सुधाकर मिश्र के काव्य में युग -बोधडॉ॰ उमेश चन्द्र शुक्ल

एम॰ए॰,पी-एच॰डी

एसोसिएट प्रोफेसर

अध्यक्ष, हिन्दी विभाग

महर्षि दयानंद कॉलेज परेल, मुंबई -400012

shuklaumeshchandra@gmail.com

103 ओशियन व्यू आर॰एन॰पी॰ पार्क भाईन्दर (पूर्व)

ठाणे, मुंबई पिन -410015

सुधाकर मिश्र साठोत्तरी हिन्दी कविता के एक शक्तिशाली हस्ताक्षर है। उनकी रचनाएँ एक तरफ पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवन संघर्ष से जुड़ी हैं, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना से।पौराणिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी उन्होंने अपनी बहुत सी रचनाओं की आधारशिला रखी है, जिसमें रामायण,महाभारत तथा प्राचीन एवं मध्यकालीन इतिहास के साथ-साथ आधुनिक इतिहास का भी सराहनीय योगदान है। परन्तु इन सबके बीच जिस प्रकार उनके काव्य में आधुनिक युगबोध की अन्तःसलिला प्रवाहित है, उससे मिश्र जी के काव्य के लक्ष्य एवं उद्देश्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है की वे पुराण एवं इतिहास के माध्यम से जहाँ अपनी जातीय अस्मिता के उज्ज्वल तथा गरिमा मंडित स्वरूप को अंकित करना चाहते हैं वहीँ उनकी सहायता से वर्तमान बहुकोणीय समस्याओं का समाधान तथा लोगो का उचित मार्गदर्शन भी करना चाहते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में समकालीन समस्याएं प्रायः झांकती मिलती हैं।

मिश्र जी ने सन् १९५० के आसपास लिखना प्रारम्भ किया था। सन् १९५४ में उन्होंने ' शम्पा ' जैसे काव्य का प्रणयन किया। वह समय हमारे देश में स्वतंत्रता के उदय का काल था। स्वतंत्रता पूर्व देशवासियों ने जो सपने देखे थे, उनकी परिपूर्णता को साक्षात देखने की छटपटाहट उन्हें बेचैन कर रही थी। जैसे - जैसे समय बीत रहा था, अधीरता की कड़वाहट बढ़ती जा रही थी लेकिन परतंत्रता के त्रासद काल में लोग द्वेष तथा अलगाववाद की भावना का जो परिणाम देख चुके थे उसे फिर से देखना - सुनना नहीं चाहते थे। अतएव प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देने की चाहत सब में दृढ़मूल हो रही थी। राजनीति के क्षेत्र में भी मतभेद के बावजूद विद्वेष को कोई स्थान नहीं मिल रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध की विनाश लीला ने भी लोगों में मानवता के प्रति उदार होने की बाध्यता पैदा कर दी थी। अतएव तरुण कवि मिस्र जी का प्राकृतिक सौंदर्य तथा सहज प्रेम की तरफ झुकना स्वाभाविक था, इसलिए उनका पहला खण्डकाव्य शम्पा प्रकृति एवं प्रेम की उदात्त छवियों से भरा हुआ है।प्रकृति के साथ मानव प्रेम सम्बन्ध की 'शम्पा' में वर्णित कथा का लौकिक प्रेमी - प्रेमिका के प्रेम को संकेतित करना शायद मानवता के प्रति कवि के झुकाव का परिणाम है। प्राकृतिक सौंदर्य, मानवता के प्रति प्रेम तथा युग बोध के जुड़ाव ने कवि को वैश्विक सुख - शांति की ओर मोड़ कर उसकी सोच को एक व्यापक धरातल प्रदान किया है -

आओ, जग बुला रहा है

जन आँगन भरती जाओ;

हे मेघ - मालिका - बाले;

फिर उठो और इठलाओ।

* * * * * * * * * * * *

खिल उठे विश्व, नव - जीवन

छा जाये नभ उजियाली;

