हिंदी कहानी : पात्रों की बदलती मनःस्थिति-संजय,


पीएच-डी. हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग,

म.गा.अ.हि. विश्वविद्यालय, वर्धा

वर्तमान समय भूमंडलीकरण का समय है, जहाँ सारा विश्व ही एक ग्राम बन गया है । लेकिन गाँव में हमें जिन मूल्यों, सहिष्णुता, प्रेम, आपसी सरोकार, नैतिकता, मानवीयता आदि संबंधों की गर्माहट का अहसास होता था, वह एहसास इस विश्वग्राम के परिवेश से नदारद है । कारण सिर्फ इतना है कि यहाँ मूल्यों, संबंधों, नैतिकता, विश्वास, बंधुत्व, प्रेम और परदुख कातरता के स्थान पर 'पैसा' प्राथमिक हो गया है । "भूमंडलीकरण के बाद के (इस) व्यावसायिक परिदृश्य में सपनों के व्यापार का एक ऐसा सिलसिला चल पड़ा है जिसने क्या शहर, क्या महानगर यहाँ तक कि छोटे-छोटे गाँव-कस्बों के लोगों तक की आँखों में स्वप्न और यूटोपिया के नाम पर येन केन प्रकारेण रातोंरात करोड़पति बन जाने की एक अंतहीन महत्वाकांक्षा के बीज रोप दिए हैं । एक ऐसी अंधी और स्वार्थी महत्वाकांक्षा जो सिर्फ पैसे बनाना जानती है और जिसके लिए हर व्यक्ति एक 'प्रोफिट सेंटर' तथा हर रिश्तेदार एक 'पोटैन्शियल कस्टमर' होता है ।"[1] हालांकि 'पैसे' की प्राथमिकता ने आज के व्यक्ति को निस्संदेह भौतिक रूप से अधिक सशक्त और संपन्न बनाया है । लेकिन यह भी सच है कि वह मानवीय मूल्यों से शून्य भी हो गया है । मूल्यों के इस अभाव ने उसके भीतर भय और एकाकीपन को जन्म दिया है । साथ ही अधिक से अधिक पैसे पाने की लालसा के कारण उसकी महत्वाकांक्षाएँ भी इतनी बाढ़ गई हैं कि जब गला काट प्रतिस्पर्धा के चलते वे पूरी नहीं हो पाती हैं तो उसके भीतर निराशा, अवसाद, भय और अकेलेपन आदि का जन्म होता है और वे धीरे-धीरे एक कुंठा में बदल जाती हैं । आज के समय में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो इस प्रकार की ग्रंथियों से ग्रसित न हो, हाँ इतना अवश्य है कि उसकी मात्रा कम या अधिक हो सकती है ।

पिछले दस वर्षों में कहानीकारों ने कुछ ऐसे ही ग्रंथिल पात्रों को अपनी कहानियों में स्थान दिया है जो राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक या आपसी संबंधों के कारण हीनता बोध से ग्रसित व कुंठित हैं । उदाहरण के तौर पर प्रभात रंजन की कहानी 'डिप्टी साहेब' के चंद्रमणि को ही देख सकते हैं जो आपसी संबंधों के कारण अंतर्मुखी हो जाता है । उसके भीतर एक कसक पैदा होती है जो संबंधों की टूटन से उत्पन्न हुई है । यहाँ संबंधों की टूटन का दर्द नहीं है अपितु एक संबंध के टूटने और उसके दूसरे रूप धारण करने की पीड़ा है । जो चन्द्रमणि के मूक रहने पर भी चीख-चीख कर व्यंजित होती है- "उसने पत्र मोड़कर एक ओर रख दिया । ........................ अब कौन था उसके जीवन में । वह फूट-फूटकर रोने लगा । फिर ध्यान आया कि अगल-बगल के कमरों में रहने वाले लड़कों को न पता चल जाए कि वह रो रहा है तब वह आवाज दबाकर रोने लगा । बीच-बीच में तेज हिचकी उठती । आँसुओं से उसके कपड़े भीग गए ।"[2] इसी प्रकार की पीड़ा हम पंखुड़ी सिन्हा की "समांतर रेखाओं का आकर्षण" मनीषा कुलश्रेष्ठ की 'इस्टिकर', अल्पना मिश्र की 'सड़क मुश्तकिल' और वंदना राग की 'कान' जैसी कहानियों के चरित्रों में देख सकते हैं, क्योंकि उनमें राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और आपसी संबंधों के कारण एक अलग तरह का डर, पीड़ा, निराशा और खिन्नता व्याप्त है ।

