ग़ज़लकार के रूप में त्रिलोचन:आज़र ख़ान


शोधार्थी, हिंदी विभाग

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

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‘ग़ज़ल’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- ‘औरतों से बातें करना’ या ‘औरतों की बातें करना’। इसे ग़ज़ल नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि इसका विषय ‘हुस्न’ और ‘इश्क़’ होता है। लेकिन समय के साथ-साथ इसमें विस्तार होता गया और आज ग़ज़ल में हर तरह के भावों को व्यक्त करने की गुंजाइश है। यही कारण है कि प्रोo रशीद अहमद सिद्दीकी ने ग़ज़ल को ‘उर्दू शायरी की आबरू’ कहा है। ग़ज़ल की प्रत्येक पंक्ति एक ही वज़न और एक ही बहर में होती है। ग़ज़ल की पहली पंक्ति ‘मतला’ और आखिरी पंक्ति, जिसमें शायर या कवि अपना तखल्लुस (उपनाम) देता है, ‘मक़ता’ कहलाती है। ग़ज़ल की शुरुआत सबसे पहले अरब में हुई, फिर वहां से ईरान पहुंची और फ़ारसी में इसने बहुत तरक्की की उसके बाद फ़ारसी साहित्य से उर्दू साहित्य में दाखिल हुई और इसने सबसे ज़्यादा तरक्की उर्दू साहित्य में की। बाद में हिंदी साहित्य में ग़ज़ल को ज्यों का त्यों अपना लिया गया। आज कवि सम्मेलनों में जिस चीज़ की सबसे अधिक मांग है, वो है ग़ज़ल। ग़ज़ल के माध्यम से कवि अपने आतंरिक भावों को व्यक्त करता है, पढ़ने और सुननेवालों को इसमें उनकी खुद की दास्तान नज़र आती है।

हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा के सशक्त कवि त्रिलोचन जी ने ग़ज़ल को आम आदमी से जोड़ा। उनकी ग़ज़लों का एक मात्र संकलन ‘गुलाब और बुलबुल’ पहली बार नवम्बर 1956 में प्रकाशित हुआ, जो उनके काव्य संग्रह ‘धरती’ के प्रकाशन के ग्यारह वर्ष बाद और सॉनेट संकलन ‘दिगंत’ के एक वर्ष पहले प्रकाशित हुआ था। इसमें 1955-56 लिखी ग़ज़लें और रुबाइयाँ संकलित हैं। ‘गुलाब और बुलबुल’ के पहले हिंदी में ग़ज़ल-संग्रह शमशेर बहादुर सिंह का मिलता है, इनके अतिरिक्त और किसी हिंदी कवि का ग़ज़ल-संग्रह ‘गुलाब और बुलबुल’ से पहले नहीं मिलता। उर्दू के प्रसिद्ध शायर मज़हर इमाम ने यह माना है कि “त्रिलोचन शास्त्री की ग़ज़लें बहुत ऊँची न सही, लेकिन एक मेयार को ज़रूर बरकरार रखती हैं। हो सकता है, उर्दूवालों को इन ग़ज़लों में कोई ताज़गी और नयापन न महसूस हो, लेकिन हिंदी को उर्दू-ग़ज़लों की नरमी, लताफत और नफासत का थोड़ा-बहुत अहसास दिलाने में त्रिलोचन शास्त्री ज़रूर कामयाब रहे हैं।”1 इस संग्रह में भी ज़मीन ‘धरती’ की तरह मानव-जीवन की आस्था और विश्वास की है। ‘गुलाब और बुलबुल’ तक आते-आते त्रिलोचन जी के पाँव इतने जम गए कि उन्हें जीवन के अनुभवों के एक बहुत बड़े अंश को समेटने और सँभालने का साहस हो गया। ‘गुलाब और बुलबुल’ में त्रिलोचन के दृष्टिकोण की ओर आंशिक संकेत भी है। प्रगतिवादी कवियों में सौंदर्यवादी रुझान उनमें सबसे अधिक है। “त्रिलोचन की कविता जीवन में संघर्ष की प्रेरणा देने से कहीं ज़्यादा हमें जीवन के सौंदर्य का बोध कराती है। यह सौंदर्य उनके लिए केवल प्रेम तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे अस्तित्व में है। इस अस्तित्व का कोई सूक्ष्म आध्यात्मिक धरातल नहीं है। उसका धरातल उन सामान्य प्रयत्नों और अनुभूतियों का है जो हमारे जीवन के यथार्थ परिवेश की उपज है।”2

