हिन्दी साहित्य – संवेदना का वैश्विक परिदृश् : संदर्भ अभिमन्यु अनत डॉ. धनंजय कुमार साव


“मैं अँग्रेजी और फ्रेंच बोल लेता हूँ, क्योंकि स्कूल में सीखा है उन्हें, पर में किसी भी दूसरी भाषा में लिख नहीं सकता हिन्दी के सिवाय | बोलना तो आदमी हर भाषा में कर सकता है, लेकिन सृजन धमनियों में दौड़ने वाली भाषा में ही हो सकता है |”(अभिमन्यु अनत, साभार समकालीन भारतीय साहित्य, जनवरी –फरवरी 2014)

आज हिन्दी भाषा और साहित्य की एक वैश्विक पहचान है | इसी वैश्विक पहचान के अंतर्गत आज मॉरिशस का हिन्दी साहित्य लेखन लोकप्रिय हुआ है | इसके लिए कई लोगों ने अपना योगदान दिया है | प्रो. वासुदेव विष्णुदयाल, जयनारायण राय, ब्रजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’, मोहनलाल मोहित, सोमदत्त बखोरी आदि | इनमें अभिमन्यु अनत एक प्रमुख नाम हैं | अभिमन्यु अनत ने हिन्दी भाषा और साहित्य के संवेदनात्मक फ़लक के विस्तार में उल्लेखनीय भूमिका अदा की है | आज मॉरिशस का हिन्दी साहित्य उनके नाम से परिचित है | दूसरे शब्दो में कहा जाय तो आज मॉरिशस का हिन्दी साहित्य लेखन अभिमन्यु अनत युग के नाम से जाना पहचाना जाता है |

मॉरिशस में रहते हुए हिन्दी भाषा में निरंतर साहित्य सृजन, अभिमन्यु अनत का हिन्दी भाषा के साथ उनके अंतरंग संबंध को ज़ाहिर करता है | अभिमन्यु अनत ने हिन्दी भाषा और साहित्य के माध्यम से भारत और मॉरिशस के साहित्यिक – सांस्कृतिक सम्बन्धों को नयी परिभाषा दी है | दो देशो को करीब लाया है | अभिमन्यु अनत का साहित्यिक अवदान किसी भी भाषा और साहित्य प्रेमी – सेवी के अंतर्गत अपनी भाषा – संस्कृति की रक्षा; उसके नए क्षितिज के विस्तार करने की भावना को संबल प्रदान करता है | साहित्य की विभिन्न विधाओं पर उनका निरंतर लेखन आज उन्हें हिन्दी लेखकों में एक अलग पहचान प्रदान किया है | उनकी लगभग 75 कृतियाँ प्राकाशित हुई हैं | उनके अभी तक 32 उपन्यास, 7 कहानी – संग्रह, 5 नाटक, 4 कविता संग्रह, 3 जीवनी, 1 आत्मकथा, 1 अनुवाद, 1 सहलेखन, 4 प्रतिनिधि संकलन तथा कुछ सम्पादन से जुड़ी हुई पुस्तकें प्रकाशित हुए हैं|

हालांकि साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर उनकी लेखनी चली है तथापि उनकी मुख्य पहचान उनके कथाकार रूप से बनी है | कथा के सभी रूप- उपन्यास, कहानी, लघुकथा आदि में उनकी अभिव्यक्ति हुई है| चार दशक से भी कुछ अधिक की समयावधि में, उनके 32 उपन्यास, 7 कहानी - संग्रह तथा 1 लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुए हैं | अभिमन्यु अनत ने मॉरिशस के प्रवासी भारतियों के जीवन, दुख: – दर्द से संवेदित होने वाले एक उपन्यासकर के रूप में अपनी सार्थक पहचान बनाई है |