हिंदी कहानियों में अवसादवादी और निराशावादी चरित्रों की पड़ताल करते हुए यदि हम एक-दो दशक पीछे जाएँ, तो पाएँगे कि 21 वीं शताब्दी के प्रथम दशक की कहानियों के पात्रों में जो ग्रंथियाँ लक्षित होती हैं वह नौवें और दसवें दशक में ज्यों की त्यों विद्यामान हैं । केवल उनके उत्पन्न होने के करण बदले हुए हैं । यह एक महत्वपूर्ण दशक है, क्योंकि इसी समय अवधि में, भारत में मीडिया का तीव्र गति से प्रवेश होता है और हिंदा कहानी की सबसे बड़ी चिंता उपभोक्ता, बाजारवाद तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया के द्वारा सांस्कृतिक वातावरण को बादल डालने के खतरे पर केंद्रित हो जाती है । नब्बे के दशक में टी॰ वी॰ चैनलों ने विज्ञापन के द्वारा जिस रूप में व्यक्ति की प्राथमिकताओं को बदला है, वह समाजशास्त्रियों के लिए चिंता का विषय तो बना ही, हिंदी कहानीकारों ने भी इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए इस विषय पर विस्तार पूर्वक कलम चलाई । उपभोक्तावादी संस्कृति ने मध्यवर्गीय जीवन को एक ऐसे जाल में फँसा दिया है जिसमें एक बार फँस जाने के बाद फिर उससे उबर पाना असंभव बन जाता है । शिवजी श्रीवास्तव की कहानी 'जाल' इस तथ्य को रेखांकित करती है "रज्जू साहब के घर टी.वी. आने से पहले और बाद के दृश्य में हमें कुछ पुरानी बात महसूस होगी लेकिन इसमें जो तथ्य है उसकी बड़ी प्रासंगिकता है । टी.वी. में जिस उपभोग समग्रियों की जानकारी-व प्रदर्शन किया जाता है आज की सुविधा पसंद पीढ़ी आसानी से उसके वश में आ जाती है । विडंबना की बात है कि आज की पीढ़ी इस तथ्य पर विचार भी नहीं करती कि ये सारी चीजें इतनी आवश्यक हैं या नहीं ।"[3] इस दृष्टि से लवलीन की कहानी 'सहेलियाँ' भी एक महत्वपूर्ण कहानी है । यह एक प्रेम कहानी है । जिसमें पति नवीन एक नए मॉडल का सी॰डी॰ प्लेयर घर ले आता है किंतु इसलिए नहीं कि उसे संगीत या फिल्म का खास शौक है अपितु इसलिए ताकि अपनी शानो-शौकत का प्रदर्शन कर सकें । लेकिन पत्नी को सी॰डी॰ प्लेयर (जो की उपभोक्तावाद का प्रतीक है ।) के आ जाने से आपसी संबंधों की गर्माहट समाप्त होती सी लगती है और उपभोक्तावाद के चलते पति-पत्नी के संबंधों में खटास शुरू हो जाती है और पत्नी के अंदर एक खालीपन शून्यता स्थान बनाना आरंभ कर देती है । शैवाल भी अपनी कहानी 'भारतीय लोक' में बड़ी कुशलता से बाजारवाद के दुष्प्रभाव को उजागर करते हैं । कहानी में एक सम्पन्न परिवार की महिलाएँ ही नहीं अपितु उस घर में नौकरानी का काम करने वाली सकुना जिसके पास अपने बेटे को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है, वह भी अपने सौंदर्य के लिए ब्यूटी पार्लर में डेढ़ सौ रुपए खर्च कर आती है । इसी चरमावस्था से कहानी की एक और पात्र 'दादी' की पीड़ा का बिंदु शुरू होता है कि बेटे का भविष्य बनाने, उसकी तकलीफ घटाने के स्थान पर माँ को अपनी दैनिक सुंदरता की चिंता है और यही चिंता उसके भीतर इस उपभोक्तावाद और बाज़ार के प्रति विचलन पैदा करती है । इसी तरह जयनंदन की कहानी 'चियर अप कोलाब्लूम' का नवलकांत, संजय खाती की कहानी 'पिंटो का साबुन' का पिंटो, कमलेश्वर की कहानी 'तुम्हारा शरीर मुझे पाप के लिए पुकारता है' और उदयप्रकाश की कहानी 'पाल गोमरा का स्कूटर' के पात्र भी बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद से ग्रस्त है और उनमें एक अजीब तरह की छटपटाहट देखी जा सकती है ।

