“हिंदी ग़ज़ल की रंगत (सफलता) सूफ़ी गलियारे से होकर निकली है एक सत्य”-जुगुल किशोर चौधरी


(एम॰फिल॰ हिंदी)

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

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हिं

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दी ग़ज़ल की परंपरा को शुरू से ही संदेह की नज़र से देखा गया। विद्वानों ने एकमत होकर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं दिया। कुछ विद्वानों का मानना है कि “हिंदी ग़ज़ल सबसे पहले हिंदी में आई और बाद में उर्दू में, कुछ का मानना है कि उर्दू का जन्म मुगलकाल में हुआ और अमीर खुसरो ने तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और चौदहवी सदी के पूर्वार्ध के बीच वाले कालखंड में हिंदी की ग़ज़लें लिखी।”

मूलत:हिंदी कवियों द्वारा रची गई ग़ज़ल को ही हिंदी ग़ज़ल माना जाता है।

हिंदी ग़ज़ल का अभ्युदय और उसका जनक या प्रथम कवि कौन है इस विषय पर शुरू से ही मतभेद रहा है और आज तक इसका निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका और हिंदी ग़ज़ल लिखने की परंपरा का विकास कोई भारतेंदु से मानता है तो कोई अमीर-खुसरो से, तो कोई शमशेर से, आलोचक अपनी-अपनी लोकप्रियता और विद्वता के आधार पर ‘हिंदी ग़ज़ल’ परंपरा का विकास और हिंदी ग़ज़ल का पहला कवि होने का दावा ठोंकते नजर आते हैं। महत्वपूर्ण निष्कर्ष जो हिंदी ग़ज़ल की रंगत को सूफ़ी गलियारे की महक मानते हैं।

डॉ॰ हनुमंत नायडू अमीर खुसरो (१२५५-१३२४) के जीवन-काल से हिंदी ग़ज़ल का उद्भव मानते हैं और महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं- “अमीर खुसरो हिंदी खड़ी बोली के आदि कवि माने जाते हैं। उनका जन्म (मुगलकाल १५२६-१८५८) से बहुत पहले हुआ था। अमीर खुसरो ने ही हिंदी की पहली ग़ज़ल लिखी थी अत: उर्दू ग़ज़ल से बहुत पहले हिंदी की ग़ज़ल लिखी जा चुकी थी।”[1]

डॉ॰ नरेश- “उर्दू-फारसी की यह एक सशक्त काव्य-विधा है जिसे ग़ज़ल कहते हैं, जब यह हिंदी में पदार्पण करती है तब वह उर्दू-फारसी में ही अपने परंपरागत अर्थों, अर्थात स्त्रियों से या स्त्रियों के विषय में बात करना, कब से कब की टूट चुकी होती है और उसने अभिव्यक्ति के अनेकानेक नूतन आयाम तलाश कर लिए होते हैं।”[2]

सभी विद्वानों में अधिकांशत:के मतों में उर्दू ग़ज़ल के प्रभाव से हिंदी में ग़ज़ल का आरंभ माना या फिर फारसी के बाद हिंदी में ग़ज़ल आई। इन्ही दो निष्कर्षों में ‘हिंदी ग़ज़ल’ का उद्भव माना जाता है। हिंदी ग़ज़ल का आगाज़ का परिचय विद्वान इन पंक्तियों से देते हैं-

“जब यार देखा नैन भर, दिल की गयी चिंता उतर,

ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाय कर

जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मोरा जिया,

हल्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर।”[3]

- अमीर खुसरो

सूफी संतों की भारतीय इतिहास में एक अहम भूमिका रही है चाहे वह स्वतंत्रता को लेकर हो या धार्मिक प्रभाव या किसी अन्य पर, ठीक उसी प्रकार ‘हिंदी ग़ज़ल’ के प्रादुर्भाव में इनका अपना अभिन्न योगदान है इन्होनें अपने सूफियाना अंदाज में प्रार्थना करने या रूढ़ियों को दूर करने के लिए, प्रेम के स्वरूप के लिए, संगीतों में फ़ारसी ग़ज़ल के रूप को अपनाया और उसे भारतीयता प्रदान की।

“ज़ हाले मिस्की मकुन तग़ाफुल दुराए नैना बनाए बतियाँ,

कि ताबे हिज़राँ न दारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाए छतियाँ।”[4]

- अमीर खुसरो

इस प्रकार अपने फ़कीरी अंदाज में हिंदी ग़ज़ल का उद्भव हुआ है जिसे सभी विद्वान भले न मानते हो लेकिन इस तथ्य को नकार भी नहीं सकते हैं।

“हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या?

