साहित्‍य और चरित्र का प्रश्‍न: शशांक शुक्ला

साहित्‍य और चरित्र का प्रश्‍न

शशांक शुक्ला

लेख

परम्‍परागत रूप से साहित्‍य में चरित्र का प्रश्‍न आलम्‍बन रूप में खोजा गया है । साहित्‍य चूँकि ‘भावयोग’ है अत: स्‍वाभाविक है कि भाव का ग्रहीता और आलम्‍बन चरित्र ही होंगे । चरित्र कभी प्रकृति के रूप में कभी पशु – पक्षी के रूप में तथा कभी मनुष्‍य के रूप में निर्मित होते रहे हैं ...... यानी मनुष्‍य का मस्तिष्‍क जिन – जिन वस्‍तुओं की कल्‍पना कर सकता है (मूर्त – अमूर्त), वह सब चरित्र बन सकते हैं । फिर प्रश्‍न यह है कि मूर्त – अमूर्त चरित्रों के चरित्रांकन में मूलभूत अंतर क्‍या है ? या साहित्‍य में इसका चित्रण कैसे किया जाता है ॽ या क्‍या मानवीय चरित्रों व प्राकृतिक चरित्रों की सृष्टि प्रक्रिया में भी अंतर है ॽ चरित्रों के विकास की दृष्टि से विचार करें तो पंचतंत्र , हितोपदेश, वृहत्‍तकथा में पशु – पक्षी ही केंद्रीय भूमिका में हैं .... मनुष्‍य के पास उस समय कहानी कहने के लिए ये उपयुक्‍त पात्र थे, क्‍योंकि उनका साबका इन्‍हीं से ज्‍यादा पड़ता था .... उसके पूर्व वेदों में सूर्य, चन्‍द्र, वरूण, अग्नि जैसे प्राकृतिक पात्र थे ... यह युग प्राकृतिक युग था, जब मनुष्‍य जंगल में रहा करता था और प्रकृति से सीधे प्रभावित हुआ करता था ... प्रकृति पेड़ – पौधे, ग्रह, वायु, अग्नि से आगे पशु – पक्षी यह मनुष्‍य के टकराहट का दूसरा युग है । जब चरित्र बनते है, तब मनुष्‍य सभ्‍यता के प्रसार में चल चुका होता है ... पशु – पक्षियों से लगाव व टकराहट के द्वन्‍द में भारतीय मनीषा पशुओं के प्रतीक ही चुनती है .... फिर चाहे वह पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियॉं हों या विष्‍णु अवतार (मत्‍स्‍य अवतार, कच्‍छप अवतार, वराह अवतार, नृसिंह अवतार ...... ) या ज्‍योतिष के राशि के प्रतीक (मेष, वृष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर, मीन ) ... या शंकुक का चित्रतुरग न्‍याय का न्‍यायवादी बिम्‍ब या भारतीय पौराणिक चरित्रों में देवताओं के वाहन को पशुरूप में देखने की कल्‍पना ... शिव – नंदी (बैल ), विष्‍णु- नाग, गणेश – मूषक, कार्तिकेय - मोर, यम – भैंसा, दुर्गा – शेर, विश्‍वकर्मा – हाथी, इन्‍द्र - हाथी , सूर्य – अश्‍व ... नाग – पृथ्‍वी ...... तो क्‍या इन मिथकीय चरित्रों / प्रतीकों को हम इस रूप में देखें कि उस समय तक मनुष्‍य पशु जगत के उपर अपना नियंत्रण स्‍थापित कर चुका था .... किसी की पीठ पर सवार होना मुहावरे का अर्थ यही तो है कि किसी पर प्रभुत्‍व स्‍थापित कर लेना .... तो ज्‍योतिष के 12 राशियों में से 7 जीव – जन्‍तुओं से जुड़ी राशि का आखिर क्‍या अर्थ है ॽ इस संदर्भ में थोड़े और गहरे अध्‍ययन