अब प्रश्न यह उठता है कि हाल के कुछ वर्षों में हिंदी कहानियों के चरित्रों में जो निराशा, अवसाद, खिन्नता, ऊब, घुटन और नाना प्रकार की कुंठाएँ, ग्रंथियां दिखाई पड़ती हैं, क्या वह आरंभिक युग की कहानियों में भी व्याप्त थी । तो इसके उत्तर के लिए हमें आज से नौ दशक पीछे अर्थात दूसरे दशक की कहानियों का विश्लेषण करना होगा, जो कि प्रथम विश्वयुद्ध का समय था । इसी दौर में मौलिक हिंदी कहानियों का सशक्त दौर शुरू होता है । प्रथम विश्व युद्ध होने के बावजूद युद्ध की विभीषिका का वैसा प्रभाव कहानियों पर नहीं पड़ा जैसा द्वितीय विश्वयुद्ध से पड़ा था । चन्द्रधर शर्मा गुलेरी दूसरे दशक के प्रारंभ में ही दो कहानियों 'सुखमय जीवन' और 'बुद्धू का काँटा' लिख चुके थे । ये दोनों ही प्रेम कहानियाँ थी जिनके नायकों में क्षणिक निराशा दिखाई पड़ती है, प्रेम के असफल होने की संभावना समाप्त होने पर निराशा भी स्वतः समाप्त हो जाती है । लेकिन सन 1915 में सरस्वती में गुलेरी जी की सर्वोत्कृष्ट कहानी 'उसने कहा था' प्रकाशित हुई । इस कहानी ने उन्हे कहानी जगत का सदैव दैदीप्यमान रहने वाला नक्षत्र बना दिया । यह भी एक प्रेम कहानी थी । जिसमें लेखक ने प्रेम में असफल होने पर नायक लहनासिंह के मन की निराशा को, अंतःवृत्ति की दशा को प्रारंभ में ही उसके क्रिया-कलापों के माध्यम से व्यक्त कर दिया- "तेरी कुड़माई हो गई ?............... लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली, 'हाँ, हो गई ।' .............लड़की भाग गई, लड़के ने घर की राह ली । रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छबड़ी वाले की दिन भर की कमाई खाई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया । सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई । तब कहीं घर पहुंचा ।"[4] असफल प्रेम की यह कसक 25 वर्षों बाद मृत्युशैय्या पर पड़े हुए लहनासिंह की स्मृतियों में अंत तक बनी रहती है और उसकी पीड़ा को स्पष्ट करती है- "मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है । जन्म भर की घटनाएँ एक-एक सामने आती हैं । सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं, समय की धुंध बिलकुल उन पर से हट जाती है ।......लहनासिंह बारह वर्ष का है । अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है । दही वाले के यहाँ, सब्जी वाले के यहाँ, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है । जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई ? तब 'धत' कहकर वह भाग जाती है । एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा, " हाँ, कल हो गई । देखते नहीं, यह रेशमी के फूलों वाला सालू ?" सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ । क्रोध हुआ ।"[5] लेकिन यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि इस दशक की लगभग सभी कहानियों में आदर्श की प्रतिष्ठा हुई । इनमें मानवीय मूल्य, सरोकार, विश्वास, प्रेम, त्याग, बलिदान और परदुख कातरता जैसे भाव बने हुए है । इस कारण वैसी ग्रंथियां या कुंठाएँ चरित्रों में नहीं मिलती जैसी आज की कहानियों में मिलती है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए यह वह दशक था जब भारत परतंत्र था, देश में सामंती व्यवस्था थी । पूंजीवाद के बीज अंकुरित हो रहे थे । गुलामी के इस वातावरण में देश की जनता ने सर्वाधिक शारीरिक और मानसिक शोषण झेला । जनता में भय और निराशा का संचार हुआ । सामंती व्यवस्था ने उनमें हीनता बोध को जन्म दिया । जनता अपनी ही दृष्टि में बौनी हो गई । किसान से मजदूर बनने, रोजगार के लिए दिन रात भटकते और भूख से बिलखते बीवी बच्चे की चीख़ों ने उसे हीन भाव से ग्रसित कर दिया । ऐसी परिस्थितियों में ही जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद का कहानी के क्षेत्र में पदार्पण हुआ और उन्होंने "हिंदी कहानी का रुख अपने परिवेश और यथार्थ की ओर मोड़ दिया । अब कहानी में कल्पना या स्वर्णिम अतीत के इतिहास का लोक नहीं अपितु कहानीकार के चारों ओर फैला, समाज और परिवेश चित्रित होने लगा । कहानीकार का ध्यान अपने समाज की बहुविध समस्याओं की ओर गया ।"[6] उन्होने परतंत्रता और सामंती व्यवस्था के चलते मानसिक और शारीरिक दबाव झेलते, भयाक्रांत पीड़ित निराशा और हीनता बोध से ग्रस्त लोगों को अपनी कहानियों में स्थान दिया । उदाहरण के लिए हम प्रेमचंद की 'मृतक भोज' की सुशीला, 'सवा सेर गेहूँ' का शंकर, 'पूस की रात' के हल्कू और 'कफन' के घीसू और माधव को ले सकते हैं । इसी तरह प्रसाद की कहानी 'मधुआ' का नायक मधुआ और 'गुंडा' का नन्हकू सिंह को देख सकते हैं । यद्यपि प्रसाद के सबसे जटिल पात्र स्त्री पात्र रहे हैं जो सदैव किसी न किसी मानसिक द्वंद और कुंठा अवसाद से जूझते नज़र आते हैं । उदाहरण स्वरूप 'करुणा की विजय' की रामकली,'जहाँनारा' की जहाँनारा और 'पुरस्कार' की मधुलिका को ले सकते हैं । लेकिन जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है इस दशक की लगभग सभी कहानियों में आदर्श की प्रतिष्ठा की गई है । इनमें प्रेम, त्याग, बलिदान, आत्मीयता और मानवीयता है, मूल्य टूटे नहीं हैं ज्यों के त्यों बने हुए हैं । इस कारण इन कहानियों में वैसी ऊब, खिन्नता, रिक्तता, अजनबीपन, उदासी, आंतरिक टूटन आदि नहीं लक्षित होती जैसी तीसरे-चौथे दशक के चरित्रों में दृष्टिगोचर होती हैं ।