रहे आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या?

जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दर-ब-दर फिरते,

हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या?”[5]

- कबीर

हिंदी में ग़ज़ल लिखने की चाहत सिर्फ हिंदी कवियों में नहीं रही है उर्दू शायरों ने भी हिंदी में ग़ज़ल लिखी और भारतीय संस्कृति और समाज को चित्रित किया है और इस तरह हिंदी में ग़ज़ल अपने आप समय के साथ सबको रंगती चली गई। हिंदी ग़ज़ल की परंपरा बहुत विकासशील है और इसके विकास में उर्दू-हिंदी सभी विद्वानों का योगदान है।

“पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते

सिर्फ सेहत के सहारे जिंदगी कटती नहीं।”[6]

- फिराक गोरखपुरी

‘हिंदी ग़ज़ल’ का जन्म ही समाज में फैली असमानता और वैमनस्यता के कारण हुआ है जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद आदि व्यभिचारों ने इसे और विचार करने को मजबूर किया, ऐसी व्यवस्था को बदलने की शुरुआत सूफ़ी संतो ने की थी। आधुनिकीकरण ने इसे हवा देकर एक अलग दिशा प्रदान की है।

“मुझमे रहते है करोड़ो लोग चुप कैसे रहूँ

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।”

ग़ज़ल ने सिर्फ़ भाषा और विषय का रूपान्तरण किया है लेकिन लहजा उसका अब भी वही है जो उर्दू परंपरा का था। हिंदी ग़ज़ल में पदार्पण करने पर इस पर कोई सिकंजा नहीं कसा गया तब भी आज बहर, रदीफ़, काफ़िया आदि आजादी के वावजूद अच्छी गजलें लिखी जा रही हैं।

शैलेंद्र प्रताप सिंह ग़ज़ल के बारे में कहते हैं- “उर्दू और हिंदी के आपसी संबंध पैदाइशी हैं। दोनों एक ही माँ खड़ी बोली की बेटियाँ हैं। जैसे दो संतानों के चेहरे एक से नहीं होते, लेकिन नस्ल से दोनों इंसान होते हैं, ठीक वैसे ही एक बोली से जन्मी इन दो भाषाओं के चेहरे, यानी लिपियाँ भिन्न हैं। लेकिन दोनों की वाक्य रचना, व्याकरण और बोलचाल के मुहावरे एक से हैं। दोनों के कवियों में शिल्प के आदान-प्रदान से सांस्कृतिक समन्वय के सूत्रों का विकास हुआ है।...ग़ज़ल की विकासशील परंपरा में इस सांस्कृतिक समन्वय की झांकी देखी जा सकती है। पहले-पहल हिंदी कविता उर्दू बहर में अमीर खुसरो के समय से लिखी गई थी।[7]

हिंदी ग़ज़ल’ समय की पेचीदगी को, भारतीय राजनीति के खोखलेपन और आम आदमी की तकलीफ को समझा और जमाने भर की उठापटक समकालीन ग़ज़लकारों ने अपनी समझ व्यक्त की है। अब ग़ज़ल सिर्फ हुश्नो बुलबुल की कथा नहीं जन-जीवन की प्रेरणा और जीवन की दुर्दशा को भी व्यक्त करने के लायक बनी। स्पष्टत: हिंदी ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल को ‘ऊह; आह; की दिशा से निकाल कर जीवन की ‘खनक से ठनक’ तक ला खड़ा किया है।

“मेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।”[8]

- दुष्यंत कुमार

हिंदी ग़ज़ल को आज अपनाने की फेहरिस्त में उर्दू के विद्वानों की संख्या कम नहीं है यह हिंदी ग़ज़ल की ख्याति का एक कारण है क्योंकि दूसरे साहित्य का विशेषज्ञ या दूसरी भाषा का विशेषज्ञ जब दूसरे साहित्य का पक्ष लेता है तो वह उस विधा या परंपरा को प्रबल बनाता है।