की आवश्‍यकता है । साहित्‍य या मनुष्‍य अध्‍ययन के प्रतीक / चरित्रों में मनुष्‍य का आना मानव सभ्‍यता की तीसरी यात्रा थी, तीसरा पड़ाव था । भारतीय सौन्‍दर्यशास्‍त्र जिस चर्वणा, सहृदय, रस – निष्‍पत्ति के प्रतीक चुन रहा था, वह अपने मूल स्‍वरूप में भारतीय मनोवृत्तियों की तलाश ही कर रहा था .... कालिदास जिस सामंती उत्‍कर्ष काल (गुप्‍त काल ) में अपनी रचना लिख रहे होते हैं ... वह मानवीय सामर्थ्‍य के प्रतिष्‍ठा का भी युग था ..... अनायास नहीं कि रघु जैसे राजा बार बार इन्‍द्र , कुबेर जैसों को परास्‍त करते हैं .... यह युग मानवीय चरित्रों की प्रतिष्‍ठा की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण है .... रामायण का संघर्ष आर्य – अनार्य के नाम पर सांस्‍कृतिक संघर्ष है .... महाभारत में मानवीय सभ्‍यता और नाग सभ्‍यता, मानवीय सभ्‍यता और यक्ष सभ्‍यता, असुर सभ्‍यता का संघर्ष हमें बार – बार देखने को मिलता है और मानवीय सभ्‍यता की विजय बार बार दिखायी जाती है ... महाभारत के लेखन का अंतिम समय भी गुप्‍तकाल के आस – पास का है ... चरित्रों के बनने की प्रक्रिया में यह तीसरा युग ‘देवत्‍व का युग’ है । रामायण, महाभारत, और संस्‍कृति की क्‍लासिकल रचनाऍं देवत्‍व परिकल्‍पना से जुड़ी हुई हैं .... लेकिन अभी उनमें सजीवता की कमी है .... यह युग मनुष्‍य को भी देवत्‍व के रूप में देखने का युग है ....।

मानवीय चरित्रों के चरित्र बनने का चौथा युग उस समय प्रारम्‍भ हुआ, जब ईश्‍वर को मनुष्‍य रूप में देखने की दृष्टि का विकास हुआ ..... भक्तिकाल इस ढंग से ‘सांस्‍कृतिक पुनर्जागरण’ ठीक ही कहा गया है .... सामंती परिकल्‍पना ‘मनुष्‍य को ईश्‍वर रूप’ में दखने पर बल देती है .... किन्‍तु सामंतवाद की प्रतिक्रिया ‘ईश्‍वर को मनुष्‍य रूप’ में देखती है ... भक्तिकालीन अवधारणा को इसलिए भी ‘लोकवादी’ कहा गया है कि इसमें चरित्रों को लोक का स्‍वरूप प्रदान करने पर बल है, पात्रों का गठन बदल चुका है । पद्मावत, सूरसागर, मानस जैसे महाकाव्‍यों का गठन उसके चरित्रों के आधार पर फलीभूत होते हैा ... मानस का चरित्र चित्रण अपने आप में कई प्रकार की संरचना को समेटे हुए है ..... इसमें देवता, ईश्‍वर, मनुष्‍य , पशु – पक्षी, जनजातियॉ, जानवर तो है ही समाज के ऊॅच – नीच सभी प्रकार के चरित्रों को समेटा गया है .... कालिदास वगैरह में भी चरित्रों का विस्‍तार है, किन्‍तु तुलसी ने चरित्र – चित्रण में उसकी सामाजिक स्थिति का प्रयोग किया है .... सूर का चित्रण भी मनोवैज्ञानिक आधार पर विकसित हुआ है .... जायसी का नागमती – पद्मावती का चरित्र सैतिया डाह पर क्रमश: विकसित किया गया है .. लेकिन कुल मिलाकर भक्तिकाल तक ‘चरित्र’ पर सिद्धान्‍त हावी ही रहा है ....... ।