कहने को मॉरिशस में आए प्रवासी भारतियों को आए हुए आज 150 साल से ज्यादा हो गए हैं| पर आज भी वहाँ के इतिहास में इन लोगों के दुख: - दर्द को कोई जगह नहीं मिली है | अपने एक आलेख में, अभिमन्यु अनत इसका जिक्र करते हैं “मॉरिशस में प्रवासी भारतियों के आगमन, उनके संघर्ष, उनकी यतनाओं, दारुण दंडों की कहीं कोई चर्चा नहीं मिलती | हमारे इतिहासकारों ने पूँजीपतियों के द्वारा लिखाये गए इतिहास उनके द्वारा संगृहीत जानकारियों को ही सही इतिहास मानकर आज तक उसी ऐतिहासिक झूठ को दोहराया है | हमारा इतिहास खरीदे हुए पन्नों का इतिहास है |”1(अनत, अभिमन्यु : गूंगा इतिहास(आलेख) साभार, समकालीन भारतीय साहित्य,अंक 171 जनवरी –फरवरी 2014 ) अभिमन्यु अनत के रचनातमाक लेखन में इस दर्द का एहसास किया जा सकता है | उन्होंने इसी दर्द भरे अतीत को अपने त्रिखंडी उपन्यास में जीवंत करने का सार्थक प्रयास किया है | ये तीन उपन्यास क्रमशः इस प्रकार हैं – ‘ लाल पसीना’ (1977), ‘गांधी जी बोले थे’ (1984) तथा और ‘पसीना बहता रहा’ (1984)| दरअसल ये तीनों उपन्यास एक साथ पढ़ने पर इस बात से अवगत हुआ जा सकता है कि प्रवासी भारतियों के दुख: - दर्द के ऐतिहासिक सच की कथा को आगे बढ़ाते हुए अभिमन्यु अनत का कथाकार इसे एक महाकाव्यात्मक रूप दिया है | ‘लाल पसीना’ भारतीय अस्मिता, मानव – अधिकारों तथा स्वतन्त्रता के लिए मजदूरों के संघर्ष का इतिहास है | इसी सिलसिले को आगे के उपन्यासों में भी बढ़ाया गया है |

देखा जाय तो दलित, उत्पीड़ित और वंचित- उपेक्षित भारतीय प्रवासी मजदूरों के सच को सिद्दत से महसूस करने वाला यह कलाकार किसी भी तरह अपनी रचनाओं में इस संवेदनात्मक सच को अभिव्यक्त करने की एक ज़िद लिए हुए नज़र आता है | जिसका प्रमाण उनका यह निम्न उद्गार है- “मॉरिशस में भारतीय मजदूरों की स्थिति इतनी दयनीय थी कि उनके द्वारा हस्तलिखित दस्तावेज़ों को भी पा सकना आज दुश्वार है, उनकी हर चीज़ को नष्ट – भ्रष्ट कर छोड़ना उस वक़्त का कानून था | लाल पसीना, गांधी जी बोले थे और गूंगा इतिहास लिखते समय मैंने वृद्धाओं से बात करके इन सारी अनकही सच्चाईयों को जुटाया ….|”2(यथोपरि पृ. 72 ) कहने की जरूरत नहीं है कि उनकी इस रचनात्मक संवेदना को न सिर्फ उनकी कथाओं में, बल्कि उनकी कविताओं में भी साक्ष्य होते हुए देखा जा सकता है |

उल्लेखनीय है कि काव्य – क्षेत्र में अभिमन्यु अनत के आगमन से पहले मॉरिशस में हिन्दी कविताओं का एक संसार विद्यमान था | लगभग 62 कविता – संग्रह प्रकाशित हो चुके थे | उनका पहला काव्य संग्रह ‘नागफनी में उलझी सांसें’ सन 1977 में प्रकाशित हुआ था | इसके उपरांत क्रमश: ‘कैक्टस के दाँत’(1982), ‘एक डायरी बयान”(1987) तथा ‘गुलमोहर खौल उठा’(1994) आदि काव्य – संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं | उनके इन काव्य –संग्रह में मॉरिशस का अतीत, वर्तमान और भविष्य अपनी एक अविछिन्नता में मौजूद हैं | यहाँ भी भारतीय प्रवासी जीवन के के दुख:- दर्द का विम्ब सहज देखने को मिलता है | इन कविताओं में एक तरफ प्रवासी भारतीय मजदूरों के साथ हुए अमानवीय बर्ताव का साक्ष्य है, तो दूसरी तरफ इन लोगों की अपनी भाषा- संस्कृति, मूल्य और धर्म – भावना के साथ जीने की, लड़ने की, ऊपर उठने की अदम्य जिजीविषा भी अंकित है | यहाँ भी अभिमन्यु अनत का कवि अपने देश के इतिहास में प्रवासी भारतीय मजदूरों के साथ जुड़े यातनामय सच को झुठलाए जाने से चिंतित नज़र आता है | यह चिंता ही काव्य –स्वर बनती है | कवि अनत अपनी कविताओं में सदैव मानवीय मूल्यों की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध नज़र आता है |