मानव कुटिया में फिर से,

जगमग - जग जले दिवाली ॥। .... शम्पा : पृ : 191 - 192

'शम्पा' के लेखन पूर्व देश स्वतंत्र हो चुका था। गांधी जी की हत्या हो चुकी थी.। देश एक ऐसे अन्धकाराच्छन्न वातावरण में सुख शांति एवं प्रगति के सपने देख रहा था जिसमें किसी के मार्गदर्शन रुपी प्रकाश की अत्यंत आवश्यकता थी। ऐसी परिस्थिति में मिश्र जी ने 'शम्पा ' की रचना की। शायद उनका उद्देश्य यह था की जिस प्रकार वे घनाच्छन्न अन्धकार में 'शम्पा' की सहायता से, उसके प्रकाशमय मार्गदर्शन से अपने गंतव्य तक पहुंचे उसी प्रकार इस देश को भी एक ऐसा मार्गदर्शक मिले जिसके मार्गदशन में यह देश भी प्रगति की एक गरिमामय ऊंचाई छू सके तथा विश्व के सुख-शांति की स्थापना में अपना सहयोग दे सकें। यही नहीं कवि चाहता है कि इस प्रकार के मार्गदर्शन में इतनी शक्ति हो कि मानव जाति की सारी चिंताएं नष्ट हो जाएँ। एक ऐसा प्रलय उपस्थित हो जिसमें धरती के सारे अशुभ तत्त्व - द्वेष, ईर्ष्या, भ्रष्टाचार, शोषण आदि जल कर राख हो जाएं और उस राख सेप्रेम का एक ऐसा अंकुर फूटे जो सबके ह्रदय में अपना अमर स्थान बना ले। प्रेम और अपनत्व की यह भावना कभी भी मानव ह्रदय से अलग न हो और उसे सतत शीतलता प्रदान करती रहे -

चिंता जल जाय, प्रलय हो

भस्मों में राग मिलाये;

चिर - संगिनि हो यह आशा,

उर शत शीतलता पाये ॥। .... शम्पा - पृ 53

सन् १९६२ से लेकर सन् १९७१ तक का समय अपने देश के सन्दर्भ में युद्ध काल कहा जा सकता है। सन् १९६२ में चीन ने हमारी उत्तरी सीमा पर युद्ध का बिगुल बजाया था। सन् १९६५ तथा १९७१ में पाकिस्तान ने भी ऐसी ही दृष्टता की थी। इन युद्धों ने हमारे देशवासियों में राष्ट्रीयता की उद्वेलनकारी भावना पैदा की। लोग तन - मन - धन से देश - सेवा के लिए सन्नद्ध हो गए। बच्चे बूढ़े और जवान सभी में त्याग,सेवा तथा एकता की उत्साहवर्धक चेतना जागृत हुई। हिंदी के प्रायः सभी तत्कालीन कवियों ने उक्त राष्ट्रीय भावना से अपने काव्य का श्रृंगार किया है। मिश्र जी भी इस जागरूकता में पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी अपनी रचनाओं से अपनी सेना और भारतीय जनमानस में राष्ट्र भक्ति की उदात्त भावना भरने का पूरा प्रयास किया।उनकी ऐसी रचनाएँ 'कुरसी' तथा 'हिमाद्रि - गर्जन ' नामक संग्रहों में संगृहीत हैं " बेला आयी दिव्य हवन की "शीर्षक कविता में वे लिखते हैं -

मातृभूमि की सीमा पर, फिर दहकी आग नयी है

सुन भीषण हुंकार, नींद चुपके से भाग गयी है।

प्राण - प्राण को कसम, पिता - माता की पुत्र स्वजन की

हुत कर दो सर्वस्व कि बेला आयी दिव्य हवन की ॥। हिमाद्रि - गर्जन पृ 55

एक किसान के माध्यम से 'कामना ' शीर्षक कविता में देशभक्ति के जिस परिपूर्ण एवं पवित्र स्वरुप को मिश्र जी ने वाणी दी है, वह निश्चित रूप से सराहनीय है -

यही कामना एक ह्रदय में, प्रभो पूर्ण कर देना

जहाँ जले काया मेरी, निर्मल गंगा बहती हो,

ऊपर चमके चाँद और नीचे हो दूब-बिछौना,

'कहाँ जा रहे ', पास मंजरी से कोयल कहती हो ॥ हिमाद्रि - गर्जन पृ 56

जहाँ जन्म लूँ, पावन धरती हो स्वतंत्र भारत की,

पड़े सुनाई राष्ट्रगीत, सुमधुर स्वर गाया जाता।

ह्रदय चीर कर अपना, यदि इस दुनिया को दिखलाऊँ

मिले तिरंगा, भारत माँ के हाथों में लहराता ॥ हिमाद्रि - गर्जन पृ 56

कोई भी समर्थ कवि अपने युग की पगध्वनि को दुर्लक्षित नहीं करता। देश ही नहीं विदेश में भी घटित होने वाली ऐसे घटनाओं को जो मानवता को हिला देती हैं, वह अपने सहज लेखन क्रम में शब्दबद्ध करने के लिए बाध्य हो जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति जान केनेडी की हत्या एक ऐसी हे घटना थी। मिश्र जी ने चीन के युद्ध के समय भारत का हर तरह से समर्थन करने वाले उस महान नेता के प्रति अपनी शब्दांजलि अर्पित करने की सहृदयता तथा जागरूकता की अवहेलना नहीं की है। वे लिखते हैं -