रीतिकाल में आकर राजा – रानी, दूत – दूती, सेवक – सेविका, प्रेमी – प्रेमीका के इर्द – गिर्द चरित्र सिमट गये हैं । रीतिकाल का चरित्र मनोविश्‍लेषण के आधार पर, रति के कोण पर‍ विकसित किया गया है ... अन्‍य रसों – भावों के लिये जगह कम है ... आश्रय – आलम्‍बन, संचारी भाव के काव्‍यशास्‍त्रीय प्रतिमान के आधार पर चरित्र गढ़े गये हैं । भक्तिकाल में चरित्र – चित्रण का विस्‍तार देखने को मिलता है – माता – पिता, भाई – बहन, प्रेमी – प्रेमीका, राजा – सेवक, गुरू – शिष्‍य, पिता – पुत्र , राजा – प्रजा इत्‍यादि सभी सम्‍बन्‍धों को समेटा गया है ... इस प्रकार भक्तिकाल में सम्‍बन्‍धों की विविधता तो है, किन्‍तु चरित्र टाईप भी हैं । रीतिकाल में चरित्र सीमित है, किन्‍तु मनोवैज्ञानिक अधिक है .. । आधुनिक काल के चरित्र – चित्रण के साथ यथार्थवाद का आग्रह साथ आया । यथार्थवाद , अतियथार्थवाद , प्राकृतवाद जैसे तत्‍व भी चरित्र – चित्रण से जुड़े ... यथार्थवाद का तात्‍पर्य था – चरित्रों को जीवन गति के विकास की द्वन्‍द्वात्‍मकता में रखकर देखना ... यानी टाईप चरित्र टूटे .... चरित्र प्र‍तीकात्‍मक भी बने और संकेतधर्मी भी .. भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्र ने भारत दुर्दशा, नाटक में प्रतीकात्‍मक चरित्रों की सृष्टि की है .... आलस्‍य, बिमारी जैसे पात्रों को उन्‍होंने पहली बार प्रयोग किया है .... इसी प्रकार अंधेर नगरी नाटक में ‘अंधेरनगरी ‘ अपने आप में भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था का प्रतीक। प्रेमचन्‍द के आगमन तक हिन्‍दी साहित्‍य के चरित्र टाईप ही रहे । नायक – धूर्त – नायिका – समाज – सुधार, सुखद अंत या ऐय्यारी उपन्‍यासों के अतिप्राकृत चरित्र यानी चरित्र स्‍वाभाविक ढंग से विकसित नहीं होते थे ... । प्रेमचन्‍द के चरित्र में, हिन्‍दी साहित्‍य में पहली बार यथार्थवाद उतरा । यह टाईप चरित्रों की विदाई का युग है .. प्रेमचन्‍द के । यहॉ आदर्श कम नही है लेकिन उनके चरित्र परिस्थितियों में निर्मित भी होते हैं और परिस्थितियों को विकसित भी करते हैं .... यथार्थवादी पात्र हिन्‍दी साहित्‍य को पहली बार मिले, प्रेमचन्‍द के ही युग में महादेवी वर्मा के संस्‍मरण अपनी पात्र योजना के कारण ही चर्चित रहे । पीडि़त – वंचित – असहाय पात्रों में महादेवी ने करूणा के तत्‍व खोजे हैं । यानी प्रेमचन्‍द का युग पात्रों की नई संभावना को लेकर आया । इस युग में गोबर – सूरदास जैसे प्रतिरोधी चरित्र भी हैं लेकिन वे इस की मुख्‍यधारा से नहीं जुड़ पाये हैं । प्रगतिवाद के बाद नई कहानी के दौर में सामाजिक जटिलता के बीच नये तरह के पात्र साहित्‍य को मिले । इस युग में खंडित, हारे - टूटे – बिखरे पात्रों