‘‘साहित्‍य में कल्‍पना और संवेदना के लिये जगह’’- अतुल्‍यकीर्ति व्‍यास (शोधार्थी)


साहित्‍य में कल्‍पना और संवेदना के लिये जगह! बड़ी ही आसान और उतनी ही विचारोत्तेजक बात है यह। शुरुआत करते हैं साहित्‍य से......

क्‍या है साहित्‍य?

क्‍या स्‍वरूप है साहित्‍य का?

क्‍या परिभाषा हो सकती है साहित्‍य की?

और भी कई सवाल किये जा सकते हैं साहित्‍य को लेकर... और कई जवाब भी पाए जा सकते हैं। ‘साहित्‍य‘, यह शब्‍द तक़रीबन सातवीं - आठवीं शताब्‍दी से चलन में आया है, इससे पहले साहित्‍य के लिये ‘काव्‍य‘ शब्‍द का प्रयोग होता था।

अग्‍निपुराण, 01. दंडी, 02. रुद्रट, 03. वामन, 04. आनन्‍दवर्द्धन, 05. मम्‍मट, 06. जयदेव, 07. विश्‍वनाथ, 08 और राजशेखर 09. की काव्‍य परिभाषाओं से गुज़रकर साहित्‍य के लक्षणों और विशेषताओं को समझने का अवसर साहित्‍य अध्‍यताओं को मिलता रहा है, और इनसे जो पहली बात समझ में आती है वह यह है कि साहित्‍य में शब्‍द और अर्थ, अर्थात्‌, भाषा की अनिवार्यता, दूसरी बात, गुण और अलंकार, अर्थात्‌ आकर्षण की उपस्‍थिति को साहित्‍य की विशेषताओं के रूप में स्‍वीकार किया गया है।

आचार्य विश्‍वनाथ एवं आचार्य जगन्‍नाथ साहित्‍य की विशेषताओं में क्रमशः रसात्‍मकता 10. और रमणीयता 11. को भी स्‍थान देते हैं। परंतु साहित्‍य की इन विशेषताओं का ज्ञान काव्‍य या साहित्‍य के आस्‍वादन के पश्‍चात्‌ ही संभव हो सकता है।

जहाँ तक साहित्‍य की पाश्‍चात्‍य परिभाषाओं की बात है तो अरस्‍तू, 12. सिडनी, 13. कॉलरिज, 14. शैली, 15. हडसन 16. आदि की परिभाषाएँ साहित्‍य की पहचान बताने के बदले रचनाकार, पाठक या काव्‍य एवं जीवन के संबंधों के बारे में ही बताती हैं।

ऐसे में आवश्‍यकता है कि पुनः साहित्‍य की भारतीय विशेषताओं यथा, भाषा की अनिवार्यता, आकर्षण, रसात्‍मकता एवं रमणीयता पर दृष्‍टिपात किया जाए। साहित्‍य की इन विशेषताओं के प्रकाश में जो परिभाषा प्रकट होती है उसे इस प्रकार अभिव्‍यक्त किया जा सकता है - ‘‘साहित्‍य भाषा के माध्‍यम से रचित वह सौन्‍दर्य या आकर्षण से युक्त रचना है जिसके अर्थबोध से सामान्‍य पाठक को आनन्‍द की अनुभूति होती है।‘‘

साहित्‍य की उक्त परिभाषा साहित्‍य के चरम उद्देश्‍य ‘‘आनंद की अनुभूति‘‘ की ओर भी इंगित कर रही है। जीवन में किसी भी क्रिया का कोई मूल उद्देश्‍य है तो वह आनंद प्राप्‍त करना ही है। ये अलग विषय है कि कभी वह प्राप्‍त होता है और कभी नहीं। साहित्‍य का चरम उद्देश्‍य भी यही है - ‘‘आनंद प्राप्‍त करना।‘‘