त्रिलोचन जी की प्रगतिशीलता इसमें है कि वे उन प्रयत्नों और अनुभूतियों को स्वस्थ रूप में ग्रहण करते हैं। इसीलिए उनके प्रेम का दर्द भी आत्मदाह या क्षय की ओर नहीं ले जाता। उनके प्रेम का दर्द हमें दूसरे से जोड़ता है, हमारी आत्मा को प्रसार देता है। कुछ ऐसे ही दर्द को त्रिलोचन जी ने अपनी ग़ज़लों में व्यक्त किया है जो हमें दूसरे से जोड़ता है-

“दर्द जो आया तो दिल में उसे जगह दे दी,

आके जो बैठ गया मुझसे उठाया गया।”3

ग़ज़लों की परंपरा के अनुसार, ‘गुलाब और बुलबुल’ की ग़ज़लें आत्म-व्यंजक हैं। लेकिन उनके बीच झांकता हुआ व्यक्तित्व दर्द का ही नहीं, स्वाभिमान और मस्ती का भी है-

“बिस्तरा है चारपाई है।

ज़िन्दगी हमने खूब पाई है।

ठोकरें दर- ब-दर की थीं, हम थे,

कम नहीं हमने मुह की खाई है।”4

त्रिलोचन जी को जिस समृद्ध और सुखी जीवन की आशा थी, वह उन्हें नहीं मिला। इसे वह कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं-

“क्या करूँ झोली अगर खाली की खाली ही रही,

अपने बस की बात है फेरी, लगा देता हूँ मैं।”5

त्रिलोचन जी ने अपनी ग़ज़लों में उतना ही कहा जितना उनका सच था। उन्होंने जो अनुभव किया उसी को व्यक्त किया-

“यह नहीं है वह नहीं है यह कहा ही जायेगा

जानता हूँ खूब क्या देना है क्या देता हूँ मैं।”6

लेकिन यह सच किसी सिकुड़े या सिमटे अहं का नहीं है और न यह कम समय के लिए है। वह जीवन की निरंतर चलनेवाली धारा का सत्य है, इसलिए व्यक्तिगत होकर भी वह समाज का है, समाज के हित का है-

“रंग कुछ ऐसा रहा और मौज कुछ ऐसी रही,

आपबीती भी वह मेरी वह समझे कोई वाद था”7

‘गुलाब और बुलबुल’ की प्रणय-सम्बन्धी ग़ज़लों में विरह के चित्र यत्र-तत्र प्रस्तुत हैं, लेकिन उनमें भी आशा की किरण स्पष्ट झलकती है। इस संग्रह की ग़ज़लों की यही विशेषता है कि ग़ज़ल की शैली में रचे जाने के बावजूद उनकी आत्मा भारतीय ही है और उसका सम्बन्ध हिंदी से ही है। इन ग़ज़लों में कहीं-कहीं पर कवि ने प्रणय के, व्यंग्य एवं व्यक्तिगत अनुभूतियों के चित्र भी प्रस्तुत किये हैं। त्रिलोचन जी ने ग़ज़ल की अनेक परम्पराओं को ग्रहण करते हुए भी उसे आधुनिक जीवन का माध्यम बनाया। उर्दू की तरह उच्चारण की सुविधा के लिए हृस्व को दीर्घ और दीर्घ को हृस्व करने की प्रवृत्ति से शायद कुछ पाठकों को शिकायत हो, लेकिन छंद और लय में मुक्ति और उदारता की इन संभावनाओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

संदर्भ-

1. कवि त्रिलोचन, अजीत प्रियदर्शी, प्रथम संस्करण 2012, साहित्य भण्डार प्रकाशन, इलाहाबाद, पृo 52-53

2. त्रिलोचन के बारे में, संकलन एवं संपादन-गोबिंद प्रसाद, प्रथम संस्करण 1994, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पृo 71

3. गुलाब और बुलबुल, त्रिलोचन, प्रथम (वाणी) संस्करण 1985, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृo 22

4. वही, पृo 28

5. वही, पृo 50

6. वही, पृo 50

7. वही, पृo 24

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