दरअसल हम जिन मानवीय कुंठाओं और ग्रंथियों की पड़ताल करते हुए कहानी के प्रारम्भिक दशकों में आए थे, उसके बीज तीसरे दशक में आ कर मिलते हैं । यह वह दशक था जब पाश्चात्य दर्शन का प्रभाव हिंदी कहानियों में मुखरित होने लगा था । जैनेन्द्र कुमार, इलाचन्द्र जोशी, और अज्ञेय जैसे कहानीकारों ने फ्रायड और युंग के मनोविज्ञान के सिद्धांत के आधार पर पात्रों के 'स्व', आंतरिक टूटन, अकुलाहट, सूनेपन और उदासी का विश्लेषण करना आरंभ कर दिया था । जैनेन्द्र में यह प्रवृत्ति प्रमुख रूप से दिखाई देती है जिसे डॉ. पुष्पपाल सिंह रेखांकित करते हुए कहते हैं- "प्रेमचंद ने कहानी में व्यक्ति और व्यक्ति-मन में उठने वाले भाव, प्रेम, आदि की जो उपेक्षा की थी, जैनेन्द्र ने इस अभाव की संपूर्ति की । उनकी कहानियों में 'स्व' का, 'मैं' का महत्व प्रस्थापित हुआ । कहानी में विकास की इस प्रवृत्ति को यदि कविता के विकास से मिला कर देखें तो यह ठीक ऐसा ही हुआ जैसे द्विवेदी-युग के पश्चात छायावाद में 'स्व' का महत्व-स्थापन हुआ । जैनेन्द्र की कहानियों में सुनिश्चित परिवर्तन यह है कि इनकी कहानियों में पूर्ववर्ती कहानी की घटनात्मकता न हो कर मानसिक जगत को साक्षात करने का सहज प्रयत्न है ।"[7] यद्यपि इस दौरान उपेन्द्रनाथ 'अश्क', भगवती चरण वर्मा, अमृत लाल नागर, विष्णु प्रभाकर जैसे कहानीकार भी कहानियाँ लिख रहे थे । किंतु उनके पात्रों में अतःवृत्ति की प्रवृत्ति उसे व्यापक रूप में लक्षित नहीं हो रही थी जैसी की जैनेन्द्र के चरित्रों में दिखाई पड़ती है, और बाद में "इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय ने जैनेन्द्र की इसी परंपरा का अनुसरण किया । इलाचन्द्र जोशी के पात्र तो किसी मनोविश्लेषण की समस्या के लिए ही गढ़े गए हैं । अज्ञेय ने जैनेन्द्र और इलाचन्द्र जोशी के समान अपनी कहानियों को सैद्धान्तिक मनोविश्लेषण का व्यावहारिक पक्ष न बना कर मन के सूक्ष्मतम यथार्थ को अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया ।"[8] उदाहरण के लिए अज्ञेय की 'रोज़' कहानी की मालती और महेश्वर प्रसाद, 'दुख और तितलियों' के शेखर और इलाचंद जोशी की कहानी 'खंडहर की आत्माएँ' तथा 'डायरी के नीरस पृष्ठ' जैसे कहानी संग्रह के अधिकांश पात्र ऐसे ही हैं । पश्चिम से केवल मनोविज्ञान शास्त्र ही आयातित नहीं हुआ था अपितु मार्क्सवाद और अस्तित्ववाद जैसे दर्शन भी कहानियों में लक्षित होने लगे थे । यह कहानी का चौथा दशक था । मार्क्सवाद के प्रभाव के चलते लोगों में पूंजीवाद के विरुद्ध आक्रोश तो उत्पन्न हुआ, किंतु सर्वहारा वर्ग की क्रांति के अभाव और वर्ग विहीन समाज के स्वप्न के स्वप्न ही रह जाने ने निराश किया । इसी निराशा और शक्ति की दुर्बलता को यशपाल ने 'भूखे के तीन दिन', 'हलाल का टुकड़ा', 'रोटी का मोल' जैसी कहानियों के पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया । यशपाल ने राजनैतिक कारणों से उपजी निराशा को भी 'मनु की लगाम' और 'खुदा की मदद' जैसी कहानियों के माध्यम से बखूबी व्यक्त किया । इस प्रकार की कहानियाँ लिखने में उग्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही । चूंकि 40 के दशक तक आते-आते व्यक्ति कहानी के केंद्र में आ चुका था इसलिए उसे अब बदली परिस्थितियों में अपने अस्तित्व का खतरा महसूस होने लगा था । वह स्वयं को भीड़ में भी अकेला महसूस करने लगा था । इस अकेलेपन के कारण उसमें मृत्युबोध का भय गहराने लगा । अस्तित्व के खतरे की इस बेचैनी और मृत्यु बोध को अज्ञेय और निर्मल वर्मा ने अपनी कहानियों के माध्यम से उकेरा । उदाहरण के तौर पर निर्मल वर्मा की कहानी 'लंदन की एक रात' के जार्ज और वो (वाचक) को ले सकते हैं । जो कहानी में निरंतर अपने अस्तित्व की समाप्ति और मृत्यु के भय से आक्रांत रहते हैं- "मैं उस क्षण जार्ज से डरने लगा, खुद अपने से डरने लगा । मुझे लगा, जैसे मैं अब कभी उसकी ओर नहीं देख सकूँगा । उस क्षण मैं कोई भयंकर चीज कर सकता था - मैं उससे बहुत-कुछ कहना चाहता था, कुछ भी.....शायद इससे भयंकर और कोई चीज नहीं, जब दो व्यक्ति एक संग होते हुए भी यह अनुभव कर लें कि उनमें से कोई भी एक-दूसरे को नहीं बचा सकता, जब यह अनुभव कर ले कि बीती घड़ियों की एक भी स्मृति, एक भी क्षण उनके मौजूदा...इस गुजरते हुए क्षण के निकट अकेलेपन में हाथ नहीं बाँट सकता, साझी नहीं हो सकता...."[9] तो वहीं 'परिंदे' कहानी की लतिका भी अपनी नियति के भय से विचलित दिखाई पड़ती है । इस प्रकार हम देखते हैं कि जिन विभिन्न प्रकार के मनोग्रंथियों और कुंठाओं के बीज की तलाश करते हुए हमें कहानी के प्रारम्भिक दशक में आए थे वे हमें तीसरे और चौथे दशक की कहानियों में मिलती है जिसके पीछे विभिन्न भारतीय कारण होने के साथ-साथ पाश्चात्य दर्शन का हिंदी कहानियों पर प्रभाव एक महत्वपूर्ण कारण बना ।

