्र

जेएनयू

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