अब फिर से सवाल खड़ा होता है साहित्‍य से आनंद कैसे प्राप्‍त होता है। तो इसका जवाब हम इस प्रकार से पा सकते हैं कि आनंद पाने की प्रक्रिया मानवों में कुछ प्रकृति प्रदत्त गुणों पर आधारित है जिसका विवेचन प्राचीन साहित्‍य मनीषियों यथा, आचार्य भरत, भोजराज, अभिनवगुप्‍त, मम्‍मट, और आचार्य विश्‍वनाथ ने रस सिद्धान्‍त के रूप में किया है जिसकी परिणीति ‘‘साधारणीकरण‘‘ का घटित होना है। इसे समझने के लिये साहित्‍य के मूल तत्‍वों को एक नज़र से देखना होगा।

साहित्‍य के चार तत्‍व निर्धारित किये गये हैं - पहला तत्‍व भाव, दूसरा तत्‍व कल्‍पना, तीसरा बुद्धि और चौथा शैली। पहला तत्‍व ‘भाव‘ है जो सभी में, रचनाकार और पाठक, श्रोता व प्रेक्षक में, प्राकृतिक रूप से मौजूद होता है और स्‍थायी रूप से मौजूद होता है। और, यही साहित्‍य का आत्‍मतत्‍व है, और साहित्‍य का उद्देश्‍य सामाजिक के हृदय को भावनाओं से सराबोर कर देना ही है। इस उद्देश्‍य को पूरा करने के लिये भावों का चित्रण करना आवश्‍यक होता है।

साहित्‍य में भावों के चित्रण में जिस तत्‍व की भूमिका प्रमुख है वह है ‘कल्‍पना‘। साहित्‍यकार अपनी कल्‍पना शक्ति का प्रयोग कर सामान्‍य सी घटना को ऐसा स्‍वरूप दे देता है जो पाठक, या सामाजिक के मन को अपने आकर्षण में बाँध लेती है। यह कल्‍पनातत्‍व ही है जो साहित्‍य में सौन्‍दर्य और चमत्‍कार को जाग्रत कर देता है।

हर काल और हर भाषा का साहित्‍य कल्‍पना की अपूर्व क्षमता, अद्‌भुत वैभव तथा अलौकिक चमत्‍कार के आख्‍यानों से भरा हुआ है।

साहित्‍य का तीसरा तत्‍व है ‘बुद्धि‘, यह वो तत्‍व है जो कल्‍पना को तार्किकता प्रदान करता है इसके अभाव में साहित्‍य मात्र प्रलाप के और कुछ नहीं रह पाएगा। ‘बुद्धि‘, ‘कल्‍पना‘ को सन्‍तुलन और तर्क देती है और इस कारण से भावों का ग्रहण सहज हो जाता है। लेकिन, साहित्‍य में बुद्धि तत्‍व का आधिक्‍य भी ख़तरनाक होता है। इसके आधिक्‍य की बढ़ती मात्रा के साथ - साथ साहित्‍य में भावशून्‍यता की मात्रा बढ़ने लगती है और उसकी सरसता का क्षरण होने से वह मात्र उपदेशक बन कर रह जाता है।

चौथा तत्‍व है ‘शैली‘, इसे साहित्‍य का कलेवर कहा जा सकता है। भाषा, शब्‍द, अलंकार और छंद के उचित प्रयोग से साहित्‍य की शैली निर्धारित होती है। यह काम पहले तीन तत्‍व ‘भाव‘, ‘कल्‍पना‘ और ‘बुद्धि‘ के माध्‍यम से, किया जाता है, परन्‍तु, ये तीनों तत्‍व तब तक सक्रिय नहीं हो सकते जब तक उन्‍हें ‘‘संवेदना‘‘ का साथ न मिले।

भावों को अभिव्‍यक्ति चाहिये, यह भावों का स्‍वाभाविक गुण है परन्‍तु, वे स्‍वतः यह कार्य नहीं कर सकते हैं। रचनाकार या सामाजिक, दोनों के मन में उनका जागरण आवश्‍यक है ... और इस महती कार्य में जिस तत्‍व की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है वह है - ‘‘संवेदना‘‘। इसके अभाव में भाव जागेंगे ही नहीं, और जब भावों का जागरण ही नहीं होगा तो कैसा भावनिरुपण? कैसी अभिव्‍यक्ति? कैसा साधारणीकरण? और कैसा रस? ... कुछ भी नहीं...। ऐसे में, साहित्‍य में ‘संवेदना‘ का स्‍थान, भावों को जगाने की उत्‍प्रेरक शक्ति के रूप में स्‍वीकार किया जाना चाहिये। जो कि भावों से पहले आता है।

