सुब्रह्मण्य भारती की राष्ट्रीय चेतना-अशोक कुमार


(शोधार्थी) हिन्दी विभाग

राजस्थान केंद्रीय विश्व विद्यालय

बांदर सिंदरी, किशन गढ़, अजमेर

दूरभाष सं॰ 9462012207

सुब्रह्मण्य भारती तमिल भाषा के कवि थे। उनकी कविताओं में गांडीव की टंकार, पांचजन्य की ध्वनि, इन्द्र के वज्र-सी उद्घोषणा के समान स्वातंत्र्य की मांग है। जब हम स्वतन्त्रता आंदोलन और उसके पुरोधाओं की बात करते हैं तो नवजागरण-कालीन पृष्टभूमि दिमाग में उभर आती है। उस समय उत्तर से दक्षिण सभी जगह बोधिकता, मानवता, विज्ञान, राष्ट्र और स्वतन्त्रता के सवाल हर किसी के जहन में उठ रहे थे। नवजागरण के दौर में हर विचारक के मन में यही प्रश्न था कि अंग्रेजों द्वारा थोपी गयी झूठी श्रेष्ठता को कैसे ध्वस्त किया जाए, साथ ही भारतीय जनमानस में आत्मबल का संचार हो सके। साहित्यकारों के समक्ष यह यक्ष-प्रश्न था कि भारतीय पराजित मानसिकता के विपरीत आत्म स्वाभिमान और गौरव कैसे जगाया जाए?

प्रो॰ रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं कि “दो भिन्न सभ्यता, संस्कृतियों की टकराहट से एक प्रकार की रचनात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह रचनात्मक ऊर्जा ही नवजागरण के स्वरूप में थी”। हिन्दी में जो काम भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, निराला, और दिनकर ने किया वही काम तमिल में सुब्रह्मण्य भारती ने किया। सुब्रह्मण्य भारती का जन्म सितम्बर, 1882 में दक्षिण के तिरुनेलवेली के शिवपेरी नामक गाँव में हुआ। भारती के पिता चिन्नास्वामी एट्ट्यपुरम के महाराजा के यहाँ सभासद थे। इसी कारण भारती का संपर्क भी राजसभा से हुआ। उन्हें ‘भारती’ की उपाधि से भी वहीं विभूषित किया गया। इससे पूर्व सुब्रह्मण्य ‘सुब्बैया’ के नाम से पुकारे जाते थे। अपने पिता की आज्ञा से ही वे अँग्रेजी की उच्च शिक्षा में अध्ययन करने लगे। इसी से उन्होंने शेक्सपियर, शेली, बायरन और कीट्स आदि कवियों का गहराई से अध्ययन किया। शेली से प्रभावित होकर स्वयं का उपनाम ‘शेल्लीदासन’ रख लिया और इसी उपनाम से अंग्रेजी कवियों की कविताओं का सारांश पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाते रहे।

भारती जब तरुण अवस्था में थे तब अंग्रेज़ सरकार बंगाल के विभाजन पर आमादा थी। उसी समय भारती बंग-भंग के आन्दोलन से जुड़े। इसी बीच भारती राष्ट्रप्रेमी तिरुमलै अय्यंगार के संपर्क में आए। अय्यंगार के कहने पर ही उन्होंने ‘इंडिया’ पत्रिका का सम्पादन कार्य संभाला। ‘इंडिया’ पत्रिका के सम्पादन से ही वे राष्ट्र के स्वाधिनता आन्दोलन से जुड़े और सक्रिय भूमिका अदा की। सुब्रह्मण्य भारती के मानस निर्माण में इटली के स्वतन्त्रता और एकीकरण के उन्नायक मैजिनी, गैरिबाल्डी का संघर्ष भी बहुत प्रभावकारी रहा। मैजिनी की शपथ का इन्होंने तमिल में अनुवाद किया। गैरिबाल्डी जैसे देशभक्त और क्रांतिकारी की जीवनी ‘इंडिया’ पत्रिका में 1907-10 तक क्रमवार प्रकाशित कारवायी। इन तथ्यों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सुब्रह्मण्य भारती का झुकाव उग्र राष्ट्रवाद की ओर होने लगा। भारती ने गरमदल के नेता बिपिन चन्द्र पाल और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी को मद्रास आमंत्रित करके विशाल जन सभाएँ आयोजित करवायी। भारती राजनैतिक क्षेत्र में बलगंगाधर तिलक को अपना गुरु मानते थे। तिलक के भाषणों और आलेखों से प्रभावित होकर भारती ‘इंडिया’ पत्रिका में लिखते हैं- “ईश्वर पूजा की अपेक्षा, राष्ट्र की वर्तमान परिस्थितीयों में वीर पूजा (Hero Worship) ही अत्यावश्यक है। राम, अर्जुन, शिवाजी, राणा प्रताप आदि युद्धवीर तथा बुद्ध, शंकर, आदि ज्ञानियों को जन्म देने वाली यह विरप्रसूता भारत भूमि अब वीरता से शून्य हो गयी है.............. । वीरपूजा किसी भी देश के विकास के लिए अनिवार्य है”। इन सभी पुरोधाओं से ही ऊर्जस्वित भारती की लेखनी में एक धार दिखायी देती हैं। सुब्रह्मण्य भारती उस समय ‘वन्दे मातरम’ का जयनाद करते हैं जब यह बोलना तो क्या सोचना भी कठिन था। वे कहते हैं..............

