हिंदी कविता और युवा अभिव्यक्तियां:प्रो. सुशील कुमार शैली

राष्ट्र की शक्ति है - युवा वर्ग | युवा शक्ति का आधार है - विचार | जहाँ विचार व तर्क शून्य युवा ; वयोवृद्ध के समान है , वहाँ विचारों और तर्क से सराभोर एक वयोवृद्ध ; युवा है | युद्ध भूमि में खडा एक योद्धा यदि राष्ट्र प्रेम के विचारों से प्रेरित नहीं तो वह एक बुत के समान है | वहीं युद्धभूमि में तैनात किसी शहीद का बुत या समारक भी एक योद्धा के समान है | जिससे प्रेरणा व ऊर्जा लेकर , जिसकी की कीर्ति गा कर जहाँ योद्धाओं में उत्साह भरता , राष्ट्रप्रेम जागृत होता है ; वहाँ विरोधी सेना में भय बना रहता है | इसी लिए तो रीतिकाल के वीर रस कवि गुरू गोबिन्द सिंह को मुगलों से लोहा लेने के लिए ' चंडी दी वार ' लिखने की आवश्यका पडी | निराला की ' राम की शक्तिपूजा ' में शक्ति का आह्वान और मुक्तिबोध की ' अंधेरे में ' का रक्तालोक-स्नात पुरुष की खोज दोनों युवा शक्ति का ही आह्वान था | " होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन ! " कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन | ( - राम की शक्ति-पूजा). हर एक आत्मा का इतिहास हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति प्रत्येक मानवीय स्वानुभूति आदर्श विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति !! खोजता हूँ पठार..... पहाड....….समुन्दर जहाँ मिल सके मुझे / मेरी वह खोयी हुई परम अभिव्यक्ति अनिवार / आत्म-संभवा | ( - अंधेरे में ) कलमों से निकलते हैं - शब्द | शब्द से संबध होता है - अर्थ | अर्थ होते हैं - संदर्भगत | प्रत्येक संदर्भ का उपजीव्य हैं - विचार व तर्क | इसलिए किसी राष्ट्र के गुलाम बनाने का सबसे कारगर हथियार रहा है कि युवाओं को विचारों व तर्कों से शून्य कर , राष्ट्रीय संदर्भ से काटकर रखो | लैनिन ने भी अपनी सूक्षम दृष्टि से इसी विश्लेषण को आधार बनाकर कहा कि - ' किसी राष्ट्र के युवा कैसा गीत गाना या सुनना पसंद करते हैं इस आधार पर मैं उस राष्ट्र का भविष्य बता सकता हूँ | '१९४७ में आजादी के बाद भारत में जैसी परिस्थितियां रहीं वो वतर्मान की जनक हैं | युवाओं की आँखों में आजादी के बाद जिस स्वर्णीम भारत का स्वप्न था वो धीरे धीरे टूटता चला गया | भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, कालाबाजारी, रिश्वतखारी, भ्रष्टाचार व घोटालों ने युवाओं के मन घरों निराशा उत्पन्न कर दी | पढा लिखा युवा वर्ग डिग्रीयों को हाथ में लिये दर-दर की ठोकरें खाने के लिए विवश हो गया | अंत में उसे यह कहने के लिये विवश होना ही पडा कि - मगर सिकडूँ तो कहाँ तक सिकडूँ मैं इस कदर सिकुड चुका हूँ कि छोटे से छोटे / अवसर के छल्ले से अपने को साफ साफ बचाकर गुजर सकता हूँ | ( - श्रीकांत वर्मा ) लेकिन जनता थी कि अभी भी स्वप्नों में थी, मूक थी| पांच वर्षीय योजनाओं और ' जय जवान जय किसान ' जैसे नारों ने युवाओं के मन में मुर्दों जैसी शांति भर दी| वह अपने शोषण को पहचान नहीं पा रहे थे | कविताओं के माध्यम से कवियों में जनता को ऐसी जड स्थिति से सचेत करने का भरसक प्रयास किया | पंजाबी कवि पाश ने कहा - सबसे खतरनाक होता है / मुर्दा शांति से भर जाना न होना तडफ का सब कुछ सहन कर जाना घर से निकलना काम पर / और काम से लौटकर घर आना सबसे खतरनाक होता है / हमारे सपनों का मर जाना | ( - सबसे खतरनाक ) 1960-70 के बीच भारत पाक युद्ध ,भारत चीन युद्ध और औद्योगिक क्रांति की अंधी दौड ने युवाओं का मोहभंग किया तो उन्होंने स्वयं को पीछे छूटा पाया | किसी कोने में अकेला , ठगा हुआ | ऐसी दशा में उसका बीस साल बाद आजादी और संविधान को लेकर प्रश्न पूछना स्वाभाविक था कि - क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई खास मतलब होता है ? ( - बीस साल बाद - धूमिल ) यह पुस्तक जब बनी थी तो मैं एक पशु था / सोया हुआ पशु..... और जब मैं जागा तो मेरे इंसान बनने तक यह पुस्तक मर चुकी थी | ( - संविधान - पाश ) जनता में आशा थी कि आजादी के बाद अब आजाद भारत में उनकी चुनी हुई सरकारें भूखमरी , गरीबी , बेरोजगारी दूर हो जायेगी | इसी आशा में हर साल चुनाव होते रहे सरकारें बनती रही लेकनि जनता की स्थिति वही रही | सरकार द्वारा अपनाई गईं योजनाएं विफल साबित होती रही | जनता इंतजार करती रही विकल्पों की आशा में | धूमिल के अनुसार - मैंने इनंजार किया - अब कोई बच्चा / भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा अब कोई छत बारिश में / नहीं टपकेगी अब कोई आदमी कपडों की लाचारी में अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा अब कोई दवा के अभाव में घुट घुटकर नहीं मरेगा | ( - पटकथा - धूमिल ) १९६५ के बाद औद्योगिक क्रांति, पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से भौतिकता की ओर बढता मनुष्य , नैतिक मूल्यों का विघटन , संयुक्त परिवारों का विघटन , स्त्री पुरुष संबंधों में बदलाव और हाशिये पर पडी अस्मिताओं की आवाज कविताओं में पडने लगी | केदारनाथ सिंह अपने युग का सच बताता हुआ लिखता है कि - पर सच तो यह है कि यहां या कहीं भी फर्क नहीं पडता तुमने जहां लिखा है प्यार वहां लिख दो सडक ,फर्क नहीं पडता है मेरे युग का मुहावरा है : फर्क नहीं पडता | ( - फर्क नहीं पडता - केदारनाथ सिंह ) युवा कवयित्री स्वरांगी साने ' प्याज ' नामक कविता में एक स्त्री की व्यथा को लक्षणा के माध्यम से अभिव्यक्त करती हुई लिखती हैं - आज पूछती है बेटी / क्या हुआ माँ ? कह देती हूँ / कुछ नहीं , प्याज काट रही हूँ | राजेन्द्र नागदेव अपने काव्य संग्रह ' उस रात चाँद खण्डहर में मिला ' में भावबोध और सौन्दर्यपरक तुष्टि के साथ प्रस्तुत होते हैं -