देवता यदि हैं कहीं तुम देवता थे,

सत्य - शिव - सुन्दर - समन्वय के पता थे।

था दिवाकर - सदृश निर्मल तेज तन में,

उठ नहीं पाये अमंगल भाव मन में ॥

* * * *

कौन कर सकता जिसे तुम कर गए हो,

अमर हो तुम, कौन कहता मर गए हो।। अग्रदूत सूर्योदय के पृ 10

अपने देश में भी घटित होने वाली ऐसी घटनाओं को चाहे हत्या की हो या सामान्य मृत्यु की कवि ने अपने करुण ह्रदय की वाणी दी है।ऐसी घटनाओं में गांधीजी तथा इंदिरा जी की हत्या एवं नेहरू और शास्त्री जी की मृत्यु प्रमुख हैं।शास्त्री जी की मृत्यु पर लिखी उनकी कविता -

गरिमाहीन जगत लगता है,हे जन - मन - सुख के अभिलाषी

तप्त ह्रदय सब आकुल बैठे, आँखे हैं दर्शन की प्यासी।

जीत समर सो गए सदा हित होकर अमर,शान्ति सेनानी !

युग - युग यहाँ चलेगी दुःख से वामन - काय विराट कहानी ॥

---- अग्रदूत सूर्योदय के पृ 39

आपातकाल हमारे देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा काला धब्बा है। मानव अधिकारों को कुचलने के उस कुप्रयास की प्रायः सभी दलों ने निंदा की थी। देश के साहित्यकार भी इसमें पीछे नहीं रहे।मिश्र जी ने भी नेताओं को बादल तथा आपातकाल को मानसून मानकर'हटा लो मानसून बादलों ' शीर्षक एक कविता लिखी। इस कविता में उन्होंने कभी निवेदन तो कभी आक्रोशमत्त धमकी द्वारा बादलों से मानसून हटाने के बहाने नेताओं से आपातकाल हटाने की बात कही है -

रुको, बादलों ! रुको,

नहीं तो निकलेंगे हम लेकर अपने छाते

खोल कर छाती, रोकेंगे तुम्हारे तीर

मर जाएंगे सानन्द, रण - गंगा में नहाते - नहाते ॥

* * * * *

बंद करो अब अपनी यह बरसात

नहीं देखा जाता हमसे उड़ते पक्षियों का मरना।

असहनीय हो गयी है तुम्हारी उपजायी घुटन

क्या शोभा देता है तुमसे लोगों का इस तरह डरना ॥ कुरसी पृ 67

नारी मुक्ति आंदोलन की प्रखरता आज भी समाप्त नहीं हुई है। हमारे देश में तो स्त्रियां अपनी मुक्ति के लिए आजकल और अधिक सचेत तथा प्रयासरत हैं।मिश्र जी ने अपने काव्य में भारतीय नारी के लुप्तप्राय प्राचीन गौरव को फिर से विश्व के समक्ष उपस्थित करने का प्रयत्न किया है। कवि की ' मैं ग्वाला हूँ' शीर्षक कविता में श्री कृष्ण दुर्योधन से कहते हैं -

कुरुनंदन ! जिसके शासन में

नारी अनाथ - सी रोती है,

उसके सर्वस्व नाश का वह

अज्ञात बीज बो देती है ॥

* * * *

नारी है नर की ऋद्धि - सिद्धि,

नारी है नर का बल अजेय,

नारी पूजा की अधिकारी,

नारी है नर का ह्रदय प्रेय ॥ मनीप्लांट और फूल - पृ 98

किसी कवि के लिए उसकी संस्कृति का बड़ा महत्व होता है। शायद ही कोई ऐसा कवि हो जिसके काव्य में उसकी अपनी संस्कृति की झांकी उपलब्ध न हो। यही कारण है के प्रत्येक कवि में समकालीन सांस्कृतिक बोधउपस्थित रहता ही है। मिश्र जी अपनी संस्कृति से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं।इसलिए चाहे गाँव की संस्कृति हो अथवा शहर की मिश्र जी की कविताओं में उसके चित्रण का आभाव नहीं है।