को सहानुभूति दी गई । समाज, सामाजिक रूप से गतिशील हुआ । मध्‍य वर्ग की समस्‍याऍ केंद्र में आई । बौद्धिकता का प्रवेश हुआ । साहित्‍य के चरित्र भी बदले । यहॉ प्रतिरोध कम हैं, परिस्थिति का यथार्थ अधिक है । इस संदर्भ में एक बात स्‍पष्‍ट रूप से समझ लेनी चाहिये । व्‍यवस्‍था और सत्‍ता के दमनकारी स्‍वरूप में जुझारू व प्रतिरोधी पात्र ज्‍यादा सामने आते हैं, जबकि सभ्‍यता के ओढ़े हुए समाज में टूटते – बिखरते – घुटते पात्र ज्‍यादा अस्तित्‍व लेते हैं । यदि आज के समय में साहित्‍यकार किसी क्रान्तिकारी पात्र का निर्माण नहीं कर पा रहा है तो उसकी मजबूरी को भी समझा जा सकता है । यथार्थ के कोण जब ज्‍यादा हो जायें तब किसी चरित्र में उनको समेटना मुश्किल होता है । ऐसी स्थिति में कथ्‍य परिवेश या लम्‍बे आख्‍यान अर्थवत्‍ता सिद्ध करते ही हैं । जब हम चरित्र की बात करते हैं तब उसमें व्‍यक्ति / मानव जीवन के उर्ध्‍वगामी कर्म या क्रियाऍं ही आती हैं ..... किन्‍तु हम हमेशा यह सोचते हैं कि चरित्र में अच्‍छे – बुरे सभी चरित्र आते हैं ..... पात्र और चरित्र में अंतर है .... पात्र में सभी शामिल हैं, किन्‍तु चरित्र में सभी कैसे शामिल हो सकते हैं ? जब हम सामान्‍य बोलचाल की भाषा में कहते हैं – उसका कोई चरित्र नहीं है तो इसमें दो तथ्‍य छिपे हुए हैं – एक तो यह कि उसका व्‍यक्तित्‍व उर्ध्‍वगामी नहीं है और दूसरे उसके व्‍यक्तित्‍व में एकरूपता, स्थिरता, धैर्य इत्‍यादि गुण नहीं हैं .... इसीलिए पात्र और चरित्र के अंतर को समझना अनिवार्य है .... प्रारंभिक चरण में इस प्रकार का द्वैत नहीं हुआ करता था, किन्‍तु जब से नायक की समाप्ति हुई है, तब से कहा जाने लगा है कि चरित्र में किसी व्‍यक्ति के अच्‍छे – बुरे दोनों गुण आते हैं यानी गुण और दोष दोनों ... तो प्रश्‍न फिर यह है कि पूर्व की धारणा उचित थी या बाद की .... ॽ एक दूसरा प्रश्‍न यह भी कि ‘चरित्र का आदर्श’ जब समाज में जिन्‍दा था, तब तक तो व्‍यवहार भी कहीं – न कहीं नियंत्रित था, लेकिन सामाजिक स्‍वीकृति के उपरान्‍त व्‍यवहार कैसे सत्‍य को धारण कर सकेगा ? फिर ऐसे युग में क्‍या चरित्र और मूल्‍य का प्रश्‍न अप्रासंगिक हो गये हैं ? फिर अगर हम आधुनिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्‍तों को मानकर किसी चरित्र में गुण – दोष दोनों को स्‍वीकृति दे दें तो हमारे आदर्श नायक – नायिकाओं के संदर्भ में हमें नये सिरे से विचार करना पड़ेगा .... ।