यहाँ उनकी कुछ कविताओं के जरिये उनके उक्त काव्यात्मक मिजाज को पढ़ा जा सकता है | सबसे पहले, उनकी ‘वह अनजान आदमी’ कविता का उल्लेख किया जा सकता है | इस कविता में भारतीय प्रवासी मजदूर के रूप में उस गिरमिटिया की व्यथा – कथा को स्वर दिया गया है जिसे इतिहास ने झुठलाया है | पर यह दर्द इस कवि के जेहन में है, क्योंकि उसने इसे साक्षात किया है | छिपकर उनकी खामोशी को सुना है जिसे रौंदने, कुचलने का उपक्रम हुआ था - “ देश के अंधे इतिहास ने न तो उसको देखा / न तो गूंगे इतिहास ने/ कभी सुनाई उसकी पूरी कहानी हमें /न ही बहरे इतिहास ने सुना था उसके चीत्कारों को / जिसकी इस माटी पर बही थी पहली बूंद पसीने की / जिसने चट्टानों के बीच हरियाली उगाई थी / नंगी पीठ पर सह कर बाँसों की बौछार / बहा बहकर लाल पसीना / वह पहला गिरमिटिया इस माटी का बेटा / जो मेरा भी अपना था तेरा भी अपना |”3 (अनत, अभिमन्यु ‘वह अनजान आदमी’ www.kavitakosh )

यहाँ साफ देखा जा सकता है कि मॉरिशस का वह अतीत जिसे दर्ज करने की गुरेज इतिहास को नहीं रही, उसे ही अपनी कविता में अभिमन्यु अनत ने जगह दी है | दरअसल, अभिमन्यु अनत का कवि यह साफ समझता है कि पूंजीवादी शक्तियाँ हरदम यह प्रयास करती हैं कि मेहनतकश वर्ग की उपेक्षा हो, तभी उसका किला सुरक्षित रह सकता है | उनके निम्न मन्तव्य में भी इस सत्य का उदघाटन होता है “ मॉरिशस के इतिहास की त्रासदी तो यह रही है की आज भी स्वतंत्र देश को इतिहास के उस सत्य को स्वीकार करने में झिझक होती है | जिससे उस समय के पूंजीपति और शक्कर कोठियों के काले कारनामे सामने आ जाते हैं |”4 अनत, अभिमन्यु :गूंगा इतिहास (आलेख) साभार, समकालीन भारतीय साहित्य अंक 171, जनवरी- फरवरी 2014

यह एक अकाट्य सच है कि अभिमन्यु अनत का कवि अपने ही देश में उपेक्षित प्रवासी भारतियों लिए धड़कता है | वह इन लोगों की तरफ से ही उन इतिहासकारों से सवाल करता है, उन्हें चुनौती देता है, जो अतीत के दमनपूर्ण इतिहास को अब तलक भुलाए बैठे हैं | यहाँ उनकी ‘कोरी हथेली’ कविता की निम्न पंक्तियाँ देखने लायक हैं - “जिनके कारण मेरी पत्नी, मेरे बच्चे / सभी भूखे हैं, अधनंगे हैं / इतिहासकार अगर कोई है/ तो लिख जाय इतिहास को अब/ मेरी इस सपाट कोरी हथेली पर |”5साभार, समकालीन भारतीय साहित्य, अंक 171, जनवरी- फरवरी 2014