"स्वातंत्र्योत्तर समय में देश और समाज की बदली हुई परिस्थितियों के संदर्भ में कहानीकारों को यह अनुभव होने लगा कि प्रेमचंद की 'पूस की रात', 'कफन' जैसी श्रेष्ठ कहानियों में जीवन की यथार्थ स्थितियों का जो साक्षात्कार हुआ है, परवर्ती हिंदी कहानी यथार्थ को उस प्रभावी ढंग से न कहकर यथार्थ की कल्पित स्थितियों को गढ़ रही है ।..........फलतः 1950-55 के वर्षों के बीच आए युवा लेखक पहले की कहानी से कथ्य और शिल्प के स्तरों पर अपने को अलग करते हुए, पुरानी कहानी की जड़ता को तोड़ते हुए, अपनी पृथक पहचान कायम करते हैं । उन्होंने अपनी यह पहचान 'नई कहानी' आंदोलन के रूप में कराई ।"[10] इस दौर में देश ने बहुत कुछ देखा जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध और देश का विभाजन, विभाजन से मची मारकाट, मूल्य का विध्वंस आदि । नई कहानी में मूल्यों के इस विघटन को परिवार और मानवीय सम्बन्धों के स्तर पर प्रस्तुत किया गया । संबंधों का सरल सीधा रूप जीवन की विसंगतियों के आगे बेकार से प्रतीत होने लगे । इसलिए नई कहानी के रचनाकारों ने अब तक चले आ रहे संबंधों और मूल्यों के समक्ष प्रश्न चिह्न लगाए और उन्हें नए दृष्टिकोण से देख-परख कर अभिव्यक्त किया । मोहन राकेश की 'मलबे का मालिक' के गनी मियाँ, राजेंद्र यादव की 'टूटना' के किशोर और लीना, मन्नू भंडारी की 'यही सच है' की दीपा और निशीथ में बदले हुए संबंधों से उपजी निराशा, उदासी, खिन्नता यहाँ तक कि भय को स्पष्ट देखा जा सकता है । कमलेश्वर की कहानी "खोई हुई दिशाएँ" के नायक चंदर में अजनबीपन और अकेलेपन को तोड़ने और 'स्व' की पहचान की तीव्र छटपटाहट भी देखी जा सकती है- "निर्मला सोते-सोते एक बार रुक-रुककर सांस लेती है, जैसे उसे डर-सा लग रहा हो...या कोई भयंकर सपना देख रही हो...चंदर सुन्न-सा रह जाता है...क्या वह उसके स्पर्श को नहीं पहचानती ?.........और बिजली जलाकर वह निर्मला को दोनों कंधों से पकड़कर अपना मुँह उसके सामने करके डरी हुई आवाज़ में पूछता है, "मुझे पहचानती हो ? मुझे पहचानती हो निर्मला ?"[11]