चरित्र के लिये मूल्‍य आलम्‍बन हैं या अगर आप चाहें तो इस प्रकार भी कह सकते हैं कि मूल्‍य को धारण करने के लिए चरित्र आलम्‍बन हैं ..... । जब हमारा समाज मूल्‍यों के भरोसे, चल रहा है .... तब फिर चरित्र की उपेक्षा कैसे की जा सकती है ॽचरित्र के संदर्भ में व्‍यक्तित्‍व का प्रश्‍न भी पश्चिमी समाज द्वारा उठाया गया प्रश्‍न है ॽ प्रामाणिक व्‍यक्तित्‍व का प्रश्‍न भी कई बार व कई कोणों से उठाया गया है .... चरित्र को पुष्‍ट, स्थिर करने के लिये उससे हम यह अपेक्षा करते हैं कि उसमें क्षमा, करूणा, प्रेम, वीरत्‍व, उत्‍साह जैसे मानवतावादी गुण होंगे और जिस चरित्र में ये गुण मिल जाते हैा उसे हम व्‍यक्तित्‍ववान कहते हैं, लेकिन पश्चिमी जगत में व्‍यक्तित्‍व का यह अर्थ प्रचलित नहीं है .... वहॉ व्‍यक्तित्‍व में सकारात्‍मक – नकारात्‍मक दोनों मनोवृत्तियॉ आती हैं ... इसीलिए चरित्रहीन कैरेक्टरनेस व्‍यक्तियों की संख्‍या वहॉ बढ़ी है और उसे सामाजिक / सैद्धान्तिक स्‍वीकृति भी मिली है .. । इसीलिए पश्चिमी जगत में विचारक, चिंतक, वैज्ञानिक होने के लिए चरित्रवान होना आवश्‍यक नहीं है ..... ‘व्‍यक्ति की भौतिक मानसिक योग्‍यता से उसकी आत्मिक (चरित्र + व्‍यक्तित्‍व) योग्‍यता का एक होना आवश्‍यक नहीं है ....। रचना – लेखन के संदर्भ में भी उनका यह तर्क कि रचना तो किसी खास क्षण में रचित होती है’... तो कोई भी किसी खास क्षण में रचना कर सकता है ... अगर इस तर्क को स्‍वीकार कर लिया जाये तो पप्‍पू यादव की तरह सारे अपराधी लेखक हो जायेंगे .... यही है अनुभूति की प्रमाणिकता इसीलिए तो नामवर जैसे लोग वहॉ पहुँच जाते हैं ... फिर रचना में बद्ध अनुभूति के स्‍वरूप का प्रश्‍न नये सिरे से उठाना स्‍वाभाविक हो जाता है । अब हम इस प्रश्‍न पर विचार कर सकते हैं कि रचना में लेखक चरित्र को कैसे गढ़ता है ॽ यानी चरित्र के बनने की प्रक्रिया क्‍या है ॽ चरित्र का यदि हम दूसरा अर्थ समझे तो यह कि – एक विशिष्‍ट बिम्‍ब एक विशिष्‍ट अनुभूति का वाहक ... तो रचना में इसी विशिष्‍ट बिम्‍ब, अनुभूति को सार्व‍जनिक रूप प्रदान किया जाता है ... सार्वजनिक रूप प्रदान करने की इस प्रक्रिया को समझना आवश्‍यक है ।

साहित्‍य का लेखक, समाज की बहुविध छवियों को अपने मस्तिष्‍क में, अवचेतन में, ग्रहण करता चलता है .. बहुविध छवियॉ, व्‍यक्ति, विचार को पहले वह समेटता है और उसे एक रूप देता है ... रूप देने की इस प्रक्रिया में कहीं विचारधारा प्रभावी होती है तो कहीं संवेदना या कहीं लोक परम्‍परा ..... इस प्रकार चरित्र गठन में कई चरित्रों की एका जुड़ी हुई होती है .... कोई भी चरित्र गठित हो, वह अपने आप में इकहरा नहीं होता ... अपने साथ सैकड़ों व्‍यक्तित्‍व – व्‍यक्ति यों के आधार पर निर्मित होता है ... इस प्रकार सैकड़ों पात्रों का प्रतिनिधि एक चरित्र बनता है, इसे ही ‘प्रतिनिधि चरित्र’ कहा गया है ..... और फिर वही प्रतिनिधि चरित्र सैकड़ों पात्रों में विभक्‍त हो जाता है .... इसी प्रकार एक विचारधारा को व्‍यक्‍त करने