“हरियाणा के खाप पंचायत का सामाजिक अध्ययन”विवेक पाठक


पी-एच.डी अहिंसा और शांति अध्ययन

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ,वर्धा

हरियाणा वैदिक युग से ही गौरवपूर्ण स्थान रखता है| यह पर भरत वंश के शासकों का स्थान रहा है| राज्य के पूर्व में उत्तर प्रदेश, उत्तर में हिमाचल स्थान, उत्तर-पचिम में पंजाब, तथा दक्षिण –पश्चिम में राजस्थान हैं| मिथकों के अनुसार देखा जाये तो हरियाणा का वैदिक नाम हरयाणा है| जब ब्रह्मा जी नें वेद के आधार पर गुण ,कर्म स्वभावानुसार सभी अधिस्थानों के नाम रखा तो उसी समय हरयाणा प्रांत का नाम वेद के अनुसार रखा गया|आगे चलकर यही हरयाणा हरियाणा बना तथा पंजाब राज्य का एक प्रांत बना| बाद में 1 नवंबर 1966 को आधुनिक हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया|

लेकिन पिछले कुछ समय से कुछ्क घटनाओ को लेकर के देश के इस विशाल ग्रामीण भु-भाग पर आदिकाल से चली आ रही सामाजिक रिश्तों की खाप व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाने का सिलसिला तेज़ी पर है|

हम सभी जानते है की पंचायाते समाज के विकास के शुरू से ही किसी न किसी रूप में चली आ रही है| पंचायाते आर्य क़बीलों पर आधारित समाजों की विशिष्ट पहचान प्रतीत होती है| यदि हम थोड़ा पीछे मुड़ कर देखे तो ज्ञात होता है की समाज पहले आदिम युग था| वनों पर ही हमारे पूर्वजो का जीवन निर्भर था| वेद सहिता में नारी का एक अर्थ क्षेत्र यानि खेत बार-बार आया है, इस क्षेत्र के पालन और रक्षण कबीले के लोगों का सामुहिक दायित्व बनता था|

इसी को वर्तमान में ग्रामीण स्तर पर हो रहे विवादो के निपटारे से जोड़ कर देखे तो ग्राम पंचयाते कारगर मानी जाती थी| यदि कोई मुद्दा दो या दो से अधिक गावों में उलक्ष जाता था और उस पर विचार-विमर्श करके निर्णय लेना होता था तो उस अवस्था में यही ग्राम पंचयाते ही कारगर होती थी| जब यही ग्राम पंचयाते जब एक दूसरे के सुख-दुख में साथ देने लगती है और सामाजिक नियंत्रण के उदेश्य के लिए एक दूसरे का साथ आती तब इन गावों को मिलाकर के एक नया समुदाय जन्म लेता है जिसे जाटू भाषा में गवाहड़ कहा जाता है| इसी को प्रचलित भाषा में गवाहड़ पंचायत कहा जाता है| यही समुह क्षत्रप खाप कहलाया|

इसका तात्पर्य यह है की खाप पंचायतों का इतिहास और ढ़ाचा लगभग 1350 साल से भी पुराना है खाप या सर्व खाप एक सामाजिक प्रशासन का एक भाग है| जो भारत के उत्तर-पश्चिम प्रदेशों यथा राजस्थान, हरियाणा पंजाब और उत्तर प्रदेश में अति प्राचीन काल से ही प्रचलित है| यदि हम प्राचीन इतिहास में ही देखे तो पता चलता है की पाल, गण,गण संघ, सभा, सीमिति, जनपद या गणतन्त्र खाप केप्रचलित नाम थे|वर्तमान समय में गण और गण संघ को खाप और सर्व खाप के नाम से जाना जाता था|

खाप मुलत:दो शब्दों से मिलकर बना है| जो ख + आप है| जिसमे ख का अर्थ हैं, आकाश और आप का अर्थ है, जल यानि पवित्र एवं शांति दायक प्रदार्थ| अर्थात जो सब जगह आकाश की भाति व्यापक हो और जल की भाति निर्मल और शांतिमय हों

इसी तरह सर्व खाप का अर्थ व्यापक अर्थात सभी खापों का मिलाप| ये खापे भारत के उत्तर में सिंध ,पश्चिम में गुजरात , दक्षिण वर्तमान मध्यप्रदेश का मध्यभाग ,पुर्व में बिहार के पश्चिमबिहार तक विद्यमान थी|