‘वन्दे मातरम एनबोम’

अर्थात

‘हम वन्दे मातरम कहेंगे

बार-बार हाँ, बार-बार भारतभू की वंदना करेंगे’

भारती ने गुलाम भारत की जनता को अपनी वाणी दी, पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ी हुई भारतीय अस्मिता को जगाने का प्रयास किया। भारती की भविष्य दृष्टा सोच ने इसका अनुभव किया कि विदेशियों को पराजित करने के लिए पहले भारतवासियों का संयुक्त होना आवश्यक है तभी हम गोरे अँग्रेजों को यहाँ से खदेड़ पाएंगे। इसीलिए वे लिखते हैं..............

‘सहस्र जतियों का देश हमारा,

चाहेगा संबल न तुम्हारा।

माँ के एक गर्भ से जन्में,

रे विदेशियों ! भेद न हममें।

मनमुटाव से क्या होता है, हम भाई-भाई ही रहेंगे’।

भारती राष्ट्रीय एकता को सूत्र रूप में बताते हैं कि............

“वैर भाव है हममें जब तक

अध: पतन ही होगा तब तक

जीवन मधुमय बना रहेगा

यदि हममें संगठन रहेगा”।

भारती सम्पूर्ण भारत के इतिहास से भी परिचित थे। अत: वे अपने गौरवमय अतीत को स्मरण करते हुए तत्कालीन समाज में नवीन ऊर्जा ऊर्जा का संचार करते हैं................

हमारा नभचुंबी नगराज

विश्व में इतना ऊँचा कौन?

हमारी भागीरथी पवित्र,

नदी इतनी गौरवमय कौन?”

इन पंक्तियों को पढ़कर अनायास मैथिलीशरण गुप्त कि ‘भारत भारती’ कि उन पंक्तियों कि ओर ध्यान चला जाता है...........

“सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?

उसका कि जो ऋषि-भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष हैं”।

इसी प्रकार इतिहास के गौरव को पुनर्जीवित करने का काम जयशंकर प्रसाद ने भी अपने नाटकों में बड़े सशक्त रूप में किया। भारती मे यहाँ राष्ट्रीय चेतना स्वातंत्र्य के मूल्य से जुड़ी है। वे स्वातंत्र्य लो केवल राष्ट्रीय मुक्ति से नहीं वरन व्यक्ति कि सामाजिक जड़ता से मुक्ति के रूप में देखते हैं।

“स्वतन्त्रता स्वतन्त्रता स्वतन्त्रता

है स्वतन्त्रता भंगियों और चर्मकारों को

है स्वतन्त्रता आदिवासियों, बंजारों को”।

भारती की ये पंक्तियों उनके प्रगतिशील होने का दावा करती है। उनकी कविताओं में अभिव्यक्त समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता की भावना उनको अपने समय से बहुत आगे का कवि सिद्ध करती है। सुब्रह्मण्य भारती एक सच्चे नायक की रूप में स्वतंत्रता के पौधे को अपने लहू से सिंचने की बात करते है..............

“ नहीं नीर से पाला-पोसा

आँखों का जल देकर सींचा।

है सर्वेश देख यह पौधा, मन

पिघलेगा क्या?”

भारती इस स्वतंत्रता के प्रतीक चिह्न के रूप में ‘ध्वज’ की परिकल्पना भी करते है। इसमें उनकी सांप्रदायिक सदभाव और समन्वय चेतना भी देखने को मिलती है..............

“यहाँ इंद्र का वज्रायुध है,

यहाँ तुरक का अर्धचंद्र है-

वन्दे माँ, है मध्य अकथगति का अनुमान लगाओं

सब मिलकर विनय और श्रद्धा से शीश झुकाओ !”

सुब्रह्मण्य भारती स्वतन्त्रता के लिए लालायित हो उठते है। वे अपने समय से आगे बढ़कर स्वतंत्र भारत का स्वप्न भी बुनते है-

“नाचेंगे हम आनंदमगन हो नाचेंगे

आनंद स्वराज मिला हमको, हम नाचेंगे”।

जिस प्रकार ‘निज भाषा उन्नति अहे’ के सूत्र से भारतेन्दु को प्रसिद्धि और ख्याति मिली उसी प्रकार निज भाषा तमिल में रचना कर भारती को सम्पूर्ण भारत में सम्माननीय स्थान मिला। सुब्रह्मण्य भारती ने तमिल में उस स्वातंत्र्य चेतना को मुखर किया जिस की उस समय और समाज को नितांत आवश्यकता थी। वे मूलत: भारत की मुक्ति आन्दोलन के साथ जुड़े रहकर राष्ट्र मुक्ति और मानव जाती की मुक्ति हेतु अपनी कविताओं को सशक्त माध्यम बनानेवाले राष्ट्रकवि थे।

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