इसी दौर में देश ने विभाजन की विभीषिका भी झेली थी । इसलिए इस दौर की कहानियों जैसे मोहन राकेश की 'मलबे का मालिक', कृष्णा सोबती की 'सिक्का बदल गया', भीष्म साहनी की 'अमृतसर आ गया' और अज्ञेय की 'शरणार्थी' के चरित्रों में अतिरिक्त डर, घुटन और अधिक लक्षित होते हैं । यही नहीं स्वतंत्रता के उपरांत के वातावरण ने अल्पसंख्यकों के मन में भी भय और संदेह जगाया । उनमें असुरक्षा का भाव तीव्र होता गया । इस अहसास ने ही कहानीकारों को उद्वेलित कर मुस्लिम जीवन और संस्कृति के अनेक पक्षों को कहानी के हाशिए से उठा कर केंद्र में ला खड़ा किया । यद्यपि यशपाल 'खुदा की मदद,' 'पर्दा' और अज्ञेय 'मुस्लिम-मुस्लिम भाई' जैसी कहानियाँ पहले लिख चुके थे । लेकिन शानी, बदी उज़्जमा और राही मासूम रज़ा ने अल्पसंख्यकों के उस भय और असुरक्षा के भाव को और भी प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया । आगे चल कर नफीस, अफरीदी, नासिरा शर्मा, असगर वजाहत, मंजूर एहतेशाम और अब्दुल बिस्मिल्लाह ने यह सिलसिला आगे बढ़ाया । उदाहरण के लिए नासिरा शर्मा की कहानी 'सरहद के इस पार' को देखा जा सकता है । इस कहानी में पाकिस्तान न गए एक प्रतिभाशाली, संवेदनशील मुसलमान युवक, रेहान के मानसिक संत्रास और मौन को अभिव्यक्ति दी गई है । जिसके दिल में एक पड़ोसी का यह जुम्ला नश्तर चुभो जाता है- "रहते हैं हिंदुस्तान में, मगर सपने देखते हैं पाकिस्तान के, दिल चाहा पटक-पटककर........पूछें-मंदिर की मूर्तियाँ डॉलर और पौंड के लालच में कौन बेचता है ?.......सब उसे पागल दीवाने कहते हैं । कोई नहीं पकड़ता उन गद्दारों को जो शराफत का लिबास पहनकर दूसरों पर कीचड़ उछालते हैं ।"[12]

साठ और पैंसठ के बीच का समय ही वह काल था । जब महिला कहानीकारों ने स्त्री की अस्मिता उसकी पहचान के लिए संघर्ष किया । पहले की कहानियों ने जहाँ स्त्री अब तक हाशिए पर थी इस दौर में वह कहानी के केंद्र में आई । महिला कहानीकारों ने व्यापक स्तर पर नारी मन की पीड़ा और दुख,दर्द को अपनी कहानियों में स्थान दिया । ऐसा करने वाली लेखिकाओं में उषा प्रियंवदा (आश्रिता, मान और हठ), मन्नू भंडारी(घुटन), कृष्णा सोबती(यारों के यार), कृष्ण अग्निहोत्री (ऑक्टोपस, क्रांति), सुधा अरोड़ा (घर, साल बादल गया) और अन्विता अग्रवाल (बुखार,लौटकर) आदि प्रमुख है । बाद में ममता कालिया, कुसुम अंसल, अचला शर्मा, महरुन्निसा परवेज, मृणाल पाण्डेय, मंजुल भगत, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, राजी सेठ, मणिका मोहिनी, सूर्यबाला, इंदुबाली और अर्चना वर्मा ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया ।

इसके अतिरिक्त नई कहानी आंदोलन के दौरान ही अनेक ऐसे कहानीकार हुए जिन्होंने ग्रामांचल से जुड़े पात्रों की यथार्थ पीड़ा-दुख सहचर्य शून्यता को अपनी कहानी में व्यक्त किया । उदाहरण के तौर पर फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'तीसरी कसम' को लिया जा सकता है । इसमें एक ग्रामीण पात्र की अव्यक्त प्रेम की टीस बड़े प्रभाव पूर्ण ढंग से व्यंजित होती है । इस परंपरा को बाद में मार्कण्डेय, शिव प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र और शैलेश मटियानी सरीखे लेखकों ने अपनी कहानियों के माध्यम से विकसित किया ।

सन साठ तक आते-आते नई कहानी रूढ़ साँचों में ढलने लगी थी । इसलिए इस दशक में कुछ नए कहानी आंदोलनों का अभ्युदय हुआ जैसे-अकहानी और सचेतन कहानी आदि । कहानीकारों ने अपनी कहानियों में भावात्मक संबंधों की विसंगति, विडंबना, जटिलता, तनाव और त्रास को प्राथमिकता दी । ज्ञानरंजन की 'पिता' महीप सिंह की 'सीधी रेखाओं का वृत्त', वेद रही की 'दरार' और सांत्वना निगम की 'अंधे दायरे' ऐसी ही कहानियाँ थी । इसके अतिरिक्त काशीनाथ सिंह की "चोट और सुबह का डर', विजय मोहन सिंह की 'ऋषि', श्रवण कुमार की 'असमर्थ' जैसी कहानियों में पात्रों के अंतर्मन की व्याकुलता और छटपटाहट का चित्रण किया गया है ।