मैं आकाश को / दोनों हाथों से पकड / झिंझोड देना चाहता हूँ कि कंकडों की तरह खडखडाकर / बज उठें ग्रह नक्षत्र फट जाए बासी हो चुका जमा हुआ सन्नाटा मेरे आकाश में ग्रह नक्षत्र थे ही नहीं | युवा आज जब हुकुमत से बदहाली का कारण पूछता है तो महेश अग्रवाल के शब्दों में उसे हुकुमत से कुछ इस तरह जबाव मिलता है - कत्ल कर डाला सभी जलते सवालों को यहाँ इस तरह से दे रहे है राज सिंहासन जवाब | ( पेड फिर होगा हरा ) पिछले दिनों दिल्ली में हुए निर्भय कांड के विरोध में उमडी जनता पर पुलिस का , सत्ता बरबर अत्याचार महेश की उपरोक्त पंक्तियों की पुष्टि करती है | आनन्द कुमार शुक्ल सांस्कृतिक आततायिओं पर कटाक्ष करत हुये अपनी कविता ' मरणांतक ' तक में लिखते हैं - संस्कृतियों के अजायबघरनुमा अंधे इतिहास में जरायमपेशा सभ्यताएं ' अपनी अपनी ' औरतों को सुरक्षित करती हैं हमारे अपने देश के विविध धर्मों के बीच सभ्यता की ओट में / सुरक्षित बची औरतें इतिहास की सबसे सुहानी कालिख जनती हैं ..| इस प्रकार साहित्य युवा अभिव्यक्तियों का माध्यम रहा है | राजनीतिक , सामाजिक परिवेश में आज जैसे जैसे बदलाव आता जा रहा है साहित्य में वह अपने हस्ताक्षर देते जा रहा हैं | आज हो रहे घोटालों जैसे कॉमन वैलथ घोटाला , चारा घोटाला , धर्म की राजनीति , राजनीतिक पैंतरे बाजी और घर वापसी जैसे नारों के साथ जिस प्रकार का सांस्कृतिक आतंकवाद फैलाया जा रहा है युवा कवि उसके पीछे के षडयंत्रों को अपने विचारों के साथ तर्किक ढंग से कविता में प्रस्तुत कर रहा है |

प्रो. सुशील कुमार शैली एस. डी. कॉलेज, बरनाला ( पंजाब )-148101 मो. - 99144-18289 ई. मेल - shellynabha01@gmail.com

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