साधारणतः ‘संवेदन’ या ‘संवेदना’ का शाब्‍दिक अर्थ होता है - सुख और दुःख का ज्ञान होना, बोध होना, अनुभूति होना अथवा प्रतीति होना। लेकिन, यदि गहराई में देखें तो ज्ञात होता है कि भाव, भाषा और प्रेरणा, ‘संवेदना‘ को प्रत्‍येक काल में अर्थवत्ता प्रदान करते आए हैं। इस संदर्भ में संवेदना का तात्‍पर्य अनुभूति व अभिव्‍यक्ति करने, सहानुभूति रखने, द्रवित व सहृदय होने के साथ, इंद्रियानुभव को प्राप्‍त करने से होता है। हिन्‍दी संस्‍कृत कोश में संवेदना के लिये कहा गया है - ‘‘संवेदनम्‌, अनुभवः सुख-दुःखादि प्रतीति।’’ 17.

इसी आधार पर कहा जा सकता है कि संवेदनशील व्‍यक्ति, किसी दूसरे व्‍यक्ति के सुख-दुःख को समझ, उससे अपना तादात्‍म्‍य स्‍थापित कर लेता है। प्रदत्त विषय में ‘कल्‍पना‘ का स्‍थान पहला दिया गया है और ‘संवेदना‘ को दूसरा, लेकिन, साहित्‍य सृजन के संदर्भ में ‘संवेदना‘ का स्‍थान पहला ही होना चाहिये। यह संवेदना ही है जो रचनाकार या सामाजिक, किसी के भी मन में, प्राकृतिक रूप से स्‍थित स्‍थायी भावों का, जागरण, परिस्‍थितियों के अनुरूप करती है।

‘‘वियोगी होगा पहला कवि।‘‘ 18. कहकर सुमित्रानंदन पन्‍त रचनाकार की संवेदना के स्‍तर की तरफ़ ही तो इशारा कर रहे हैं साथ ही ‘पहला‘ शब्‍द कह कर वे काव्‍य-सृजन में ‘संवेदना‘ का स्‍थान भी पहला ही निर्धारित कर रहे हैं। वह ‘संवेदना‘ ही तो है जो ‘क्रौंचवध‘ 19. की घटना से वाल्‍मीकि के हृदय में भावनाओं का ज्‍वार जगा देती है।

साहित्‍य सृजन के साथ सामाजिक द्वारा आनन्‍द प्राप्‍ति के लिये भी इस ‘संवेदना‘ की उपस्‍थिति अत्‍यन्‍त अनिवार्य है। वह ‘संवेदना‘ की सघनता ही है जो किसी दर्शक को सिनेमा के दृश्‍यों पर आँसू बहाने या खिलखिलाने के के लिये विवश कर देती है। यह वही तो है जो ‘साधारणीकरण‘ की घटना की प्रमुख ज़िम्‍मेदार है। ‘संवेदना‘ का स्‍तर जितना सघन होगा ‘साधारणीकरण‘ भी उतना ही सघन होगा और उससे प्राप्‍त आनंद की अनुभूति भी उतनी ही गहन होगी। यह ‘संवेदना‘ ही है जो साहित्‍य के द्वारा अभिव्‍यक्त भावों को सामाजिक के हृदय में जगाती है। यह वही तो है जो किसी के हृदय में भावों की उपस्‍थिति को प्रमाणिकता प्रदान करती है।

‘‘अंग्रेज़ी में संवेदन के निकट का शब्‍द है ‘सेंसेशन’ ¼Sensation½] ‘फ़ीलिंग’ ¼Feeling½ और ‘सेंसिटिव’ ¼Sensitive½A अंग्रेजी के पर्याय के अनुसार संवेदना शब्‍द के अन्‍तर्गत इन्‍द्रियानुभव, भावानुभव, सहानुभूति, अनुभव प्राप्‍ति की प्रक्रिया आदि का समाहार हो जाता है।’’ 20.