सातवें दशक में कमलेश्वर ने एक नए कहानी आंदोलन "समांतर कहानी" का बिगुल फूंका । हालाँकि इस आंदोलन में नवीनता के नाम पर कुछ नहीं था इसमें भी 'नई कहानी', 'सचेतन कहानी' और 'अकहानी' की भांति संबंधों में व्याप्त तनाव, विघटन और जटिलता का सूक्ष्म और अनेक स्तरों पर अहसास कराने वाली कहानियाँ लिखी गई । इस दृष्टि से राम दरश मिश्र की कहानी 'निर्णयों के बीच एक निर्णय' एक महत्वपूर्ण कहानी है इसमें केवल संबंधों का ही नहीं अंतः प्रकृति के विघटन का भी चित्रण हुआ है । इसी प्रकार कृष्ण बलदेव वैद की "सब कुछ नहीं " कहानी में यौन-संबंधों के दौरान पैदा हुई मनोवृत्ति ने पति को अकेला, आत्मपरायणता और पीड़ित बना दिया है । प्रमोद सिन्हा की कहानी "बैठा आदमी" में भी अकेलेपन और निष्क्रियता की स्थिति का चित्रण प्रस्तुत किया गया है । डॉ. रामचन्द्र तिवारी इस आंदोलन के कहानीकारों के विषय में लिखते हैं-"इस आंदोलन से जुड़े हुए रचनाकारों ने जीवन के विभिन्न संदर्भों में आम आदमी के संघर्ष को देखा और उसकी चिंताओं, तकलीफ़ों एवं मजबूरियों को रेखांकित किया । (किंतु) कहना न होगा कि इस आंदोलन को भी व्यापक समर्थन प्राप्त नहीं हुआ । "[13]

आठवाँ दशक हिंदी कहानी का एक और महत्वपूर्ण दशक है । इसमें आपातकाल की एक क्रुद्ध और उच्छृंखल प्रतिक्रिया से लेकर तेलंगाना के किसान आंदोलन और जनता का राजनीतीकरण करने वाली घटनाओं का एक सूत्रीय इतिहास है । अतः आठवें दशक में साहित्य और राजनीति के संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस चली । सामाजिक परिवर्तन के लिए कहानी की भूमिका पर पुराने प्रगतिवादियों से अलग हटकर विचार विमर्श हुआ । यह अनुभव किया गया कि सामाजिक क्रांति से पूर्व जनवादी क्रांति की जरूरत है इसलिए इस परिप्रेक्ष्य से संबद्ध रचनाओं को 'जनवादी कहानी' नाम से अभिहित किया गया । "वैचारिक धरातल पर जनवादी कहानी (आंदोलन) मार्क्सवाद को आधार बनाकर चलती है । इसमे मुख्यता किसानों-मजदूरों, पीड़ितों, दलितों और असहायों का जीवन-संघर्ष चित्रित किया"[14] 'जनवादी कहानी' आंदोलन के प्रमुख लेखकों में उदय प्रकाश, अरुण प्रकाश, अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रदीप मांडव के नाम उल्लेखनीय है । यहाँ ज्ञानरंजन की एक महत्वपूर्ण कहानी 'घंटा' का उल्लेख करना आवश्यक है क्योंकि 'जनवादी कहानी' आंदोलन की प्रवृत्ति की कहानी होने के बाद भी 'घंटा' का वाचक (नायक) व्यवस्था के 'दलाल' कुंदन सरकार से चेतना के स्तर पर जूझता तो है लेकिन उसका आक्रोश और विद्रोह एक दहशत में बदल जाता है और वह यथार्थ की भयंकरता का सामना करने के स्थान पर अंदर ही अंदर फूट पड़ता है ।

इसके अतिरिक्त आज हम दलित चेतना या विमर्श के नाम पर जो कहानियाँ पढ़ रहे हैं, एक आंदोलन के रूप में उसकी नींव भी लगभग इसी दशक में पड़ी । वर्ण व्यवस्था, जातिव्यवस्था और आर्थिक समस्याओं को लेकर दलितों की पीड़ा, दुख-दर्द और भाग्य को केंद्र में रख कर कहानी सृजन करने वालों में ओम प्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, सूराजपाल चौहान, रत्नकुमार सांभरिया, कर्मेन्दु शिशिर, विमल, विपिन बिहारी,प्रहलाद चंद्र दास, श्योराजसिंह बेचैन, सुशीला टाकभौरे और रजतरानी का नाम उल्लेखनीय है । ओम प्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘शव यात्रा’ जहाँ जातीय विभेद के चलते केंद्रीय पात्र की मनःस्थिति और पीड़ा को वाणी प्रदान करती है तो वही सूरजपाल चौहान की कहानी ‘छूत कर दिया’ और ‘टिल्लू का पोता’ ऐसे पात्रों की कहानी है जो हर स्तर पर जातीय टिप्पणी से आहत होते हैं । पहली कहानी का नायक बिहारी लाल तमाम बाधाओं और उपेक्षाओं के बावजूद आई.ए.एस. तो बन जाता है पर जातीय दुर्भावना तब भी उसका पीछा नहीं छोड़ती और गाँव की राम लीला में राम बना पात्र उसे ‘चमार’ कहकर उसके हाथ से तिलक लगाने से मना कर देता है । यह घटना बिहारी लालकेन को अंदर तक हिला देती है । इसी तरह दूसरी कहानी ‘टिल्लू का पोता’ की कमला को गाँव का बूढ़ा किसान जब जातिगत गालियाँ देता हुआ पानी देता है तो वह उसे पानी नहीं जहर कहते हुए ठुकरा भले देती है किंतु किसान द्वारा दी गई गालियाँ उसकी आत्मा को भीतर तक छेद जाती है और वह उसके प्रति घृणा से भर जाती है । मोहनदास नैमिशराय की कहानी ‘मंजूरी’ और विपिन बिहारी की कहानी ‘मुक्का’ भी कुछ ऐसी ही कहानियाँ हैं जिनके पात्र सवर्णों के अत्याचार से पीड़ित और कुंठित हैं जिसकी परिणति बाद में प्रतिशोध के रूप में होती है । दरअसल दलित, समाज का वह वर्ग रहा है जिसे मुख्य धारा के लोग दबाते-कुचलते आए हैं जिससे उनके मन में एक हीनता, निराशा और कुंठा की भावना सदा से बनी रही है और दलित लेखकों ने अपनी कहानी के माध्यम से उनकी इस स्थिति और उसके कारणों को उजागर करने का काम पूरी ईमानदारी से किया है ।