हिंदी ग़ज़ल फारसी की देन है या नहीं ये स्पष्ट रूप से आलोचक और समीक्षक ही इसका मूल्यांकन कर सकते हैं लेकिन हिंदी ग़ज़ल की महक सूफ़ी बगीचे से होकर ही निकली है इसमें कोई संदेह नहीं है। हिंदी ग़ज़ल में सूफ़ी अनुवांसिकता का गुण मौजूद है और हमेसा रहेगा।

“रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी।

जिसने जिस्म गिरवी रखके ये कीमत चुकाई है।”[9]

- अदम गोंडवी

निष्कर्षत: हिंदी ग़ज़ल सूफ़ी गलियारे की खुशबू है जो आज हिंदी साहित्य जगत को अपनी तीक्ष्णता और विषय वैविध्य से परिचित करवाती नज़र आ रही है।

संदर्भित ग्रंथ-

१. विवेक, ज्ञान प्रकाश. (२०१२). हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा. हरियाणा : हरियाणा ग्रंथ अकादमी, पंचकूला.

२. डॉ. नरेश. (२००४). हिंदी ग़ज़ल – दशा और दिशा. दिल्ली : वाणी प्रकाशन, २१-ए, नई दिल्ली-११००२.

३. मुजावर, सरदार. (२०१४). हिंदी ग़ज़ल का वर्तमान दशक. दिल्ली : वाणी प्रकाशन, २१-ए, नई दिल्ली-११००२.

४. अंका, रामनारायण स्वामी. (२००५). समकालीनता और हिंदी ग़ज़ल. दिल्ली : नवचेतन प्रकाशन, जी-५, गली न. १६, राजपुरी उत्तमनगर, दिल्ली – ११००५९.

५. कुमार, दुष्यंत. (२०१४). साये में धूप. दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड ७/३१, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – ११०००२.

६. बेचैन, कुँअर. (१९८३) शामियाने काँच के. गाजियाबाद : प्रगीत प्रकाशन, २ एफ-५१नहरुनगर, गाज़ियाबाद (उ॰प्र॰).

७. गोंडवी, अदम. (२०१४). समय से मुठभेड़. दिल्ली : वाणी प्रकाशन, २१-ए, नई दिल्ली-११००२.

८. कालिया, रवीन्द्र. नया ज्ञानोदय, जनवरी २०१३, अंक ११९.

[1] सरदार मुजावर, हिंदी ग़ज़ल ग़ज़लकारों की नज़र में, (दिल्ली ; वाणी प्रकाशन, २००१), पृ॰स॰ ६३.


[2] डॉ॰ नरेश, हिंदी गज़ल: दशा और दिशा, (दिल्ली ; वाणी प्रकाशन, २००४), पृ॰स॰ १५.


[3] स॰ रवीन्द्र कालिया, नया ज्ञानोदय, जनवरी २०१३, अंक ११९, पृ.स. १२.


[4] रामनारायण स्वामी ‘अंका’, समकालीनता और हिंदी ग़ज़ल, (दिल्ली ; नवचेतन प्रकाशन, २००५), पृ.स. २५.


[5] स॰ रवीन्द्र कालिया, नया ज्ञानोदय, जनवरी २०१३, अंक ११९, पृ.स. १३०.


[6] कुँअर बेचैन, शामियाने काँच के, (गाजियाबाद ; प्रगीत प्रकाशन, 1983), पृ॰स॰ २४.


[7] शैलेंद्र प्रताप सिंह, बज़्म-ए-सुख़न, (दिल्ली ; अनामिका प्रकाशन, २००३), पृ॰स॰ १६४.


[8] दुष्यंत कुमार, साये में धूप, (नई दिल्ली ; राधाकृष्ण प्रकाशन, २०१४), पृ.स. ३०.


[9] अदम गोंडवी, समय से मुठभेड़, (दिल्ली ; वाणी प्रकाशन, २०१४), पृ.स. ६४.

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