जब भावों का जागरण हो जाता है तब आती है भूमिका ‘‘कल्‍पना‘‘ की। कल्‍पना ही वह तत्‍व है जो भावों का स्‍वरूप निरुपण इस प्रकार करती है कि वह सामाजिक को तत्‍काल आकर्षित कर सके। इसी आकर्षण के माध्‍यम से सामाजिक साहित्‍य की ओर उन्‍मुख होता है और उसका आस्‍वादन कर आनन्‍द से भर जाता है। यहाँ आचार्य जगन्‍नाथ का कथन अपना महत्‍व प्रमाणित करता है - ‘‘रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्‍दः काव्‍यम्‌।‘‘ 21.

कल्‍पना वह मानसिक शक्ति है जो व्‍यक्ति के पूर्व अनुभवों के आधार पर, अप्रत्‍यक्ष, सूक्ष्‍म एवं नूतन वस्‍तुओं, या विचारों का आविष्‍कार, निर्माण, या पुर्ननिर्माण करती है। वह ‘बुद्धि‘ का अंकुश बहुत कम स्‍वीकार करती है और उसे (बुद्धि को) अपने पीछे लेकर चलना उसकी प्रवृत्ति है। इस अर्थ में वह स्‍वच्‍छन्‍द हो जाती है, लेकिन जब वह (कल्‍पना) भावानुभूतियों (संवेदना) की प्रेरणा से, ‘बुद्धि‘ के द्वारा नियंत्रित होकर, भाषा के माध्‍यम से काम करती है तो श्रेष्‍ठ साहित्‍य का सृजन होता है। इसका तात्‍पर्य यह नहीं कि कल्‍पना शक्ति का महत्‍व कम करके आँका जाए।

कल्‍पना में सम्‍पूर्ण कविकौशल समाहित है, जहाँ वह भावों को अभिव्‍यक्ति के साधन यथा - भाषा, शब्‍द, अलंकार, छंद आदि तो उपलब्‍ध कराती ही है, साथ ही, इन साधनों के प्रयोग से वह भावों को आकर्षण भी प्रदान करती है। वह कल्‍पनाशक्ति ही है जो पदार्थ के भीतर पैठकर उसके शाश्‍वत्‌ सारतत्‍व को पकड़कर, उसका उद्‌घाटन करती है।‘‘ 22.

पाश्‍चात्‍य काव्‍यशास्‍त्र साहित्‍य पर प्रमुख रूप से भावों की अभिव्‍यक्ति के संदर्भ में विचार करता है, जबकि, भारतीय काव्‍यशास्‍त्र, साहित्‍य के अनुशीलन से प्राप्‍त, सामाजिक के विलक्षण अनुभव को आधार बनाता है। एक ओर जहाँ पहली दृष्‍टि मुख्‍यतः साहित्‍यकार की अभिव्‍यक्ति रही है तो दूसरी ओर वह सामाजिक के रसास्‍वादन पर टिकी है।

अब यहाँ भूमिका आती है ‘बुद्धि‘ की। ‘बुद्धि‘, ‘कल्‍पना‘ पर अपना इतना नियंत्रण बनाये रखती है ताकि वह (कल्‍पना) अपने निरुपण से, भावों के स्‍वाभाविक सौन्‍दर्य को ही आच्‍छादित ना कर ले। इस अर्थ में ‘बुद्धि‘ ‘कल्‍पना‘ के लिये नियंत्रक का काम करती है।

इस अर्थ में साहित्‍य में ‘संवेदना‘ अपना स्‍थान भावों से पहले रखती है और उन्‍हें जगाकर वह ‘कल्‍पना‘ के साथ हो जाती है। अतः ‘कल्‍पना‘ का स्‍थान, दूसरा आता है, जो संवेदना की सान्‍द्रता के अनुपात से भावों का रूप निरुपण करती है। इस व्‍यापार में ‘बुद्धि‘ भी रहती है और ‘कल्‍पना‘ को अतार्किक होने, व भावों से आगे जाने से रोकती है। इस प्रकार साहित्‍य में ‘‘कल्‍पना‘‘ की भूमिका भावों के बाद, दूसरे स्‍थान पर आती है।