भारतीय संस्कृति में अध्यात्म की प्रमुखता है। आध्यात्मिक चिंतको के अनुसार परमब्रह्म परमात्मा संसार का मूल है, सभी जीव उसी से उत्पन्न होते हैं और मृत्यु के पश्चात उसी में विलीन हो जाते हैं। यह परमात्मा प्रकाश स्वरुप है। उसी का प्रकाश सबको प्रकाशित रखता है। वही जीवन प्रदान करता है। मिश्र जी के काव्य में, विशेषकर 'किरणिका ' में इस स्वर को प्रमुखता प्राप्त है। उनके अनुसार जब तक परमात्मा का प्रकाश प्राणियों के शरीर में उपस्थित रहता है तब तक उनका शरीर तेजोमय बना रहता है। जैसे ही वह प्रकाश शरीर का साथ छोड़ देता है,मिट्टी का हँसता - खेलता शरीर सामान्य मिट्टी की तरह निर्जीव हो जाता है -

प्राणी का शरीर मिट्टी है

महत - किरण वाहन है।

ज्योतिमाल के बिना सूर्य का

विग्रह भी पाहन है ॥

* * * *

पाकर किरण चमकने लगती

है मिट्टी की काया ।

झलक रही काया - काया में

उस अनंत की छाया ॥ किरणिका - पृ 59

परम तत्व के अतिरिक्त हमारी संस्कृति के अन्य तत्वों - त्याग, तप, सेवा, सत्य, अहिंसा, करुणा, सर्वेसन्तु सुखिनः आदि का भी उनके काव्य में श्रद्धा संपन्न चित्रण उपलब्ध है।

वैश्विक परिदृश्य में युद्ध तथा आतंक की विनाशक गतिविधियों ने लोगों को यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया है की मानव जाति और उसकी संस्कृति की रक्षा किस प्रकार की जाय । विषमता की प्रचंडता तथा स्वार्थ की भीषणता से आज का युग आक्रांत है।आदमी का अहंकार इन्हें बराबर बढ़ा रहा है । न कही सुख है न शांति । भोग विलास की भावना मानव को राक्षस बना रही है। अधिक से अधिक अर्थ संग्रह की कामना भ्रष्टाचार तथा वैमनस्य की आग में घी का काम कर रही है।उदात्त मानव संस्कृति की स्रोतस्विनी सूखती जा रही है। विज्ञान की प्रगति ने मानव को दिशाहीन-सा बना दिया है। विनाश की सारी सामग्री तैयार हो गयी है। मूल्य मंडित विचारधारा तथा सच्ची विश्वदृष्टि लुप्त सी होती जा रही है। " समूची दुनिया जीवन और अस्तित्व के रहस्य खोकर एक भयावह मंडी में बदल गयी है।जहाँ मूल्य और विचार भी बिकने के लिए अभिशप्त हैं। जो ताकतवर हैं उनका आतंक सब ओर छाया है। कुछ लोग साम्प्रदायिकता तथा धर्मान्धता को वैध बनाने के लिए प्रयत्नशील है।"- कवि का अर्थात -डॉ.परमानंद श्रीवास्तव पृ.-11

ऐसी परिस्थिति में चिंतक तथा संवेदनशील कवियों का मौन रहना उनकी उत्तरदायित्व हीनता का परिचायक है। मिश्र जी एक जागरूक कवि हैं। उन्हें अपनी साहित्यिक और सामाजिक जिम्मेदारी का ज्ञान है। फलस्वरूप उनकी रचनाओं में इन समस्याओं के प्रति चिंता तथा चिंतन का अभाव नहीं मिलता है।

मिश्र जी के मन में आतंक तथा युद्ध के प्रति बेहद घृणा है। 'रामोदय में उन्होंने रावण को एक आतंक-प्रेमी शासक के रूप में देखा है। जामवंत के प्रश्नों का उत्तर देते हुए श्रीराम कहते हैं --

ऐसा कुछ भी नहीं

आज जाने क्यों मन में आया -

काश, दशानन

आतंकों से दूर रह गया होता।

सुख से जिओं और

दूसरों को सुख से जीने दो,

मंत्र परम मानता इसे,

नित बीज प्यार के बोता ॥

* * * *

क्यों होता विनाश फिर ऐसा

सृजन - शक्ति- संघारी,

शूरों के इस रक्तपात पर

धरा न ऐसे रोती ॥ - रामोदय --पृष्ठ -37

लक्ष्मण से बातचीत के दौरान युद्ध की विनाशकारी शक्ति का वर्णन करतेहुए रावण कहता है ---