इसी विस्तृत क्षेत्र को खाप नाम दिया जाता है,आज जाटों की करीब 3500 खाप अस्तित्व में है| पाल या खाप का क्षेत्र निश्चित होता है| हर खाप के गाव निश्चित होते है| जैसे बड़वासनी बारह के 12 गाँव, कराला के 17 गाँव, चौहान खाप के 5 गाँव, तोमर खाप के 84 गाँव, दहिया चालीसा के 40 गाँव, पालम खाप के 84 गाँव, मीतरोल खापप के 24 गाँव आदि है|

जिसमे सर्व खाप में 22 गाँव है| यह फ़रीदाबाद ,बल्लभगण ,से लेकर के मथुरा जिले के छाता,कोसी तक फैला एक विशाल संगठन है| इसमें करीब 1000 गाँव है| इस खाप में कोसी की ड़ीड़े पाल,कामर की बेनीवाल पाल,होंड़ल की सोंरोत पाल,पैगाँव की रावत पाल आदि शामिल है| यह पाल दहेज निवारण में सबसे आगे है सर्व-गोत्रीय जाट का मुख्यालय आगरा जनपद के बिचपुरी गाव में है| इस तरह ज्ञात होता है की खाप का एक स्वरूप सामाजिक प्रशासन के रूप सामाजिक न्याय व्यवस्था को बनाए रखना|

इसी तरह खाप पंचायतों का दूसरा स्वरूप गोत्र के आधार पर गठित पंचायतों का भी अपना विशेष महत्व रहा है| जैसे दहिया,अहलावत,मालिक उर्फ़ गठ वाला,दलाल,सांगवान,हुंडा,नैन,लाठर,छिल्ला-छिकारा,रुहिल-राठीआदि गोत्र केनामों पर खापे बनी हुई है|इस प्रकार के गोत्र पंचायतों मेंज़्यादातर मसले विवाह विवाद के समाधान के लिए आते रहे है|

अब प्रश्न यह है की खाप शब्द आया कहा से ? यह तो ठीक है की खाप शब्द असल में गग्णात्मक ढंग से क्षेत्र की प्रशासनिक प्रणाली के लिए ही प्रयोग हुआ है| परंतु इस शब्द का प्रयोग वेद , उपनिषद , महाभारत , संस्कृत के नाटको ,पाली , प्राकृति ग्रंथो में नहीं हुआ है|“विष्णुधर्मोतर”, जो 4-5 वी सदी का ग्रंथ है उसमें भी खाप शब्द नहीं है| यहा तक की खाप शब्द केवल राजस्थान ,सिंध ,पाकिस्तान व उत्तर भारत ,पश्चिम भारत ,हरियाणा के मेवात क्षेत्र तक ही सीमित है| इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि सन 518 ईस्वी पूर्व पर्शियन सम्राट दारा ने मौजूदा पाकिस्तान के उत्तरी भाग तक कब्जा किया पर्शियन अपने प्रांतों को क्षत्रप कहते थे| इसी प्रांत के गवर्नर को क्षत्रपावान कहा जाता था|

क्षत्रप इसका भारतीय नाम था| कहा जाता है की खाप शब्द का इस्तेमाल अकबर ने ही किया था| यह एक फारसी शब्द है| इसका कारण यह था की अकबर का जन्म तो अमरकोट में हुआ था पर उसके अब्बाजान हमेशा ईरान जाते रहते थे| अकबर का बचपन ईरानी तहबीज़ में बीता| इसका दूसरा कारण यह था की मुगलों के अलावा तुर्को को फारसी भाषा से लगाव नहीं था| जबकि मुग़लो की भाषा फारसी थी|

यही कारण है की बिलोचिस्तान ,राजस्थान, सिंध ,पंजाब ,पाकिस्तान यानि जहा –जहा मुग़लो का कब्जा था| वहा पर गण और संघ के स्थान पर खाप शब्द का प्रयोग होने लगा|इस तरह से खाप पंचायते महाभारत काल से लेकर के रामायण काल और मौर्य काल में न्याय व्यवस्था में अपनी सहभागिता का निर्वाह करते हुये,हर्षवर्धन के शासन का सफर करते हुये,मुग़ल शासन से होते हुए अब इकिस्वी सदी (कलयुग) के समाज में अपने वजूद के साथ कायम है|