‘बुद्धि‘ को तीसरा स्‍थान दिया जाता है, जो भावनिरुपण को तार्किकता देने के साथ, उन्‍हें उनकी सघनतम्‌ प्रस्‍तुतीकरण के लिये तैयार करती है। इस प्रकार संवेदना से जाग्रत ‘भाव‘, ‘कल्‍पना‘ और ‘बुद्धि‘ द्वारा आकार ग्रहण कर साहित्‍य की ‘शैली‘ के रूप में प्रकट होते हैं। ‘शैली‘ इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम है। अतः ‘शैली‘ को साहित्‍य का चौथा तत्‍व कहा गया है।

इस पूरे व्‍यापार में ‘संवेदना‘ एक मात्र ऐसा तत्त्व है जो अनिवार्यतः पूरे समय, पूरी प्रकिया में अपनी सान्‍द्रता के साथ उपस्‍थित रहता है। यह न केवल साहित्‍य सृजन की प्रक्रिया का हिस्‍सा रहता है अपितु, सामाजिक के भीतर, साहित्‍य के प्रति आकर्षण जगाने से लेकर ‘साधारणीकरण‘ 23. की घटना के परिणामस्‍वरूप निष्‍पन्‍न होनेवाले ‘रस‘ और उससे प्राप्‍त चरम आनंद तक जाता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि साहित्‍य में ‘संवेदना‘ की जगह भाव जाग्रति करनेवाले ‘उत्‍प्रेरक‘ की है तो ‘कल्‍पना‘ की जगह भावों को आकार देनेवाले ‘शिल्‍पी‘ की है। साहित्‍य में ‘संवेदना‘ का स्‍थान प्रथम ही प्रमाणित होता है, जो सम्‍पूर्ण साहित्‍य सृजन की प्रक्रिया के दौरान सक्रिय भी रहता है।

साहित्‍य सृजन में ‘कल्‍पना‘ की भूमिका उसके रूप निर्धारण एवं ‘बुद्धि‘ के सहयोग से उसे रुपायित करने तक की होती है। ‘कल्‍पना‘ और ‘संवेदना‘, दोनों साहित्‍य सृजन की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती हैं। पहला और दूसरा स्‍थान देकर किसी एक के महत्त्व को बड़ा करना उचित नहीं जान पड़ता है। दोनों का अपना - अपना स्‍थान है, अपनी - अपनी भूमिका है। दोनों अपनी भूमिकाओं का निर्वहन संतुलित रूप से कर सकें, यही साहित्‍यकार का ध्‍येय होना चाहिये। इसी से समाज के समक्ष एक श्रेष्‍ठ साहित्‍य का प्रकटीकरण होता है। अस्‍तु।

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संदर्भ -

01. ‘‘संक्षेपाद्वाक्‍यमिष्‍टार्थव्‍यवच्‍छिन्‍ना पदावली काव्‍यम्‌, स्‍फुटदलंकारं गुणद्दोषपवर्जितम्‌।‘‘/ अग्‍निपुराण/ अध्‍याय 336/ 006 - 007.

02. ‘‘शरीरं तावदिष्‍टार्थव्‍यवच्‍छिन्‍ना पदावली।‘‘ दंडी/ काव्‍यादर्श/ 01 - 10.

03. ‘‘ननु शब्‍दार्थो काव्‍यम्‌।‘‘/ रुद्रट/ काव्‍यालंकार/2 - 1.

04. ‘‘काव्‍य शब्‍दोयं गुणलंकार संस्‍कृतयोः शब्‍दार्थयोवर्तते।‘‘ वामन/ काव्‍यलंकारवृत्तिसूत्र/ 1 - 1 - 1.

05. ‘‘शब्‍दार्थशरीरम्‌ तावत्‌ काव्‍यम्‌।‘‘/ आनन्‍दवर्द्धन/ ध्‍वन्‍यालोक/ प्रथम कारिका।

06. ‘‘तद्‌दोषौ शब्‍दार्थो सगुणावनलंकृती पुनः क्‍वापि।‘‘ मम्‍मट/ काव्‍यप्रकाश/ कारिका तीन।

07. ‘‘निर्दोषा लक्षणवती सरीतिर्गुणभूषणा, सालंकाररसानेकवृत्तिर्वाक्‍काव्‍यनामभाक्‌।‘‘/ जयदेव/ चन्‍द्रालोक/ 1 - 7.