अभिमन्यु अनत की कविता में मॉरिशस का वर्तमान भी जीवंत होता है| वर्तमान का वह परिदृश्य, जहाँ पूंजीवादी शक्तियों ने पैसों को सर्वोपरि बना दिया है | इस पैसे के आगे मानव -मानवीय संवेदना छोटी पड़ गई है | ऐसे माहौल में हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह स्वाभाविक है- एक गरीब की मौत के साथ मानवता की मौत का एहसास करना | कवि इस बात को अपनी कविता ‘निशुल्क मौत’ में एक गरीब बुढ़िया की संवेदना के जरिये रखता है “पैंतीस गरीब रोगी का इंतज़ार करते रहे / बाईस मील की दूरी से पहुंची / साढ़े सात घंटों से प्रतीक्षा करती रही वह बुढ़िया / लड़की की सख्ती पर लुढ़क गयी / सरकारी अस्पताल में /.../ और ऐसा तो कई बार हो जाता है / अस्पताल के बाहर कुत्ते मरते रहते हैं / आदमी तो अस्पताल के भीतर मरते हैं |”6 साभार, अनत, अभिमन्यु www.kavitakosh स्पष्ट है कि कविता की यह सीधी सपाट अंतिम पंक्तियाँ कितनी मार्मिक और व्यंजनापरक हैं |

अपने समय - समाज के दबे पिछड़े लोगों की तरफ से अभिमन्यु अनत का कवि बार- बार अपना स्वर बुलंद करता है | उनके खिलाफ, जो गरीब तबके की आशा, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को उपेक्षा मे बदलने की प्रक्रिया में सतत् लिप्त रहता है | इसी कारण वह अपनी कविता ‘इश्तहारों के वायदे’ में क्षुब्ध नज़र आता है - “तुम्हारे पास पूलिस है हथकड़िया हैं / लोहे की सलाखें वाली चारदीवारी है/ मुझे गिरफ्तार करके चढ़ा दो सूली/ उसी माला को रस्सी बनाकर/ जो कभी तुम्हें पहनाया था .../ मैं इन इश्तहारों को / अब नहीं सह पा रहा हूँ |”7 (यथोपरि ) स्पष्ट है कि कवि उन शक्तियों की खिलाफत करता है, जो लोगों के जीवन में प्रकाश लाने की बजाय अंधेरे को घना करने पर आमादा रहते हैं | अपनी कविता ‘दोपहर की रात’ में कवि की ये पंक्तियाँ इस बात की ओर ही इशारा करती हैं - “ उजाले के गल गए तन पर /काला कुत्ता जीभ लपलपाता रहा / गंधलाती रही सूरज की लाश / काली चादर के भीतर / अंधे दूल्हे ने काजल से / भर दी मांग दुल्हन की / यहाँ दोपहर में रात हो गयी |”8 (यथोपरि )

अभिमन्यु अनत की कविताओं में देश की मिट्टी, उससे जुड़े लोगों का दुख: - दर्द, उसके अस्मिता - स्वाभिमान का स्वर बार- बार उठता है | आम जनता के दुख: - दर्द से ही कवि की संबद्धत्ता- आबद्धता - प्रतिबद्धता है| इसलिए, वह जनविरोधी ताकतों की भर्त्सना करता है, उसे चुनौती देता है | अपनी एक कविता ‘ अनफूला कैक्टस’ में कवि साफ शब्दों में कहता है कि “ ... मेरी कोठरी का उजाला / तुम्हारी मुट्ठी में क्यों बंद है ?/ मेरी –मुट्ठी के कैक्टस में / फूल क्यों नहीं आया ?”9( साभार, समकालीन भारतीय साहित्य, अंक 171, जनवारी- फरवरी 2014)

कवि की यह दिली संवेदना है कि मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर आदमीयत को पहचाने | क्योंकि, समय का बाजारवादी मूल्य मनुष्य की प्रतिभा के साथ उसकी आदमीयत को ही निगल जाने पर तुला है | अपनी कविता ‘प्रतिभा बौनी है’ में वे इस सच की ओर इशारा करते हैं “ यहाँ आदमी के पावों में ऊंची एड़ी के जूते हैं / चाहे आदमीयत घुटने टेक चुकी है .../ यहा आदमी के पावों में ऊंची एड़ी के जूते हैं / सिर पर पगड़ी का फैशन लद चुका है / विश्व मंडी की मुद्राओं की तरह / कुछ मूल्यों का भाव गिर गया है / छतनार के नीचे कुकुरमुत्ते उग आए हैं |”10(यथोपरि)