खापों के इतने समय तक वजूद में कायम रहने का एक मात्र कारण है,उनकी कार्य प्रणाली|खाप पंचायत जैसी संस्था लोकतान्त्रिक आधार पर गठित की जाती है जिस पर उनकी कार्य प्रणाली टिकी हुई है| खापों के जरिये विवाद को बिना किसी कोर्ट –कचहरी के भाई-चारे से निपटाया जाता है| इन निर्णयो को पंच-परमेश्वर का निर्णय माना जाता है| इस लोकतान्त्रिक परंपरा में किसी कों भी अपनी बात कहने या सुझाव देने की पुरी छूट है, पर यह भी महत्वपूर्ण है, की खाप पंचायतों का कोई कार्य लिखित नहीं होती थी| इनके ये मौखिक निर्णय सर्वमान्य कानून की तरह होते थे| इसको लागू करने के लिए केवल सामाजिक स्वीकृति ही एक मात्र साधन था|खाप पंचायतों का आहवान करने और लोगों कों एकत्रित करने की एक विशेष प्रक्रिया थी| खाप पंचयत के मुखिया के पास जानकारी या शिकायत दायर की जाती थी| मुखिया प्रभावशाली व्यक्तियों की सलाह ले कर के योग्य पंचों का चयन करता था|

प्रायः विवादग्रस्त जाति वर्ग व समूह के प्रभावशाली चौधरियों या उनके प्रतिनिधियों कों बतौर पंचायती सदस्य के रूप में शामिल किया जाता था| तब जा करके खाप की पंचायत बुलाई जाती थी|ये सभी खाप पंचायते कार्य शुरू करने से पहले खाप की कार्यवाही के लिए एक प्रभावशाली प्रधान का चुनाव भी मौके पर करती थी पंच परस्पर सलाह करके मौके पर ही निर्णय करती थी| यह परंपरा आज भी प्रचलित है|

यदि खापों का सामाजिक अध्ययन करे तो ज्ञात होता है की इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए खाप पंचयाते न्याय व्यवस्था कों बनाए रखने , अपने परिवार की रक्षा करना, दहेज़ प्रथा कों समाप्त करना , भूर्ण हत्या का विरोध करना शामिल है|

हरियाणा के जीद जिले के बीबीपुर गाँव में महिलाओ की पहली बार खाप पंचायत हुई| जिसमे यह निर्णय लिया गया की जो लोग कोख में बेटी का कत्ल कर देते थे,उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज़ होना चाहिए|यहा तक की सुप्रीम कोर्ट ने एक अपने आदेश में कहा था की खाप पंचायते भूर्ण हत्या के खिलाफ कार्यवाही करती है जिसके लिए हम उनकी सरहना करते है|तो वही हरियाणा के भिवानी जिले में 12 गावों की खाप पंचायतों ने यह निर्णय लिया की विवाह के खर्चे कों कम करने के लिए भोज देने पर रोक लगा दी|

खाप पंचायतों में ही गढ़वाला खाप का मुख्य कार्य ग्रामीण सामाजिक मतभेदो कों समाप्त करना,दहेज़ ,फिजूल के खर्चे कों कम करना,महिला अत्याचार,सामाजिक रूढ़िवादिता कों समाप्त करना,ऐसे सामाजिक कार्यो कों प्रोत्साहित करना जिससे समाज की एकत कों मजबूती मिले|अक्सर खाप पंचायतों पर यह आरोप लगाया जाता है की वह प्रेम विवाह कों मान्यता नहीं देते है पर यही एक सत्य हों यह नहीं हों सकता है| निड़ाना गाँव की खाप ने विवाह के लिए कुछ नियम है| जब सामाजिक तौर पर बात आती है तो निड़ाना में प्रेम विवाह संभव है| ये मान्यतए दो प्रकार की होती है|

1- गाँव के हर धर्म-जात की प्रत्येक लड़की गाँव के हर लड़के की बहन , माता-पिता की पीढ़ी के लिए बेटी भतीजी –दादा-दादी की पीढ़ी के लिए पोती मानी गई है| इसीलिए निड़ाना गाँव की गाँव में शादी नहीं होती है

2- निड़ाना से सटे गाँव में भी सामाजिक मान्यताओके आधार पर शादी वर्जित मानी जाती है| चाहे लड़की का गोत्र,धर्म , जाति सब अलग ही क्यू ना हों|

3- पिता ,माता और यदि दादी जिंदा है तो उनका निड़ाना में शादी करते वक्त इन तीन गोत्रों कों छोड़ा जाता है|

लेकिन प्यार करने वाले सामाजिक मान्यताओ कों ध्यान में रखे तो उनकी शादी हों सकती है|

1- गाँव में धर्म और जाति से बाहर विवाह अनुमति है पर यहा यह जरूरी होगा की इसकी आज्ञा परिवार और उनके रिश्तेदारों पर निर्भर करता है|