08. ‘‘वाक्‍यम्‌ रसात्‍मकं काव्‍यं।‘‘ आचार्य विश्‍वनाथ/ साहित्‍यदर्पण/

09. ‘‘गुणवदलंकृतंच काव्‍यम्‌‘।‘‘/ काव्‍यमीमाँसा - छठा अध्‍याय.

10. ‘‘वाक्‍यं रसात्‍मकं काव्‍यं।‘‘/ आचार्य विश्‍वनाथ/ साहित्‍यदर्पण।

11. ‘‘रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्‍दः काव्‍यम्‌।‘‘ आचार्य जगन्‍नाथ/ रसगंगाधर/ प्रथम आनन.

12. ‘‘शब्‍दों के माध्‍यम से प्रस्‍तुत अनुकृति काव्‍य या साहित्‍य है।‘‘ साहित्‍यिक निबंध/ डॉ. गणपतिचन्‍द्र गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 05.

13. ‘‘काव्‍य रचना वह प्रकार है जिसका तात्‍कालिक लक्ष्‍य शिक्षा और आनंद प्रदान करना है।‘‘ साहित्‍यिक निबंध/ डॉ. गणपतिचन्‍द्र गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 05.

14 ‘‘काव्‍य या साहित्‍य वह अनुकरणात्‍मक कला है जिसका लक्ष्‍य आनंद प्रदान करना है।‘‘

14. ‘‘काव्‍य या साहित्‍य वह अनुकरणात्‍मक कला है जिसका लक्ष्‍य आनंद प्रदान करना है।‘‘ साहित्‍यिक निबंध/ डॉ. गणपतिचन्‍द्र गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 05.

15. ‘‘काव्‍य सर्वाधिक सुखी एवं श्रेष्‍ठतम हृदयों का श्रेष्‍ठतम क्षणों का लेखा जोखा है।‘‘ साहित्‍यिक निबंध/ डॉ. गणपतिचन्‍द्र गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 05.

16. ‘‘भाषा के माध्‍यम से जीवन की अभिव्‍यक्ति काव्‍य है।‘‘ साहित्‍यिक निबंध/ डॉ. गणपतिचन्‍द्र गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 05.

17. हिन्‍दी सँस्‍कृत कोश/ डॉ. रामस्‍वरूप ‘रसिकेश’/ पृष्‍ठ 5-61.

18. ‘‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। उमड़कर आँखों से चुपचाप, बही

होगी कविता अनजान॥’’ काव्‍य-संग्रह ‘पल्‍लव’ की ‘आँसू’ रचना से/ सुमित्रमनन्‍दन पंत।

19. ‘‘मा निषाद प्रतिष्‍ठां त्‍वमगमः शाश्‍वतीः समाः। यत्‍क्रौंचमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्‌।‘‘ वाल्‍मीकि रामायण/ बालकाण्‍ड/ 2 - 15.

20. अग्‍निसागर : संवेदना पक्ष/ डॉ. विरेन्‍द्र भारद्वाज/ पृष्‍ठ-41.

21. ‘‘रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्‍दः काव्‍यम्‌।‘‘ आचार्य जगन्‍नाथ/ रसगंगाधर/ प्रथम आनन।

22. साहित्‍य में कल्‍पना तत्‍व/ डॉ. शान्‍तिस्‍वरूप गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 61.

23. ‘‘वस्‍तुतः वस्‍तु का देश - काल की सीमाओं से मुक्त हो जाना ही साधारणीकरण है।‘‘ साहित्‍यिक निबंध/ डॉ. गणपतिचन्‍द्र गुप्‍त/ पृष्‍ठ - 30.

प्रस्‍तुतकर्ता :

अतुल्‍यकीर्ति व्‍यास (शोधार्थी) सम्‍पर्क : 09, सूर्यमार्ग, जगदीश चौक उदयपुर (राजस्‍थान),

पिन - 313001.फ़ोन - (0294) 2528163.मोबाइल - 0964969 4025.

E-mail : atulyakirti@gmail.com

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