के लिए अनेक पात्रों की सृष्टि करनी पड़ती है .... राम राज्‍य की अवधारणा मानस की रचना कराती है ... या जमींदारी ब्राह्मणों की शोषण की एका प्रेमचन्‍द से गोदान की रचना करवाती है । अर्थ यह कि एक बिन्‍दु रचना को जन्‍म देता है । एक तथ्‍य की अभिव्‍यक्ति के लिए सैकड़ों पात्रों को इकट्ठा कर करना पड़ता है, ऐसा क्‍यों ॽ क्‍योंकि मनुष्‍य जीवन ..... अनुभूतियों का इतना विस्‍तार है कि उसे एक पात्र में हम समाहित ही नहीं कर सकते ... किसी राम, कृष्‍ण या बुद्ध को लेकर ही हम संपूर्ण ग्रन्‍थ नहीं रच पाते .. क्‍योंकि राम की सत्‍यता मर्यादा, रावण की सापेक्ष में विकसित होगी ... कृष्‍ण का दर्शन व कूटनीति दुर्योधन – शकुनि की सापेक्षता में तथा बुद्ध की करूणा, ब्राह्मण व्‍यवस्‍था की बलि प्रथा व कर्मकाण्‍ड की सापेक्षता में .... अत: साहित्‍य में समाज का प्रतिनिधि पात्र तो हो सकता हैं ... किन्‍तु ‘पूर्ण पात्र’ संभव नहीं .... पूर्ण पात्र अध्‍यात्‍म में संभव हैं, साहित्‍य में नहीं ... अध्‍यात्‍म व साहित्‍य में एक प्रमुख भेद है, इसीलिए तुलसी के राम, निराला के राम अलग – अलग हो जाते हैं ... धीरोदात्‍त, धीरोद्वत, धीरललित, सठ, कुलटा जैसे पात्र भी इकहरें नहीं हैं .... दरअसल हमारी सत् व असत्‍य प्रवृत्तियों के इतने कोण हैं कि किसी एक पात्र में उन्‍हें न तो विभक्‍त्‍ किया जा सकता है और न समेटा जा सकता है ... चरित्र – चित्रण की सैद्धान्तिकी स्‍पष्‍ट करते हुए कहा गया है कि लेखक ऐसे पात्रों का चित्रण करे, जो कथानक को आगे बढ़ाये ... इस सैद्धान्तिकी से चरित्रों के संबंध में इतना ही प्रकाश पड़ता है कि पात्रों का चित्रण क्रियाशील व समर्थ रूप में होने चाहिए यानी निरर्थक पात्रों का चित्रण नहीं होना चाहिए .. क्‍या निरर्थक पात्र भी होते हैं ॽ हर पात्र समाज की विविधता का संकेत होते हैं ... लेकिन एक ही तरह के पात्रों का चित्रण करने से लेखक को बचना चाहिए ....

चरित्र चित्रण की एक विशेषता यह भी होती है कि लेखक परस्‍पर विरोधी मनोवृत्तियों के पात्रों का चित्रण करें ... इस दृष्टि से नायक के सामने खल पात्र को रखने का प्रचलन साहित्‍य में प्रारम्‍भ हुआ ... जैसे – जैसे समाज में जटिलता बढ़ती गई, वैसे – वैसे एक ही पात्र में दोनों व्‍यक्तित्‍वों का संयोजन किया जाने लगा .... प्रारम्‍भ में कुछ एक पात्रों को ही रखा जाता था, किन्‍तु कालान्‍तर में इस प्रकार के कई पात्रों की योजना की जाने लगी .... परस्‍पर विरोधी पात्रों को एक – दूसरे की सापेक्षता में विकसित कर लेखक संघर्ष की योजना करता है और जीवन संघर्ष के बाह्य एवं आन्‍तरिक रूपों की योजना में चरित्र लेखक के आलम्‍बन बनते हैं ।

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