अभी हाल ही में सतरोल खाप पंचयात ने 20 अप्रैल को लिए गए फैसले के बाद करीब तीन हज़ार कुवारों की शादी होने की ऊमीद जग गई है| ज्ञात हो कि खाप ने फैसला किया था कि खाप के 43 गाँव के आपस में रिश्ते – नाते खोले जाए ताकि कोई भी युवक अपना गोत्र ,गाँव और गुवाण्ड़ को छोड़कर कही पर भी किसी भी जाति में अपने माता-पिता कि रजामंदी से शादी कर सकता है| यहा तक कि सतरोल खाप के हर गाँव में जा करके सर्वे करेगा और लोगों को भ्रूण हत्या और शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करेगा|

सतरोल खाप के इस फैसले के बाद सांगवान खाप ने भी अंतरजातीय वैवाहिक रिश्तो को मान्यता दे दी है| पर इस में परिवार के लोगों कि सहमति होन जरूरी है|

एक अग्रेज़ी अखबार से बात करते हुए सतरोल खाप के मुखिया इंदर सिंह सूबेदार ने बताया,यह एक मात्र ऐसा रास्ता है था जिससे हम अपनी परंपरा को जिंदा रख सकते है| राज्य से बाहर कि दुल्हन लाने उसे यहा के माहोंल में रहने में समय लगता है,इसलिए हमने प्रतिबंधित क्षेत्रों में जाने का विचार किया| यह हरियाणा में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा|लेकिन खाप पंचायते प्राचीन समाज का हिस्सा रही है जो बदलते समय के साथ अपना सामंजस्य नहीं बैठा पा रही है| इसका प्रमुख कारण यह है महिलाओ और युवा वर्ग को खाप पंचायतों में पहले के जैसा स्थान नहीं मिल पा रहा है| यदि इन खाप पंचायतों के मनोवृति और इसके सामाजिक ढ़ाचे का अध्यनन करे तो पता चलता है की जो सम्पूर्ण खाप पंचायतों का एरिया है ( हरियाणा , राजस्थान ) वहा पर लिंग अनुपात काफी कम है|

तो दूसरी तरफ देखे तो ज्ञात होता है की पुराने समय के साथ-साथ पुरे समाज का आवागमन खराब हो गया है तो खाप पंचयाते भी इससे अछूता नहीं रही पंचायाते द्वारा सर्वमान्य और साफ फैसला नहीं दे पाने के कारण बहुत खाप पंचायत प्रतिनिधियों के दामन दागी हुई है| ढ़राना -प्रकरण,वेदपाल-हत्याकांड ,बलहम्बा-हत्याकांड, सिवाना –हत्याकांड आदि एक के बाद कानून को तोड़ने वाली घटनाओ ने हरियाणा की खाप पंचायतों के ख़तरनाक होते स्वरूप को सामने लाकर के समाज के सामने रख दिया दरअसल जमाने में मोबिलिटी नहीं थी लोग बाहर नहीं जाते थे , शिक्षा का ग्राफ भी ज़्यादा नहीं था , लड़कीया शिक्षा के लिए बारह नहीं जाती थी| तब ये चीजे यानि खाप के नियम लोगों पर लागू होते थे क्युकी विरोध के स्वर काफी कम थे|

पर आज के समय के साथ सक्रियता इतनी बढ़ गया है,काफी-मेल जोल लड़के-लड़कियो की होती है| अब वह गाँव में नहीं रह कर के शिक्षा ग्रहण करते बल्कि वह गाँव से बाहर भी जाने लगे है| तो स्वाभाविक है की आपस में मुलाक़ात होगी तो दोस्ती भी होगी,दोस्ती होगी तो प्यार भी होगा| बस यही चीजे अपने माता –पिता से शेयर नहीं करते है क्युकि वह अच्छी तरह से जानते है वह जिस समाज से आते है,वहा का समाज इसकी मान्यता नहीं देता है| इसलिए वह एक दिन घर को छोड़ कर चले जाते है| जानकार मानते है कि खापों कि परंपरा अब जाटों तक ही सीमित रह गई है|