युद्ध चाहे धर्म हो या अधर्म

लेकिन है विनाश की पृष्ठभूमि सशक्त सौमित्र,

बचता नहीं कुछ भी शेष, उसकी छाया में विध्वंशमुखी

पाप और पुण्य हो जाते हैं एकधारास्निग्ध ॥ रामोदय पृष्ठ -53

भारत तथा पाकिस्तान के बीच युद्ध की आशंका ने कवि की चिंता बढ़ा दी। उसे लगा, यदि दोनों देशों ने फिर युद्ध किया तो जन एवं धन की अपूरणीय हानि होगी। काश ! ये आपस में न लड़ते ---

कोई इनकी भुजा पकड़ कर कह दे -

लड़ना ठीक नहीं,

अपने बच्चों को भी देख लेने दो

जवानी का महमहाया वसंत।

पंख फैलाकर उड़ लेने दो तितलियों को

खुले आसमान में,

कभी मत करो किसलय - कोपलों का

इस तरह चरचराया अन्त ॥ कुरसी - पृष्ठ -27

हमारे देश में विद्वेषकारी असमानता व्याप्त है। असमानता के कारण समाज की समरसता को बराबर ठेस पहुँचती है।कभी-कभी रक्त क्रांति की परिस्थिति भी उपस्थित हो जाती है। मिश्र जी ने सामाजिक एवं आर्थिक, सभी प्रकार की असमानताओं को अहितकर माना है और उन्हें दूर करने की वकालत की है।अपनी कविता 'तू और वह 'में वे मनुष्य से निवेदन करते हैं कि वह अपने भीतर बसे शिव को जगाए और उन लोगों को गले लगाकर अपना सच्चा प्यार दे,जो अपने पेट की आग बुझाने में भी असमर्थ है --

क्यों जगाता नहीं तू उसे, जागकर

जायेगा रे कहाँ सत्य से भाग कर !

देखता है नहीं क्यों उन्हें जो यहाँ

भर रहे पेट जूठन सड़ी माँग कर ॥

* * *

अश्रु-भीगी निगाहें बुलातीं तुझे

वेदना-मौन आहें बुलातीं तुझे।

जा गले से लगा, शुद्ध मन प्यार दे

मूर्तियाँ दीनता की बुलातीं तुझे ॥ -- मनीप्लांट और फूल - पृष्ठ -108

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में शस्त्र-संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी है। सभी देश अपने आप को हर प्रकार के विनाशक हथियारों से सम्पन्न करना चाहते है।ये बड़े-बड़े विध्वंसक हथियार युद्ध की प्रवृत्ति के लिए आग में पानी का नहीं, आग में घी का काम करने वाले हैं। मिश्र जी ने शान्ति एवं प्रगति के लिए शस्त्र संग्रह की प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध किया है।इसके लिए उन्होंने 'रामोदय 'में लंकावासियों द्वारा अस्त्र-शस्त्रों को नगर के बाहर एकत्र कर उनकी होली जलवाई है -- अच्छा है लेकर अस्त्र-शस्त्रअपने -अपने

रख दें लंका के बाहर शत-शत प्रणाम।

कपट-दक्ष आतंक -प्रेमियों से अशांत -

जो धरा, बने वह प्रेम -उज्ज्वला, शांति धाम ॥

* * * *

" जय राम भद्र "ने उधर गगन के छोर हुए

शस्त्रास्तों की ज्वाला का इधर विशाल रूप।

भयभीत तारकों की आँखें हो गयीं बंद

दीपित घर-आँगन, फैली ज्यों मध्यान्ह-धूप ॥ -रामोदय - 100 -101

इस प्रकार हम देखते हैं कि सुधाकर मिश्र ने अपनी कविताओं में युगीन संदर्भों को यथोचित स्थान देकर अपने युग-बोध-क्षमता का अच्छा परिचय दिया है। सामाजिक अथवा राजनीतिक घटनाएँ चाहे अपने देश में घटित हुई हो या विदेश में,यदि मानव जाति की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहीं तो मिश्र जी की निगाहों से ओझल नहीं हुई हैं।यही नहीं,जहाँ कहीं भी प्रगति की अथवा दुर्गति की, विकास की अथवा विनाश की प्रकट अथवा गुप्त चेतना दिखायी पड़ी है, उन्होंने उस पर अपनी काव्यात्मक प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त की है।चाहे यांत्रिकता हो या भौतिकता, चाहे अर्थवाद हो, या विस्तारवाद, मिश्र जी ने वर्तमान जीवन- संदर्भ में उनकी भी समीक्षा की है और उनकी अच्छाइयों तथा बुराइयों का निराकरण किया है।

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