स्पष्ट है कि हिंदी कहानी ने एक लंबी विकास यात्रा तय की है । इस यात्रा में कहानी के साथ-साथ पात्रों की मनः स्थिति भी बदलती रही है । प्रारम्भिक दौर में जहाँ इसका कारण सामाजिक है तो दूसरे और तीसरे दसक में आर्थिक और मनोवैज्ञानिक । इक्कीसवीं सदी तक आते-आते भूमण्डलीकरण और बाजार ने गहराई से व्यक्ति को प्रभावित किया और व्यक्ति उनके संदर्भों में स्वयं को परिभाषित करने के चक्कर में हीनता, निराशा, अवसाद, भय और कुंठा आदि का शिकार होने लगा । यह प्रक्रिया आज भी निरंतर जारी है, केवल संदर्भ बदले हुए हैं और पंकज मित्र, रवि बुले, प्रियदर्शन, कुणाल सिंह, प्रभात रंजन, उमाशंकर चौधरी, जयश्री रॉय, अल्पना मिश्र, नीलाक्षी सिंह, चन्दन पाण्डेय, मनीषा कुलश्रेष्ठ, सत्यनारायण पटेल, गीता चतुर्वेदी, अनिल यादव, वंदना राग, तरुण भटनागर, शशिभूषण द्विवेदी, विमलचंद्र पाण्डेय और कविता आदि ऐसे रचनाकार हैं जो पूरी शिद्दत और रचनात्मकता के साथ इन बदले हुए संदर्भों में व्यक्ति की बदली हुई मनः स्थिति और उसकी मानसिकता को अपनी कहानियों में अभिव्यक्ति दे रहे हैं ।

संदर्भ ग्रंथ:-

1. बिहारी, राकेश. केंद्र में कहानी. शिल्पायन. नई दिल्ली, 2013

2. रंजन, प्रभात. जानकी पुल. ज्ञानपीठ प्रकाशन. नई दिल्ली, 2008

3. योहन्ना, सी. एम., समकालीन हिंदी कहानी:अंतरंग परिचय. लोक भारती प्रकाशन. नई दिल्ली. 2013

4. सं. कमलेश्वर. शताब्दी की कालजयी कहानियाँ. किताब घर प्रकाशन. नई दिल्ली, 2008

5. सिंह, पुष्पपाल. समकालीन कहानी नया परिप्रेक्ष्य. सामयिक प्रकाशन. नई दिल्ली, 2011

6. वर्मा, निर्मल. जलती झाड़ी. राजकमल प्रकाशन. नई दिल्ली, 1965

7. साहनी, भीष्म. हिंदी कहानी संग्रह. साहित्य अकादमी. नई दिल्ली, 2008

8. शर्मा, नासिरा. पत्थर गली. राजकमल प्रकाशन. नई दिल्ली 2002

9. तिवारी, रामचंद्र. हिंदी का गद्य साहित्य. विश्वविद्यालय प्रकाशन. वाराणसी, 2012

[1] बिहारी, राकेश. केंद्र में कहानी. पृ. 41-42


[2] रंजन, प्रभात. जानकीपुल. पृ. 42


[3] योहन्नान,सी.एम., समकालीन हिन्दी कहानी:अंतरंग परिचय. पृ. 45


[4] सं. कमलेश्वर, शताब्दी की कालजयी कहानियाँ. पृ. 35


[5] वही, पृ. 42


[6] सिंह, पुष्पपाल. समकालीन कहानी नया परिप्रेक्ष्य. पृ. 84


[7] वही, पृ. 99


[8] वही, पृ. 87


[9] वर्मा, निर्मल. जलती झाड़ी. पृ. 152


[10] सिंह, पुष्पपाल. समकालीन कहानी नया परिप्रेक्ष्य. पृ. 88


[11] सं. साहनी, भीष्म. हिन्दी कहानी संग्रह. पृ. 114


[12] शर्मा, नासिरा. पत्थर गली. पृ. 31


[13] तिवारी, रामचंद्र. हिंदी का गद्य साहित्य. पृ. 306


[14] वही, पृ. 306

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