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रों. डी.आर. चौधरी बताते है कि , “यहा अच्छी पत्र-पत्रिकाए नहीं है,फिल्म सिटि नहीं है, नाटक कि परंपरा नहीं है , स्वांग होता था अब वह भी खत्म हो गया| यहा पत्र- साहित्य संस्कृति संस्थाए नहीं है| हरियाणा सांस्कृति तौर पर बहुत पिछड़ा है| यह पर एक समय आर्य समाज का प्रभाव था वह भी समय के साथ खत्म हो गया| हरियाणा के अंदर एक भी आर्ट गैलरी नहीं है , आर्थिक विकास और संस्कृति विकास में एक लंबी खाई आज भी बनी हुई है”| जितना समाज सुधार इन राज्यो में होना चाहिए था वह नहीं हो सका| जिसका परिणाम यह हुआ कि आर्थिक रूप से तों ये काफी विकसित हो गए पर चेतना के स्तर के अलावामानसिक स्तर पर भी ये अपने अंदर बदलाव नहीं ला सके| खाप पंचायतों में पुरुषो का दबदबा बहुत ज़्यादा है|

जब खाप पंचायत के प्रतिनिधि सूबे सिंह यह कहा कि “लड़के और लड़कियो कि शादी 16 साल कि उम्र में कर देनी चाहिए ताकि बलात्कार को रोका जा सके| तब इसका विरोध डॉ.संतोष दहिया सर्व जाट खाप महापंचायत की महिला प्रकोष्ठ की प्रमुख ने शादी की उम्र को घटाने का विरोध किया लेकिन उनकी बात का विरोध करने वालों की भी कमी नहीं थी| जानकार खापों को पुरुष –प्रधान समाज के प्रदर्शन के तौर पर देखते है जहा महिलाओ को हमेशा दबाकर के रखा जाता है|

जाटों का इतिहास काफी अच्छा रहा है उन्होने बाबर से लेकर के अकबर तक का विरोध किया था| यह विरोध साम्राज्यवादियों के खिलाफ था| लेकिन इनका अब विरोध लोकतन्त्र के खिलाफ हो रहा है| भारत की आजादी के बाद पंचायती व्यवस्था लागू होने के बाद राजनीतिको ने इनकी ताकतों को पहचान लिया था और इनका प्रयोग अपने राजनीति कार्यो के रूप में करने लगे| जिसका परिणाम यह हुआ की खाप पंचायते काफी पीछे चली गई| दो लोगों के बीच संघर्ष की स्थिति तभी उत्पन्न होती हैं जब उनके विचारों के बीच अंतर्द्वंद और वर्चस्व की स्थिति उत्पन्न हो जाए निजी सम्पति की भावना भी दो लोगों के बीच संघर्ष उत्पन्न करने के लिए काफी है| यदि ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही देखें तो पता चलता है कि असुरक्षा की ‘भावना’ ही लोगों को एक – दूसरे के पास आने के लिए मजबूर कर दिया| इसी से समुदाय और परिवार का जन्म हुआ| इसी से संयुक्त परिवार बने और टूटे भी इसी में से एकल परिवार का भी जन्म हुआ इसका सिर्फ एक ही कारण था निजी भावना की उत्पति का होना| अर्थात लोगों की चेतना वाह्य के साथ – साथ आतंरिक रूप से भी प्रभावित हों रही थी| कुछ ऐसे तत्व थे जों लोगों की चेतना तथा विचारों को ही प्रभावित ही नहीं कर रही थी बल्कि जिस असुरक्षा की भावना ने लोगोंको एक साथ आने के लिए मजबूर कर दिया था| वहीं ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा की चाह ने लोगो को एक दूसरे से अलग करके लोगों की चेतना को प्रभावित करने लगी थी|

यही स्थिति आज खाप पंचायतों में भी उत्पन्न हो गई हैं| ये सिर्फ़ हरियाणा के रहने वाले लोगों को ही प्रभावित नहीं करता हैं बल्कि जो उसके अनुषगी शहर हैं वह भी प्रभावित हो रहे हैं|पलायन का दौर जो बेरोजगारी के कारण बढ़ा था| वह अब खाप पंचायतों के कारण भी बढ़ने लगा है| लोग रोज़गार की तलाश के कारण दूसरे राज्यों में जाते थे आज खाप पंचायतों के कारण लोग अपनी ज़िंदगी की तलाश में अपने राज्य को छोड़कर दूसरे राज्य में जा रहे हैं|

खाप पंचायतों को समाज सुधार को जारी रखना है तो लोकतन्त्र की प्रणाली को अपनाना होगा| समान भागीदारी सभी की तय करनी होगी|अंत में यही कहा जा सकता है की जाटों की सबसे बड़ी गलती यह है की वक्त के साथ अपने को बदल नहीं सके| इतना तो तय है की सुधार की जरूरत है – चेतना के स्तर पर|

संदर्भ ग्रंथ सूची

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