कवि अपनी कविताओं के जरिये अंततः इस बात को रखता है कि यह जो तमाम युद्ध, मार- काट, विद्वेष और घृणा का समय है, उसमें हारती मानवीयता ही है | इसलिए मानव को नए क्षितिज की तलाश पहले स्वयं के भीतर से शुरू करनी होगी | विकास, विस्तार और वर्चस्व की आँधी में, जो मेहनतकश तबका है, वह तो जैसे ठहर- सा गया है | जिसके पसीने की बूंदों से चारों ओर जो हरियाली दिखाई देती है, वह कहाँ हैं, जरा इस पर भी ठहरकर सोचने की जरूरत है | अपनी एक कविता ‘तलाश’ में वे इस बात का जिक्र करते है- “ बेचकर मेहनत सारी जिसने कीमत नहीं पायी / अपने पसीने की बूंदों की / .../ हर नए पौधे में उसकी हाज़िरी है / खेतों की कडकती धूप में / दी थी मौत को चुनौती / वह जो इतिहास की प्रथम घड़ी से चलकर / आज भी वही है ...|”11(यथोपरि) स्पष्ट है कि कविता की ये पंक्तियाँ अभिमन्यु अनत के उस कवि को हमारे समक्ष पेश करती हैं जो कविता मे श्रम और सृजन को महत्व प्रदान करता है |

समग्रत: यह कहा जा सकता है कि अभिमन्यु अनत की , काव्य- संवेदना में अपने देश की मिट्टी, इस मिट्टी से जुड़े मेहनतकश लोगों के प्रति असीम प्यार है | उनका यही प्यार उनकी काव्य – पंक्तियों में उमड़ता है, जब देश का इतिहास अपनी ही सरज़मी के मेहनतकशों की यातनाओं, संघर्षों और जिजीविषा को तवज्जो नहीं देता है | जब उनकी भाषा, संस्कृति और आस्था -मूल्य को कमतर सिद्ध किए जाने का प्रयास होता है, उसे खारिज किया जाता है | यही नहीं, अभिमन्यु अनत की समूची साहित्यिक संवेदना में, चाहे वह पद्य हो या गद्य, देश - समाज की जनविरोधी शक्तियों को निरस्त करने की सदिच्छा मिलती है| और वहाँ, वह निष्ठा मिलती है, जो मनुष्य में उसकी आदमीयत को बचाए रखने, उसे ज़िंदा बनाए रखने की मूल्य – चेतना से ओतप्रोत होती है |

सारत: कहा जाय तो अभिमन्यु अनत का कवि – साहित्यकार अपने भाषा- प्रेम को जगाए हुए, अनवरत साहित्यिक सृजन के माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य - संवेदना के नए क्षितिज के विस्तार में लगा हुआ है | उनका यह जज़्बा किसी भी जन संस्कृति -कर्मी को भी अपनी मातृभाषा और उसके साहित्य की नयी दिशाओं को तलाशने की ओर मोड़ता है | कहने की जरूरत नहीं है कि अपनी भाषा के प्रति सच्चा लगाव ही व्यक्ति में साहित्य- संवेदना को और सृजनात्मक साहित्यिक- संवेदना ही व्यक्ति में अपने देश के प्रति सच्चे प्रेम को विकसित करता है |

अंत में, अभिमन्यु अनत के इस वाक्य से इस सम्पूर्ण विवेचन- विश्लेषण को विराम देना समीचीन प्रतीत होता है - “यहाँ इतना कहना चाहता हूँ की जिस तरह शोषित वर्ग की कहानी मेरी रचना है, उसी तरह गरीबों की भाषा हिन्दी को मैंने साहित्य की भाषा बनाया है | डेढ़ सौ साल पहले ऐतिहासिक ज़ुल्मों के बीच हिन्दी शोषित वर्ग की भाषा थी| आज बहिष्कृत भाषा है, इसलिए अब और अधिक मानना मेरे लिए अनिवार्य हो जाता है |”12( यथोपरि )

डॉ.धनंजय कुमार साव

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग

कालियागंज कॉलेज, उत्तर दिनाजपुर, पश्चिम बंगाल

पिन. 733129 मो. 09474439158

email –shawdhananjay10@gmail.com

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